कब तक तेल और पानी की तरह अलग अलग रहोगे?

दुनिया के बहुत से देशों में एक मुहीम चल रही है. सरकारें क़ानून बना कर अपने नागरिकों को ऐसे प्रतीक और वेशभूषा धारण करने से रोक रही हैं जिनसे उसके धर्म सम्प्रदाय का बोध होता हो. यानि कि आप यूँ रहो कि आपको कोई पहचान ही न पाए कि आप कौन हो या आपका धर्म क्या है.

अपनी एक आदत है. रेल यात्रा में डब्बे में घुसो और ट्रेन चलने से पहले सो जाओ. रेल यात्रा में सोने से बढ़िया कोई टाइम पास नहीं. यूँ आजकल जबसे स्मार्टफोन आ गया है तब से तो रेल में भी सारा समय फेसबुकियाते हैं. पर ये किस्सा तब का है जब मेरे पास स्मार्ट फोन नहीं था और कोई आखिर कितनी देर सो सकता है. मैं मालवा एक्सप्रेस से जालंधर से दिल्ली आ रहा था. रेल में सेटल होते ही मैंने चारों ओर नज़र दौडाई और time pass का जुगाड़ खोजने लगा. अगल बगल कोई मजेदार सा character नहीं था. मज़ा नहीं आया. कि 40 मिनट बाद रेल लुधियाना पहुंची तो बगल वाली सीट पे दो मौलाना आ बिराजे. उन्हें देखते ही अपनी आँखों में तो चमक आ गयी. लो जी हो गया 5 घंटे का जुगाड़.

रेल चली. दोनों मौलाना जब settle हो गए तो मैंने दुआ सलाम की. पर दोनों कछुआ रूप धारण किये रहे. माने उन ने अपनी खोल से मुंडी बाहर नहीं निकाली. दो लाइन बतिया के चुप. मैंने फिर खोदा. दो लाइन बोल के फिर चुप. माने दोनों बात कर के ही नहीं राजी. मुझे लगा साले ऐसे नहीं मानेंगे. इनको तो उस्तरे से छीलना पड़ेगा.

मैंने पूछा …..और फिर? UP में मुसलमान किसको वोट देगा?

दोनों चुप.

और फिर मैंने दोनों को टांग लिया, 15 मिनट से तुमसे आदमी की तरह बतिया रहा हूँ …….और तुम दोनों हो कि बाज नहीं आ रहे …….. अबे मुझसे बतिया लेगा तो क्या तेरा धरम भ्रष्ट हो जाएगा बे? हम तुम्हें अपना भाई बन्धु सहयात्री मित्र समझ के प्यार से बतिया रहे हैं और तुम कछुआ बने खोल में घुसे हो. काहे इतना कटते हो बे हमसे. एक आम इंसान की तरह हँसते बोलते बतियाते काहे नहीं बे. कब तक इस तरह तेल और पानी की तरह अलग अलग रहोगे बे? क्या मैं तुम्हे खा जाउंगा? क्या मैंने तुमसे कोई तुम्हारे परांठे मांग लिए बे?

जब इस तरह कस के झाड पड़ी तो दोनों लजा गए.

नहीं भाई साहब ….ऐसी कोई बात नहीं ……..

मैंने कहा कि जब ऐसी कोई बात नहीं तो बतियाव ……

जब ऐसी झाड पड़ी तो दोनों मौलाना एकदम मस्त बिंदास बतियाने लगे. दोनों ने अपनी और अपने पूरे खानदान की पूरी history geography civics सब सुना दी मुझे. उनके साथ मिल कर पूरे 5 घंटे खूब हंसी ठट्ठा हुआ. खूब कायदे से दावत उड़ी. दोनों कायदे से राशन ले के चले थे. मुरादाबाद के brass के व्यापारी थे. दिल्ली जा रहे थे काम धंधे के लिए.

जब दिल्ली आने को हुआ तो मुझे लगा कि अब इनकी एक क्लास और लगानी चाहिए. मैंने उन्हें समझाया, अबे कितने मस्त सीधे सादे पारिवारिक आदमी हो तुम दोनों. ये काहे ऐसे खोल ओढ़ के अलग थलग हो रहे हो बहुसंख्यक समाज से? क्यों कट रहे हो? घुल मिल क्यों नहीं जाते. क्यों नहीं त्याग देते इन बाहरी प्रतीकों को ……वो जो तुम्हे हमसे घुलने मिलने में बैरियर बने हुए हैं. मैं भी तो आदमी ही हूँ. मुझे देख के मेरे मजहब या जाति का अंदाजा होता है क्या. तो तुम क्यों ये sign board और ये trade mark लटकाए घूम रहे हो?

अबे ये 24 घंटा काहे मुस्लिम बने रहते हो. सिर्फ मस्जिद में बनो न. बाकी समय इंसान बनो. मेरी तरह.

1950 में जस्टिस मोहम्मद अली करीम छागला ने नेहरु जी को सुझाया था. नेहरू जी ……आज़ाद हिन्दुस्तान में ये तमाम ऐसे पहनावे और प्रतीक चिन्ह ban कर दो जिन से किसी व्यक्ति के धर्म या जाति का बोध होता हो. उन्होंने तो यहाँ तक सुझाया था कि सबके नाम भी बहुसंख्यक समाज वाले हों. हटा दो वो तमाम barrier जो आदमी को आदमी से मिलने से रोकते हैं.

नेहरु में इतने guts ही न थे कि वो ये निर्णय ले पाते.

बहुत से देश आज ये कानून बना रहे हैं.

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