सवा लाख से एक लड़ाऊं तद गुरगोबिंद नाम कहाऊँ

आज 5 जनवरी है !
मध्यकालीन भारत के मेरे तीन महानायकों महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी राजे और दशमेश गुरुगोबिंद सिंह जी मे से एक प्रातः स्मरणीय गुरुसाहेब श्री गुरुगोबिंद सिंह जी की जयंती है.

गुरुजी के विषय में मैंने जब भी पढ़ा, जाना उनके प्रति मेरा आदर बढ़ता ही चला गया. हिन्दू धर्म के सबसे कठिन एवं दुर्गम काल में गुरुजी ने खालसा पंथ की स्थापना करके यवनों के दुष्ट इरादों को जमींदोज कर दिया था.

उन्होंने हिन्दुओं को भगवद्गीता के स्थिरप्रज्ञ निष्काम कर्मयोगी योद्धा बनने की प्रेरणा दी और इसके लिए आवश्यक सभी कर्म करने को प्रेरित किया. देश एवं धर्म के लिए अपने हृदयांश अपने सुकुमार पुत्रों तक को जिन्होंने बिना उफ किये आहूत कर दिया और पूछे जाने पर ऐसे वचन कहे कि ,

“देश-धर्म के कारने, वार दिए सुत चार ।
चार मुए तो क्या हुआ,जीवित कई हजार ।।”

ऐसे महापुरुष के श्रीचरणों में हर हिन्दू का नतमस्तक हो जाना सहज ही है.
पौंटा साहिब गुरुद्वारे गया हूँ मैं और वह मेरे जीवन के अविस्मरणीय क्षण थे जब मैंने गुरुजी के वे दिव्य शस्त्र देखें थे जिन्हें धारण करके उन्होंने मुग़लो के दांत खट्टे किये थे.

जब उनके द्वारा तैयार किया गया एक खालसा युद्ध करता था तो हजारों भयभीत हिन्दुओं में इतनी प्रेरणा और शक्ति भर देता था कि गुरुजी के वचन सत्य सिद्ध हो जाते थे.

” सवा लाख से एक लड़ाऊं तद गुरगोबिंद नाम कहाऊँ ”
” चिड़िया दे नाल बाज लड़ाऊं तद गुरगोबिंद नाम कहाऊँ ”

अपने वीर खालसा योद्धाओं को जिन्होंने यह कहकर निर्देशित किया था कि,
“सूरा सो पहचानिए लड़ै दीन के हेत,
पुरजा पुरजा कट मरे तबहु ना छाड़े खेत ।।

अर्थात वही शूरवीर है जो दुर्बल के लिए लड़े और तब तक लड़े और मैदान ना छोड़े जब तक कि शरीर का पुरजा पुरजा ना कट गिरें.

एक संत, एक चिंतक, एक लेखक और एक अदम्य साहसी योद्धा श्री गुरुगोबिन्दजी को समस्त हिन्दूसमाज कृतज्ञ होकर आदरांजलि अर्पित करता है और यह विश्वास दिलाता है कि आपके दिखाए मार्ग पर चलकर हिन्दू धर्म को पुनः श्रेष्टपद पर विराजित करने का श्रेष्ट प्रयास किया जाएगा.

बोलिये हिन्दू एवं सिक्ख भाइयों !
“जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल ।।”
वाहे गुरुजी दा खालसा, वाहे गुरुजी दी फतेह ।।”

।।सनातन धर्म की जय हो ।।

आज के दिन इसी कारण मेरे लिए यह गर्व का विषय होता है कि आज मेरा भी जन्मदिवस है, दशमेश श्री गुरगोबिंद सिंह जी की कृपा का एक अंश भी मुझे प्राप्त हो तो मैं इस संयोग को अत्यंत सौभाग्य का प्रतीक मानूँगा.

मेरे आराध्यदेव जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण के चरणारविन्द मे सहस्त्रों बार साष्टांग दंडवत प्रणाम है.

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