मैं मृत्यु सिखाता हूँ

मृत्यु क्या है? मृत्यु है ही नहीं. मृत्यु एक झूठ है — सरासर झूठ — जो न कभी हुआ, न कभी हो सकता है. जो है, वह सदा है. रूप बदलते हैं. रूप की बदलाहट को तुम मृत्यु समझ लेते हो. तुम किसी मित्र को स्टेशन पर विदा करने गए; उसे गाड़ी में बिठा दिया. नमस्कार कर ली. हाथ हिला दिया. गाड़ी छूट गयी. क्या तुम सोचते हो, यह आदमी मर गया? तुम्हारी आंख से ओझल हो गया. अब तुम्हें दिखायी नहीं पड़ रहा है. लेकिन क्या तुम सोचते हो, यह आदमी मर गया?

बच्चे थे, फिर तुम जवान हो गए. बच्चे का क्या हुआ? बच्चा मर गया? अब तो बच्चा कहीं दिखायी नहीं पड़ता! जवान थे, अब के हो गए. जवान का क्या हुआ? जवान मर गया? जवान अब तो कहीं दिखायी नहीं पड़ता! सिर्फ रूप बदलते हैं. बच्चा ही जवान हो गया. जवान ही बूढ़ा हो गया. और कल जीवन ही मृत्यु हो जाएगा.

यह सिर्फ रूप की बदलाहट है. दिन में तुम जागे थे, रात सो जाओगे. दिन और रात एक ही चीज के रूपांतरण हैं. जो जागा था, वही सो गया. बीज में वृक्ष छिपा है. जमीन में डाल दो, वृक्ष पैदा हो जाएगा. जब तक बीज में छिपा था, दिखायी नहीं पड़ता था. मृत्यु में तुम फिर छिप जाते हो, बीज में चले जाते हो. फिर किसी गर्भ में पड़ोगे; फिर जन्म होगा. और गर्भ में नहीं पड़ोगे, तो महाजन्म होगा, तो मोक्ष में विराजमान हो जाओगे. मरता कभी कुछ भी नहीं. विज्ञान भी इस बात से सहमत है. विज्ञान कहता है. किसी चीज को नष्ट नहीं किया जा सकता.

एक रेत के छोटे से कण को भी वितान की सारी क्षमता के बावजूद हम नष्ट नहीं कर सकते. पीस सकते हैं, नष्ट नहीं कर सकते. रूप बदलेगा पीसने से तो. रेत को पीस दिया, तो और पतली रेत हो गयी. उसको और पीस दिया, तो और पतली रेत हो गयी. हम उसका अणु विस्फोट भी कर ‘सकते हैं. लेकिन अणु टूट जाएगा, तो परमाणु होंगे. और पतली रेत हो गयी. हम परमाणु को भी तोड़ सकते हैं, तो फिर इलेक्ट्रान, न्द्वान, पाजिट्रान रह जाएंगे. और पतली रेत हो गयी! मगर नष्ट कुछ नहीं हो रहा है. सिर्फ रूप बदल रहा है. विज्ञान कहता है पदार्थ अविनाशी है.

विज्ञान ने पदार्थ की खोज की, इसलिए पदार्थ के अविनाशत्व को जान लिया. धर्म कहता है – चेतना अविनाशी है, क्योंकि धर्म ने चेतना की खोज की और चेतना के अविनाशत्व को जान लिया. विज्ञान और धर्म इस मामले में राजी हैं कि जो है, वह अविनाशी है. मृत्यु है ही नहीं. तुम पहले भी थे; तुम बाद में भी होओगे. और अगर तुम जाग जाओ, अगर तुम चैतन्य से भर जाओ, तो तुम्हें सब दिखायी पड़ जाएगा जो — जो तुम पहले थे. सब दिखायी पड जाएगा, कब क्या थे.

बुद्ध ने अपने पिछले जन्मों की कितनी कथाएं कही हैं! तब ऐसा था. तब ऐसा था. तब वैसा था. कभी जानवर थे; कभी पौधा थे, कभी पशु थे; कभी पक्षी. कभी राजा, कभी भिखारी. कभी स्त्री, कभी पुरुष. बुद्ध ने बहुत कथाएं कही हैं. वह जो जाग जाता है, उसे सारा स्मरण आ जाता है. मृत्यु तो होती ही नहीं. मृत्यु तो सिर्फ पर्दे का गिरना है. तुम नाटक देखने गए. पर्दा गिरा. क्या तुम सोचते हो, मर गए सब लोग जो पर्दे के पीछे हो गए! वे सिर्फ पर्दे के पीछे हो गए.
अब फिर तैयारी कर रहे होंगे. मूंछ इत्यादि लगाएंगे; दाढ़ी वगैरह लगाएंगे, लीप—पोत करेंगे. फिर पर्दा उठेगा. शायद तुम पहचान भी न पाओ कि जो सज्जन थोड़ी देर पहले कुछ और थे, अब वे कुछ और हो गए हैं! तब वे बिना मूंछ के थे; अब वे मूंछ लगाकर आ गए हैं. शायद तुम पहचान भी न पाओ. बस, यही हो रहा है. इसलिए संसार को नाटक कहा है, मंच कहा है. यहां रूप बदलते रहते हैं. यहां राम भी रावण बन जाते हैं और रावण भी राम बन जाते हैं. ये पर्दे के पीछे तैयारियां कर आते हैं. फिर लौट आते हैं, बार—बार लौट आते हैं. तुम पूछते हो ‘मृत्यु क्या है?’ मृत्यु है ही नहीं. मृत्यु एक भांति है. एक धोखा है.
“सरूरे—दर्द गुदाजे—फुगा से पहले था
सरूदे —गम मेरे सोजे— बया से पहले था
मैं आबोगिल ही अगर हूं बकौदे—शमो—सहर
तो कौन है जो मकानो — जमी से पहले था
ये कायनात बसी थी तेरे तसव्वर में
वजूदे हर दो जहां कुन फिकां से पहले था
अगर तलाश हो सच्ची सवाल उठते हैं
यकीने—रासिखो — महकम गुमां से पहले था
तेरे खयाल में अपना ही अक्से —कामिल था
तेरा कमाल मेरे इप्तिहा से पहले था
मेरी नजर ने तेरे नक्यो — पा में देखा था
जमाले—कहकशा कहकशा से पहले था
छुपेगा ये तो फिर ऐसा ही एक उभरेगा
इसी तरह का जहां इस जहां से पहले था
तज्जलियात से रौशन है चश्मे—शौक मगर
कहां वो जल्वा जो नामो —निशा से पहले था”

सब था पहले ऐसा ही. फिर—फिर ऐसा ही होगा. यह दुनिया मिट जाएगी, तो दूसरी दुनिया पैदा होगी. यह पृथ्वी उजड़ जाएगी, तो दूसरी पृथ्वी बस जाएगी. तुम इस देह को छोड़ोगे, तो दूसरी देह में प्रविष्ट हो जाओगे. तुम इस चित्तदशा को छोड़ोगे, तो नयी चित्तदशा मिल जाएगी. तुम अज्ञान छोड़ोगे, तो ज्ञान में प्रतिष्ठित हो जाओगे; मगर मिटेगा कुछ भी नहीं. मिटना होता ही नहीं. सब यहां अविनाशी है. अमृत इस अस्तित्व का स्वभाव है. मृत्यु है ही नहीं. इसलिए मजबूरी है, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर न दे सकूंगा कि मृत्यु क्या है? क्योंकि जो है ही नहीं, उसकी परिभाषा कैसे करें! जो है ही नहीं, उसकी व्याख्या कैसे करें?
ऐसा ही है, जैसे तुमने रास्ते पर पड़ी रस्सी में भय के कारण सांप देखा. भागे. घबडाए. फिर कोई मिल गया, जो जानता है कि रस्सी है. उसने तुम्हारा हाथ पकड़ा और कहा. मत घबड़ाओ, रस्सी है. तुम्हें ले गया; पास जाकर दिखा दी कि रस्सी है. फिर क्या तुम उससे पूछोगे सांप का क्या हुआ? नहीं; तुम नहीं पूछोगे कि सांप का क्या हुआ? बात खतम हो गयी, साप था ही नहीं. क्या हुआ का सवाल नहीं है. क्या तुम उससे पूछोगे अब जरा सांप के संबंध में समझाइए! वह जो सांप मैंने देखा था, वह क्या था? वह तुम्हारी भ्रांति थी. वह बाहर कहीं था ही नहीं. रस्सी के रूप—रंग ने तुम्हें भ्रांति दे दी, सांझ के धुंधलके ने तुम्हें भ्रांति दे दी, तुम्हारे भीतर के भय ने तुम्हें भांति दे दी. सारी भ्रांतियों ने मिलकर एक सांप निर्मित कर दिया. वह तुम्हारा सपना था. मृत्यु तुम्हारा सपना है. कभी घटा नहीं. घटता मालूम होता है. और इसलिए भ्रांति मजबूत बनी रहती है कि जो आदमी मरता है, वह तो विदा हो जाता है. वही जानता है कि क्या है मृत्यु जो मरता है.

तुम तो मर नहीं रहे. तुम बाहर से खड़े देख रहे हो. एक डाक्टर मुझे मिलने आए थे. वे कहने लगे मैंने सैकड़ों मृत्युएं देखी हैं. मैंने कहा – गलत बात मत कहो. तुमने मरते हुए लोग देखे होंगे, मृत्युएं कैसे देखोगे? मृत्यु तुम कैसे देखोगे? तुम तो अभी जिंदा हो! तुमने सैकडों मरते हुए लोग देखे होंगे, लेकिन मरते हुए लोग देखने से क्या होता है! तुम क्या देखोगे बाहर? यही देख सकते हो कि इसकी सांस धीमी होती जाती है; कि धड़कन डूबती जाती है. मगर यह थोड़े ही मृत्यु है. यह आदमी अब ठंडा हो गया, यही देखोगे. मगर इसके भीतर क्या हुआ? इसके भीतर जो चेतना थी, कहां गयी? उसने कहां पंख फैलाए? वह किस आकाश में उड गयी? वह किस द्वार से प्रविष्ट हो गयी? किस गर्भ में बैठ गयी? वह कहां गयी? क्या हुआ? उसका तो तुम्हें कुछ भी पता नहीं है.

वह तो वही आदमी कह सकता है. और मुर्दे कभी लौटते नहीं. जो मर गया, वह लौटता नहीं. और जो लौट आते हैं, उनकी तुम मानते नहीं. जैसे बुद्ध यही कह रहे हैं कि मैंने ध्यान में वह सारा देख लिया जो मौत में देखा जाता है. इसलिए तो ज्ञानी की कब को हम समाधि कहते हैं, क्योंकि वह समाधि को जानकर मरा. उसने ध्यान की परम दशा जानी. इसलिए तुमने देखा. हम संन्यासी को जलाते नहीं, गड़ाते हैं. शायद तुमने सोचा ही न हो कि क्यों! गृहस्थ को जलाते हैं, संन्यासी को गड़ाते हैं. क्यों? क्योंकि गृहस्थ को अभी फिर पैदा होना है. उसकी देह जल जाए, यह अच्छा. क्योंकि देह के जलते ही उसकी आत्मा की जो आसक्ति इस देह में थी, वह मुक्त हो जाती है. जब जल ही गयी; खतम ही हो गयी, राख हो गयी—अब इसमें मोह रखने का क्या प्रयोजन है? वह उड़ जाता है. वह नए गर्भ में प्रवेश करने की तैयारी करने लगता है. पुराना घर जल गया, तो नया घर खोजता है.

संन्यासी तो जानकर ही मरा है. अब उसे कोई नया घर स्वीकार नहीं करना है. पुराने घर से मोह तो उसने मरने के पहले ही छोड़ दिया. अब जलाने से क्या सार? अब जले—जलाए को जलाने से क्या सार! अब मरे —मराए को जलाने से क्या सार? इस आधार पर संन्यासी को हम जलाते नहीं, गड़ाते हैं. और संन्यासी की हम समाधि बनाते हैं. उसकी कब को समाधि कहते हैं. इसीलिए कि वह ध्यान की परम अवस्था समाधि को पाकर गया है. वह मृत्यु को जीते जी जानकर गया है कि मृत्यु झूठ है. जिस दिन मृत्यु झूठ हो जाती है, उसी दिन जीवन भी झूठ हो जाता है. क्योंकि वह मृत्यु और जीवन हमारे दोनों एक ही भांति के दो हिस्से हैं. जिस दिन मृत्यु झूठ हो गयी, उस दिन जीवन भी झूठ हो गया. उस दिन कुछ प्रगट होता है, जो मृत्यु और जीवन दोनों से अतीत है. उस अतीत का नाम ही परमात्मा है; जो न कभी पैदा होता, न कभी मरता, जो सदा है.
– ओशो

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