शंभू क्यों बन रहा हिंदू

वामपंथी मित्रों के बीच विचरण करने वाले और खुद को कथित रूप से पढ़ा लिखा आदमी साबित करने की सतत कोशिश में जुटे रहने वाले किसी अदने से आदमी के लिए यह लिखना कितना खतरनाक और आत्मघाती हो सकता है. लेकिन हदें पार होने पर खतरे उठाने पड़ेंगे.

दो दिन से महाराष्ट्र के तमाशे को देखकर लगने लगा है कि हम अपना कितना समय किन लोगों पर ज़ाया करते हैं.

मैं तो उस शंभू के बारे में सोच रहा हूं.

आपको याद है?

या आपके लिए भी वह बस एक सुर्खी था, मसाला था और सुर्खियों से ओझल होने के बाद काम खत्म.

शंभू को जानने का दावा मैं कैसे करूं? हां, पर जो दिखा उससे स्पष्ट है कि वह समाज और सरोकारों की चिंता जरूर करता था.

महानगरीय दुनिया में कोई अपने दोस्त की बहन को लाने के लिए राजस्थान से बंगाल के उस इलाके में जाने का जोखिम शायद ही मोल ले. शायद कस्बाई होने की वजह से यह हिम्मत बची रह गई थी.

शंभू ने कुछ देखा, भोगा और पुरुषोचित तरीके से प्रतिकार किया. कम ही लोग ऐसा साहस करते हैं.

अब पुरुषोचित गुणों की कोई पूछ रही नहीं, दिल्ली-बंबई में सीना तान कर परेड तो एलजीबीटी करते हैं.

और शंभू ने जो किया वो कुछ ऐसा भी नहीं कि लुटियन वाली लिबरल दुनिया के लिए cause celebre बन जाए और उसे रातोंरात याकूब मेनन या अफजल गुरु की तरह पीड़ित घोषित कर दिया जाए.

शंभू जहां था, जिस परिवेश में था, वहां उसे कोई ऐसा स्क्रिप्ट राइटर नहीं उपलब्ध था जो उसकी व्यथा को अभिजात्यों की समझ में आने वाली भाषा में पेश कर पाता.

पर अगर कोई मेकअप आर्टिस्ट और स्क्रिप्ट राइटर उपलब्ध होता तो यह कोई कल्पना की उड़ान नहीं है, शंभू शायद भगत सिंह होता.

शंभू कुछ खतरनाक जगहों पर रहने वाले उन करोड़ों दलितों में था जिसकी चिंताओं का ठेका किसी वामिस्लामी खेमे ने ले रखा है. शंभू जैसों को समुदाय के ठेकेदारों ने अपनी पीड़ा को आर्टिक्यूलेट करने ही नहीं दिया.

शंभू का जो दर्द था, उसे सुनना उसके आकाओं के लिए खतरनाक हो सकता था जो उसे बताते रहे हैं कि सिर्फ ब्राह्मण और सवर्ण ही तुम्हारे दुश्मन हैं.

शायद कहीं से कोई रास्ता न देख उसने घोर हताशा में यह कदम उठाया होगा. लेकिन अभागे को अपने समुदाय का भी समर्थन नहीं मिला क्योंकि मेवाणी-मायावती जैसे ठेकेदार करने नहीं देंगे.

इसलिए अखबारों की जो हेडलाइंस बासी हो गई हैं, उस पर भी कभी नज़र डाल लेनी चाहिए. इन मेवाणियों को क्या तूल देना. ये तो बस वामिस्लाम के खिलौने हैं.

शंभू को जेल की कोठरी में अपने हाल पर छोड़ देते हैं तो यह मेवाणियों और खालिद उमर जैसों की जीत है. लेकिन ये जान लें कि इनके पतन की कथा भी कोई शंभू ही लिखेगा बशर्ते आप साथ दें तो.

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