हमारे श्रीराम के लिये ही दे दो अपने जातिगत अहं की तिलांजलि

राष्ट्र, धर्म और समाज से जुड़ा कोई प्रश्न या उलझन जब मेरे सामने आता है तो मैं भगवान राम को अपनी कल्पना में ले आता हूँ और मुझे सारे प्रश्नों और उलझनों का समाधान मिल जाता है.

फेसबुक पर हिन्दुओं में कई खेमे हैं जो कहते तो खुद को हिंदूवादी हैं पर इनको अपनी-अपनी जातियों के खोल में सिमटने में देर नहीं लगती.

आज बात केवल दो खेमों की करूँगा. इनमें जातिवाद का ज़हर इतना है कि एक खेमा श्रीराम को ‘ठाकुर’ घोषित कर उनसे अपना रक्त-संबंध स्थापित करते हुये खुद को श्रेष्ठ साबित करने लगता है तो दूसरा कहता है कि भारत में हमेशा धर्म-सत्ता (यानि ब्राह्मण) राज-सत्ता (यानि क्षत्रिय) को नियंत्रित करती रही है इसलिये हम श्रेष्ठ हैं.

मैं भारत के दूसरे धर्मावलंबियों से हमेशा कहता हूँ कि मेरी और आपकी धमनियों में समान रक्त प्रवाहित हो रहा है और हम सब राम और कृष्ण के वंशज हैं.

ऐसे में आप ब्राह्मणों और ठाकुरों के श्रेष्ठता के ऐसे दावे और झगड़े के बाद मुझे समझ नहीं आता कि मैं किस मुंह और किस तर्क से खुद को और दूसरों को श्रीराम और श्रीकृष्ण की संतति घोषित करूँ क्योंकि आपने तो अपने-अपने वर्तुल में मेरे राम को बाँध दिया है.

मैं एक दिन वाल्मीकि रामायण से अयोध्याकाण्ड पढ़ रहा था. प्रभु राम पिता की आज्ञा से वन जा रहे हैं. उनके पीछे-पीछे शोकमग्न अयोध्यावासियों का हुजूम उमड़ रहा है.

प्रजाजनों का प्रेम उनके पितृ-भक्ति में रोड़ा न बन जाये, इसलिये प्रभु तीव्र गति से चलने वाले रथ में बैठे तेजी से अयोध्या से निकल जाना चाहते हैं.

इसी दौरान एक प्रसंग आता है. वाल्मीकि उसका वर्णन करते हुये कहते हैं – राम, लक्ष्मण और सीता जब रथ से निकले जा रहे थे तब उनके पीछे-पीछे आ रहे लोगों में कई ब्राहमण भी थे जो ज्ञान, अवस्था और तपोबल में बहुत बड़े थे और वृद्ध तो इतने कि वृद्धावस्था के कारण उनके सर काँप रहे थे.

राम के विरह में वो प्रभु के रथ से जुड़े घोड़ों से कहने लगे – “अरे! ओ तेज चलने वाले घोड़ों! तुम बड़े वेगशाली हो और तेज गति से श्रीराम को लिये वन की ओर भागे जा रहे हो. लौटो! अपने स्वामी के हितैषी बनो! तुम्हें वन में नहीं जाना चाहिये. यूं तो सभी प्राणियों के कान होते हैं पर तुम घोड़ों के कान बड़े होते हैं अतः तुम्हें हमारी याचना का ज्ञान तो हो ही गया होगा; इसलिये राम को लेकर वापस घर लौट चलो. तुम्हारे स्वामी श्रीराम विशुद्धात्मा, वीर और उत्तम व्रत का पालन करने वाले हैं अतः इनको वन की ओर ले जाना बिलकुल भी उचित नहीं है”.

प्रभु श्रीराम जो जल्दी से जल्दी अयोध्या की सीमा से निकल जाना चाहते थे वो उन वृद्ध ब्राह्मणों की ऐसी बात सुनकर रथ से नीचे उतर गये और जानकी और अपने अनुज के साथ पैदल ही चलने लगे.

वृद्ध ब्राह्मण लोग अपनी झुकी कमर के चलते तेज चलने में समर्थ नहीं थे इसलिये राम ने भी अपने डग छोटे कर लिये ताकि उन वृद्ध ब्राह्मणों को चलने में अधिक कष्ट न करना पड़े.

राम को अपने साथ ज़मीन पर उतर आया देख उन वृद्ध ब्राह्मणों का समूह संतप्त हो उठा और राम से कहने लगा – “रघुनंदन! तुम ब्राह्मणों के हितैषी हो, इसलिये ये सारा ब्राह्मण समाज तुम्हारे पीछे चल रहा है और इन ब्राह्मणों के कन्धों पर बैठकर स्वयं अग्निदेव भी तुम्हारा अनुगमन कर रहें हैं”.

फिर वो ब्राहमण राम से कहते हैं, “वत्स! हमारी बुद्धि जो सदा वेदमन्त्रों के पीछे चलती थी और उन्हीं का चिंतन करती थी वो अब तुम्हारा अनुगमन कर रही है”.

इतना कहने के बाद भी जब वो देखते हैं कि राम अपने वन जाने के निश्चय को बदल नहीं रहे हैं तो वो राम को भावनात्मक रूप से तोड़ने की कोशिश करते हुये कहते हैं – “राम! जब तुम ही ब्राह्मण की आज्ञा के पालनरुपी धर्म की ओर से निरपेक्ष हो जाओगे तो फिर और कौन धर्ममार्ग पर स्थिर रह पायेगा”?

ये धमकी फिर अगले ही क्षण याचना में बदल जाती है. वो ब्राहमण कहते हैं – “राम! हम वृद्ध ब्राहमण अपना सर झुकाकर तुमसे याचना करतें हैं कि घर लौट चलो”.

इस पूरे प्रसंग को देखिये. राम का उन ब्राह्मणों से इतना अनुराग कि उनकी कातर पुकार सुनकर स्वयं, जानकी और लक्ष्मण को लेकर रथ से उतर गये और उनके साथ गति से गति मिलाकर पैदल चलने लगे.

उधर उन ब्राह्मणों का राम से इतना अनुराग कि उन्हें अयोध्या लौटाने के लिये वो कभी राम को वत्स और पुत्र कहकर आज्ञा देने लगते हैं और कभी उनके चरणों पर अपना सर रखकर वापस लौटने का निवेदन करने से भी नहीं हिचकते.

फिर वो प्रसंग भी आता है जब भरत राम से मिलने चित्रकूट पहुंचते हैं तो पिता का कुशल-क्षेम पूछने के बाद राम उनसे पूछ्ते हैं कि “तात! क्या तुम देवताओं, गुरुजनों, पिता के समान आदरणीय वृद्धों और ब्राह्मणों का सम्मान करते हो”?

अव्वल तो ये कि प्रभु को किसी जाति में बांधकर आप बाकी के जाति वालों के साथ अपराध करते हैं और अगर आपको श्रीराम को क्षत्रिय ही मानना है तो मानिये पर शर्त है कि प्रभु का ब्राह्मणों के प्रति प्रेम और व्यवहार को आपको अपने वचन, व्यवहार में मन में लाना होगा.

और यही अनुरोध ब्राह्मणों से भी है कि धर्म-सत्ता का दंभ दिखाने से पहले आपको अपने उन ब्राह्मण-पूर्वजों का स्मरण करना चाहिये जो उस संवाद में प्रभु राम के साथ उपस्थित थे और श्रीराम के लिये उनकी क्या धारणा थी.

आप जातिवादी होते हुये हिंदूवादी नहीं हो सकते. आप एक साथ जाति का दंभ और हिंदुत्व का अहम पालने का दावा नहीं कर सकते. फिर भी अगर आपका ऐसा दावा है तो मैं दुनिया का आख़िरी इंसान होऊँगा जो आपका सम्मान करूँगा.

घर में आग लगी हो तो ऐसे में सजावट और साफ-सफाई का विचार कोई मूर्ख ही करता है, पर दुर्भाग्य से हिन्दू जाति ऐसे मूर्खतापूर्ण सोच रखने वालों की गिरफ़्त में है. इस सोच से बाहर निकलिये, किसी और के लिये नहीं तो कम से कम अपने श्रीराम के लिये.

इतना ही अनुरोध था वर्ना किसी ने गुजरात चुनावों के बाद गलत क्या लिखा था… उसने अपना व्यंग्य में लिखा था – ‘गुजरात चुनाव ख़त्म हो चुका है, अब ब्राह्मण और ठाकुर चाहे तो अपने झगड़े दुबारा शुरू कर सकते हैं’.

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