सिर पर कपड़ा बांधने का रहस्य!

ma jivan shaifaly samvad 2 making india

सिर पर कुछ बांध कर गुरुद्वारा या किसी मंदिर या किसी पवित्र जगह में प्रवेश की बात है.

ध्यान में भी बहुत फकीरों ने सिर में कुछ बांध कर ही प्रयोग करने की कोशिश की है.

उसका उपयोग है. क्योंकि जब तुम्हारे भीतर ऊर्जा जगती है तो तुम्हारे सिर पर बहुत भारी बोझ की संभावना हो जाती है.

और अगर तुमने कुछ बांधा है तो उस ऊर्जा के विकीर्ण होने की संभावना नहीं होती, उस ऊर्जा के वापस आत्मसात हो जाने की संभावना होती है.

तो बांधना उपयोगी सिद्ध हुआ है, बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है. अगर तुम ध्यान, सिर पर कपड़ा बांधकर करोगे, तो तुम फर्क अनुभव करोगे फौरन; क्योंकि जिस काम में तुम्हें पंद्रह दिन लगते, उसमें पांच दिन लगेंगे.

क्योंकि तुम्हारी ऊर्जा जब सिर में पहुंचती है तो उसके विकीर्ण होने की संभावना है, उसके बिखर जाने की संभावना है. अगर वह बंध सके और एक वर्तुल बन सके तो उसका अनुभव प्रगाढ़ और गहरा हो जाएगा.

लेकिन अब तो वह औपचारिक है, मंदिर में किसी का जाना या गुरुद्वारे में किसी का सिर पर कपड़ा बांधकर जाना बिलकुल औपचारिक है. उसका अब कोई अर्थ नहीं रह गया है. लेकिन कहीं उसमें अर्थ है.

और व्यक्ति के चरणों में सिर रखकर तो कोई ऊर्जा पाई जा सके, व्यक्ति के हाथ से भी कोई ऊर्जा आशीर्वाद में मिल सकती है, लेकिन एक आदमी एक मंदिर में, एक वेदी पर, एक समाधि पर, एक मूर्ति के सामने सिर झुकाता है, इसमें क्या हो सकता है?

तो इसमें भी बहुत सी बातें हैं; एक दो—तीन बातें समझ लेने जैसी हैं.

पहली बात तो यह है कि ये सारी की सारी मूर्तियां एक बहुत ही वैज्ञानिक व्यवस्था से कभी निर्मित की गई थीं.

जैसे समझें कि मैं मरने लगा और दस आदमी मुझे प्रेम करने वाले हैं, जिन्होंने मेरे भीतर कुछ पाया और खोजा और देखा था, और मरते वक्त वे मुझसे पूछते हैं कि पीछे भी हम आपको याद करना चाहें तो कैसे करें?

तो एक प्रतीक तय किया जा सकता है मेरे और उनके बीच, जो मेरे शरीर के गिर जाने के बाद उनके काम आ सके; एक प्रतीक तय किया जा सकता है.

वह कोई भी प्रतीक हो सकता है – वह एक मूर्ति हो सकती है, एक पत्थर हो सकता है, एक वृक्ष हो सकता है, एक चबूतरा हो सकता है; मेरी समाधि हो सकती है, कब्र हो सकती है, मेरा कपड़ा हो सकता है, मेरी खड़ाऊं हो सकती है – कुछ भी हो सकता है.

लेकिन वह मेरे और उनके, दोनों के बीच तय होना चाहिए. वह एक समझौता है. वह उनके अकेले से तय नहीं होगा; उसमें मेरी गवाही और मेरी स्वीकृति और मेरे हस्ताक्षर होने चाहिए – कि मैं उनसे कहूं कि अगर तुम इस चीज को सामने रखकर स्मरण करोगे, तो मैं अभौतिक स्थिति में भी मौजूद हो जाऊंगा. यह मेरा वायदा होना चाहिए. तो इस वायदे के अनुकूल काम होता है, बिलकुल होता है.

इसलिए ऐसे मंदिर हैं जो जीवित हैं, और ऐसे मंदिर हैं जो मृत हैं. मृत मंदिर वे हैं जो इकतरफा बनाए गए हैं, जिनमें दूसरी तरफ का कोई आश्वासन नहीं है.

हमारा दिल है, हम एक बुद्ध का मंदिर बना लें. वह मृत मंदिर होगा; क्योंकि दूसरी तरफ से कोई आश्वासन नहीं है.

जीवित मंदिर भी हैं, जिनमें दूसरी तरफ से आश्वासन भी है; और उस आश्वासन के आधार पर उस आदमी का वचन है.

– ओशो, जिन खोजा तिन पाइया

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