चुनना हमें है : लड़ कर मरें या फिर हार कर जिएं

भारत कोरेगांव में जल रहा था और पता नही क्यों, मुझे इसको लेकर फर्क नही पड़ रहा था.

यह दलित और ब्राह्मण का लेकर हो रहे उपद्रव भी मुझे रास नही आ रहे हैं.

इतना उदासीन हूँ कि मुझे इस पर भी कुछ नहीं कहना है कि राहुल गांधी और कांग्रेस कैसे दलित विरुद्ध हिन्दू का कथानक बनाकर भारत को जलाने में लगे हैं.

मुझे उन लोगों का नाम लेने का भी मन नहीं कर रहा है जो कोरेगांव में हुई हिंसा के प्रत्यक्ष जिम्मेदार हैं.

लेकिन, मैं इन सबको लेकर सुकून में हूँ क्योंकि यह सब आवश्यक है.

यह सब जब तक नहीं होगा तब तक, कम से कम भारत के 10% हिन्दू इस बात के लिये नही तैयार होंगे कि उसे कल हथियार उठाने होंगे और अपनो का ही संहार करना होगा.

इसी बीच मुझे उन लोगों से भी सख्त वितृष्णा होती जा रही है जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये सरकारी संरक्षण को ही प्रथमिकता दे रहे हैं और हर बात पर इसी उलाहना पर बात खत्म करते है कि दिल्ली बिल्ली है, शेर की खाल में बिल्ली को चुन लिया है.

आज कोई भी नस्ल अपने अस्तित्व व अपने संरक्षण के लिए लोकतंत्र आधारित सरकार पर निर्भर नहीं रह सकती है जबकि पिछले सात दशकों से हमारे और आपके बीच के लोगों के ही मारे तंत्र ध्वस्त हो चुका है.

आज की सरकार से मेरी बहुत सी शिकायतें हैं लेकिन वह सब शिकायतें तब खत्म हो जाती है जब मैं पिछले तीन वर्षों में बिलों में छुपे हुये एक से एक हिन्दू विरोधी व राष्ट्र विरोधी लोगो को अपना सही परिचय कराते पाता हूं.

हम खुद पर ज़रूर रो रहे हैं लेकिन यह जो हो रहा है वह वैश्विक जगत में हो रही घटनाओं से पूरी तरह तारतम्य बनाये हुये है.

यह काल सिर्फ तैयारी करने का काल है क्योंकि आगे की होने वाली विभीषिका पर किसी का भी नियंत्रण नहीं रहने वाला है.

हम उस काल में प्रवेश कर चुके हैं जहां, विश्व में अलग अलग जगहों पर, अपने ही स्थानीय कारणों के कारण, राष्ट्रवाद व राष्ट्रवादी विचारधारा के विरुद्ध, आर्थिक कारणों से उसके शत्रु गठबंधन करेंगे.

राष्ट्रवाद के यह सभी शत्रु बेहद प्रभावशाली व शक्तिशाली हैं क्योंकि मीडिया और बैंक उनके कब्ज़े में हैं.

एक हिन्दू बहुल राष्ट्र होने के कारण, भारत में तो स्थिति ज्यादा रोचक व विषम है. यहां तो मुस्लिम और ईसाई दलित के नाम पर पहले से ही छद्म हिन्दू बना पीठ में छुरी घोंप चुका है.

और अब तो स्वयं हिन्दू ही अपनी एकरूपता को लेकर दिग्भ्रमित हो चुका है. यहां तो अभी हिन्दू बुरी तरह मार खायेगा और शायद यह उसका अधिकारी भी है.

आज मैं गम्भीर चिंतकों और पाठकों को एक ही बात कहूंगा कि आप न सिर्फ तैयारी करें बल्कि लोगों को तैयार करें क्योंकि हमारे और हमारी पीढ़ी के अस्तित्व की रक्षा सिर्फ और सिर्फ हमारी भीरुता की हत्या और आरक्षण व संरक्षण की अपेक्षा की आहुति देने से होगी.

इसके साथ, यदि आज की स्थिति समझनी है तो प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि पढ़िए, कम से कम, उसके 5 वर्ष पीछे जाइये.

आप ज्ञानचक्षु खोल कर पढ़ेंगे तो पायेंगे कि चिंगारियां अलग अलग जगहों पर अलग अलग कारणों से सुलगी थीं लेकिन अंत में आग कहीं और लगी थी.

विश्व में जब भी बड़े युद्ध हुये हैं, वो चाहे प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध ही क्यों न हो, इन सबने राष्ट्रों के चरित्र के साथ उनकी भौगोलिक स्थिति बदली है. जहां कुछ राष्ट्रों को लुप्त किया है, वहीं नये राष्ट्रों का उदयन भी किया है और यही अगले दशकों में मेरी अगली पीढ़ी देखने जा रही है.

आज 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक के अंत में आते हुये, हम इस चक्र में तो आ ही गये हैं, जहां हमको इस बात का चयन करना है कि हम को लड़ कर मरना है या फिर हार कर जीना है.

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