तीन कविताएँ : तीन कदम एक दूजे की ओर बढ़ते हुए

1.

कहाँ शुरू होता है दिन
कहाँ ख़त्म रात होती है
कहाँ मिलते हैं धरती आसमान
कहाँ धड़कन तुम्हारी ख़त्म होती है
मेरी शुरू होती है

जाने दो
सब फ़िज़ूल के सवाल हैं
तुम बस महसूस करो

गर कहूँ मुझ में तुम हो
तब भी दो रहते हैं
गर कहूँ तुम में मैं हूँ
तब भी दो रहते हैं
गर कहूँ मैं वह हूँ
तब भी दो रहते हैं

जाने दो, कुछ नहीं कहना है मुझे
तुम मुझे बस अपनी बाहों में
अपनी छाती पे सर रख कर सोने दो

2.

यूँ तो उससे मिलने का कोई वादा कभी नहीं किया मैंने
पर फिर भी जब उसने कहा
हमारा मिलना तो नियति है
उसे कौन रोक सकता है
तो उसका इंतज़ार ज़रूर किया

अब जब कोई इच्छा करने की भी ज़रुरत नहीं रही
अब जब दो है ही नहीं
फिर भी लगता है
तुम्हारा कहा गलत तो कतई नहीं हो सकता
यह शब्द जो हवा में लहरा रहे हैं
अपनी कोख में लिए पुनर्जन्म का बीज
फूटेंगे नन्ही कोपलों के जैसे
और हम मिलेंगे

ऐसे नहीं जैसे हवा के तेज़ चलने से
सड़क के आर पार खड़े पेड़ों की शाखाएं मिलती हैं गले
पर कुछ ऐसे जैसे शाम के जादुई पलों में
सब रंग घुल मिल जाते हैं इक दूजे में
फिर एक ही रंग बचता है
काशनी
या फिर ऐसे जैसे नाग नागिन का रज्जु नर्तन
संयुक्त अनुभूति का कुंडली जागरण

कुछ भी कहा, कुछ भी किया
कभी भी ज़ाया नहीं जाता
तुम भी जानते हो, मैं भी
अपनी नियति खुद ही तो तय करते हैं हम

3.

यूँ तो नया कुछ भी नहीं है
न ही समय की धारा में बँधा है कुछ भी
समय तो मानव मन की उपज भर है
अपनी सहूलियत के लिए
फिर भी जब हम उत्सव मनाते हैं
ख़ुश होते हैं
दिल में एक तरंग उठती है
कोई तमन्ना जागती है

तो हम ख़ूबसूरत सी वायब्रेशंज़ भेजते हैं यूनिवर्स में
और यूनिवर्स है कि हमारी धड़कनों संग धड़कता है
जो हम भेजते हैं
हज़ार गुना कर वापिस भेजता है
तो मनाओ उत्सव ज़िंदगी का
चैतन्य रहते हुए

कि माया भी दिव्य है
उसी की मैनिफ़ेस्टेशन है
जो तुम सुनना चाहते हो वही सुनवाया जाता है
जो देखना चाहते हो वही दिखवाया जाता है
जो करना चाहते हो वही करवाया जाता है

यूँ न कुछ करने की ज़रूरत है
न सोचने की ही
सब हो रहा है
और सब तुम्हारे लिए ही हो रहा है

ज़रूरत सिर्फ़ चैतन्य होने की है
हर लम्हे को महसूस करने की है
पीने की है
होता हुआ देखने की है
हम कह देते हैं कपड़े छोटे हो गए
जब कि हो रहा होता है बच्चा बड़ा

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