इसीलिये हम एक banana republic हैं

अमेरिका में रहते हुए चार महीने से ज्यादा वक़्त हो गया है.

सोचा था लिखना नहीं छोडूंगा पर टाइम ज़ोन के अंतर और व्यस्तता के चलते सब छूटता चला गया.

पर इसका फायदा ये हुआ की चीज़ें ऊपर से, तीसरे व्यक्ति की तरह देखने का प्रयोग कर लिया, heat of the moment के बाहर.

इससे चीज़ें सैद्धांतिक रूप से सरल होती चली जाती हैं, आपको एक निश्चित पैटर्न समझने में भी मदद मिलती है.

आज देश में इतनी अराजक स्थिति देखते हुए, हर दूसरे राज्य में एक ही तरह के फसाद देखने के बाद, घोर नपुंसक, पिलपिले, चुनाव से शुरू और चुनाव पर बात खत्म करने वाले रणनीतिकार राष्ट्रवादियों और नेताओं को देखकर मन घोर निराश है.

यार, ये बताइये कि दंगा हुआ, बसें फूंक दी गयीं, एक आदमी को मार डाला गया, ट्रेनों पर पत्थर फेंके गए, पूरे शहर को, राज्य को अस्त व्यस्त कर दिया गया…

ये कौन सी राजनीतिक, वैचारिक लड़ाई है भाई जिसे हम 2019 का चुनाव जीतकर जीतने वाले हैं?…

क्या ये लोग खत्म हो जायेंगे? क्या इनके नेता खत्म हो जायेंगे?… मोदी जी को 60 प्रतिशत वोट मिले तो भी 40 प्रतिशत तो हमेशा उस तरफ ही रहेंगे ना!

अगर कांग्रेस का हाथ इन सब में है तो क्यों हमारी इंटेलिजेंस एजेंसियां इनके फोन टेप कर इन्हे नंगा नहीं करती जनता के सामने?

दिक्कत ये है कि कानून व्यवस्था के मुद्दों को भी हमने और हमारी सरकारों ने अपनी वैचारिक लड़ाई में शामिल कर लिया है.

हमने मान लिया है कि लोग ऐसे ही मरते रहेंगे, दंगे ऐसे ही होते रहेंगे जबकि इन घटनाओं पर ज़ीरो टॉलरेंस की पॉलिसी होना चाहिए थी…

किसी शहर में दंगा होना किसी विचारधारा की समस्या नहीं law and order की समस्या है. Crush the bloody bastards hard….

ऐसा कुचल दीजिए कि अगली बार किसी बस या ट्रेन पर फेंकने के लिए पत्थर हाथ में लेने से पहले किसी जिग्नेश की या उसकी औलाद की पैंट गीली हो जाये.

मुझे पता है हम ये नहीं कर सकते, इसीलिये हम एक banana republic हैं.

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