भारत को किसी वामपंथी या पूंजीवादी नहीं, उत्पादन के वैदिक मॉडल की ज़रुरत

महाकवि घाघ अंग्रेजों के पूर्व के कवि हैं. उनकी कहावतें वैज्ञानिक तथ्यों पर हैं वे चाहे मौसम के बारे में हों, किसानी खेती के बारे में हों, या फिर समाज के बारे में.

उन्होंने लिखा –

उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान ।1।

खेती करै बनिज को धावै, ऐसा डूबै थाह न पावै ।2।

उत्तम खेती जो हर गहा, मध्यम खेती जो सँग रहा ।3।

उत्तम खेती… कब थी?

जब इस देश में कृषि और कृषि आधारित उत्पाद, विश्व में सबसे ज्यादा और सबसे सुंदर मैनुफेक्चर होते थे.

उन्हीं उत्पादों के लालच में गोरे ईसाई सात समंदर पार से आकर भारत में व्यापार करने आए थे. जबकि आने वालों मे से 20% गौरांग ईसाई रास्ते मे ही जीसस को प्यारे हो जाते थे. (प्रदोश आइच)

भारत के हर घर की स्त्रियाँ दोपहर बाद सूत कात कर घर की आमदनी में बढ़ोत्तरी करती थीं. लगभग हर गांव में हैंडलूम थे. हर जिले मे रंगरेज़ थे जो इन लूमों से बने कपड़ों को प्राकृतिक रंगों से रंगते थे / छिप्पीगार थे – जो छींट के कपड़े बनाते थे. (रोमेश दत्त)

ये छींट के कपड़े ईस्ट इंडिया कंपनी यूरोप और इंग्लैंड ले जाती थी, जो वहाँ इतने लोकप्रिय हुये – खासकर महिलाओं में कि इंग्लैंड के ऊन के निर्माताओं ने विद्रोह कर दिया, क्योंकि वे उन कपड़ों से competition करने में सक्षम नहीं थे. और उन्होने ईस्ट इंडिया कंपनी के गोदामों में आग लगा दी.

अंत में ब्रिटेन की संसद ने 1700 में Calico Act बनाकर रंगीन कपड़ों के आयात पर रोक लगा दी. लेकिन वहाँ की स्त्रियों में लोकप्रिय छींट का प्रयोग जारी रहा.

अंत में 1720 में Calico Act में बदलाव कर सूती कपड़ों के प्रयोग पर बैन लगा दिया गया. जो स्त्रियाँ फिर भी इनका प्रयोग करती थीं उनको देशद्रोही मानकर अपमानित और दंडित किया जाने लगा.

अब ईस्ट इंडिया कंपनी सूती वस्त्रों का आयात सिर्फ दूसरे देशों में निर्यात करने के लिए करने लगी.

बाद की कहानी आपको पता ही है कि किस तरह भारत को बाजार बनाने के लिए उन्होंने भारत की मैनुफेक्चुरिंग नष्ट कर भारत को मात्र एक कृषि प्रधान देश में तब्दील कर दिया.

अब भारतीयों के पास नौकरी के अलावा कोई विकल्प न बचा.

भारत की वो 20% आबादी जो अपना जीवनयापन मात्र मैनुफेक्चुरिंग से करते थे, और वे किसान जिनकी ज़मीन अंग्रेजों ने लगान न चुका पाने के कारण अपने कब्जे में कर ली – वो कहाँ गए? क्या हुआ उनका?

0 AD में जो भारत इन्हीं की बदौलत विश्व के 25% जीडीपी का मालिक सन 1750 तक था, वो सन 1900 आते आते मात्र 2% जीडीपी का हिस्सेदार बचा.

भारत को किसी वामपंथी या पूंजीवादी सिद्धान्त की आवश्यकता नहीं है पुनरोत्थान हेतु.

खुद की अपनी वैदिक मॉडल ऑफ़ प्रोडक्शन को पढ़ें समझें और उसका आधुनिकीकरण करके पुनर्स्थापित करें. उत्तम खेती और समृद्ध किसान पुनः स्थापित सिद्धान्त बनेगा.

हाँ, तो नौकरी यानि सेवा यानि सर्विस यानि शूद्रकर्म – अब हर भारतीय और उसके माँ बाप का सपना है.

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