यादों के झरोखे से : ऐसे थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय

  • मनमोहन शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

जनसंघ के प्रमुख नेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी से मेरा प्रथम परिचय 1957 में लखनऊ में हुआ था.

तब मुझे पूजनीय गुरुजी के उत्तर प्रदेश प्रवास के समाचारों के संकलन के लिए ‘हिन्दुस्थान समाचार’ की ओर से लखनऊ भेजा गया था.

गुरुजी को लखनऊ में कार्यकर्ताओं की एक बैठक को सम्बोधित करना था इसलिए मुझे राजेन्द्र नगर स्थित संघ कार्यालय में भिजवा दिया गया. मेरे साथ संघ के एक प्रचारक थे.

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जैसे ही हम संघ कार्यालय पहुंचे तो कार्यालय के बाहर धोती-कुर्ता धारी एक साधारण व्यक्ति साइकिल के पीछे ‘राष्ट्रधर्म’ के बंडल लादे खड़ा हुआ था.

लखनऊ के प्रचारक ने इस व्यक्ति की ओर संकेत करते हुए कहा ‘ये हैं माननीय दीनदयाल जी’.

सच तो यह है कि मैं काफी देर से पंडित जी की चर्चा ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के कार्यालय में सुनता आ रहा था.

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मैंने उनके जिस भव्य व्यक्तित्व की कल्पना कर रखी थी उस खांचे में असली दीनदयाल जी कहीं फिट नहीं थे.

कुछ देर के बाद पंडित जी ‘राष्ट्रधर्म’ के बंडलों को डाकखाने में पोस्ट करने के बाद कार्यालय वापस लौट आए तो मैंने उन्हें अपना परिचय दिया.

पंडित जी ने मुझे पूछा ‘क्या तुम चाय पीते हो’? जब मैंने हां में उत्तर दिया तो वो मेरे पास से उठकर चले गए और कुछ ही देर में चाय का एक गिलास हाथ में लिए प्रकट हुए.

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इसके बाद हमारी कुछ देर आपस में बात हुई. फिर मैं एक कमरे में विश्राम करने के लिए चला गया.

जो लोग पंडित दीनदयाल जी को जानते हैं वो इस बात से बखूबी वाकिफ होंगे कि उनका व्यक्तित्व बहुत ही साधारण एवं सहज था. उनकी कुल पूंजी खादी के दो जोड़े कपड़े होते थे. जिनमें से एक वो पहनते थे और दूसरा उनके झोले में पड़े रहते थे.

पंडित जी अपने कपड़े खुद धोते थे और तह करके सिरहाने रख देते थे. उनका न ही कोई बैंक खाता था और न ही जमा-पूंजी या घर-घाट. उन्हें जो मिलता वही खा लेते.

उनके कपड़े प्राय: जर्जर और फटे हुए होते थे. जिन्हें वो पैबंद लगाकर पहना करते थे. उन दिनों जनसंघ की आर्थिक स्थिति जर्जर थी इसलिए सभी प्रचारक और कार्यकर्ता कम से कम खर्च किया करते थे.

दूसरी बार उनसे मेरा परिचय तब हुआ जबकि हम लखनऊ से दिल्ली के लिए सहयात्री थे. उन दिनों कड़की के दिन थे इसलिए ‘हिन्दुस्थान समाचार’ हो या जनसंघ या फिर संघ, सभी के कार्यकर्ता रेलवे की तीसरी श्रेणी के डिब्बे में ही यात्रा किया करते थे.

इस यात्रा के दौरान मैंने इस बात को महसूस किया कि पंडित जी एक क्षण भी जाया नहीं करते. सारी यात्रा के दौरान वो कार्यकर्ताओं द्वारा प्राप्त पत्रों के उत्तर लिखते रहे या पुस्तक का अध्ययन करते रहे.

जब हमारी ट्रेन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची तो पंडित जी ने मुझसे पूछा ‘आप कहां जाओगे?’. मैंने कहा कि मेरा विचार शाहदरा में अपने मामाजी के पास जाने का है. पंडित जी ने कुछ क्षण सोचा और उसके बाद कहा मैं भी वहीं जा रहा हूं.

जब हम दोनों रेलवे स्टेशन से बाहर निकले तो संघ के एक प्रमुख नेता लाला हंसराज जी की कार बाहर पंडित जी की प्रतीक्षा कर रही थी.

ड्राइवर पंडित को जानता था. इसलिए पंडित जी को नमस्कार करने के बाद अपने पास चलने का आग्रह किया.

दीनदयाल जी ने उत्तर दिया ‘भईया! मैं अभी शाहदरा जा रहा हूं और वहीं रूकूंगा’. इसके बाद मैं और पंडित जी पैदल फुव्वारे जहां से शाहदरा जाने की फटफटियां चलती थीं, पहुंचे.

उन दिनों शाहदरा का किराया एक आना था. हम दोनों के फटफटी में बैठ गए. मेरे पूछने पर दीनदयाल जी ने बताया कि वह संघ के कर्मठ कार्यकर्ता पंडित परमेश्वरीदास से मिलने शाहदरा जा रहे हैं. क्योंकि परमेश्वरीदास जी इन दिनों बीमार चल रहे हैं.

कुछ ही देर में हमारी फटफटी शाहदरा पहुंच गई और हम दोनों उससे नीचे उतर गए. मैं दीनदयाल जी के साथ भगवानपुरा की ओर पैदल चल पड़ा. पंडित परमेश्वरी जी वहीं एक झोपड़ी में रहा करते थे.

जब हम उनकी झोपड़ी में पहुंचे तो परमेश्वरीदास जी दीनदयाल जी को देखकर हैरान रह गए. इसके बाद यह दोनों कार्यकर्ता आपसी बातचीत में खो गए.

जब पंडित ने परमेश्वरीदास जी को बताया कि वो दो दिन उनके साथ प्रवास करेंगे तो परमेश्वरीदास जी संकोच में पड़ गए क्योंकि उनके पास कोई चारपाई नहीं थी और वो फर्श पर ही सोते.

दीनदयाल ने उनके संकोच को भांप लिया औ कहा ‘अरे आप क्यों परेशान होते हैं. मुझे फर्श पर सोने में ही आनन्द आता है’. यह थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी जिन्हें महलों की बजाय झोपड़ी ज्यादा पसन्द थी.

एक अन्य घटना की याद आज भी मेरे स्मृति पटल पर अमिट छाप बनी हुई है.

दीनदयाल जी ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के कार्यालय प्राय: आया करते थे. एक बार जब वह बालेश्वर अग्रवाल जी के पास बैठे हुए थे तो थोड़ी देर में बालेश्वर जी ने मुझसे पूछा ‘क्या दीनदयाल के भाषण का कोई समाचार मेरठ से प्राप्त हुआ है?’

मैंने कहा ‘नहीं.’ तो उन्होंने दीनदयाल जी से कहा ‘आप ही समाचार लिख दो’. दीनदयाल जी हमारी मेज के समीप एक कुर्सी घसीटकर बैठ गए और उन्होंने समाचार की कॉपी लिखनी शुरू कर दी. 15 मिनट के बाद उन्होंने समाचार मुझे थमा दिया.

मैंने समाचार पर एक नजर डाली. समाचार पत्रकारिता की दृष्टि से त्रुटिहीन था. मैंने उसे अपने एक वरिष्ठ सहयोगी को सौंप दिया. दीनदयाल जी ने उस सहयोगी से कहा ‘अरे भईया, इसका सम्पादन कर लीजिए. मेरे से कोई गलती या त्रुटि हो सकती है’.

यह घटना इस बात को सिद्ध करती है कि दीनदयाल जी एक कुशल पत्रकार भी थे.

मैं जब आज के भाजपा के 5 स्टार कल्चर में उलझे कार्यकर्ताओं की तुलना पंडित दीनदयाल जी से करता हूं तो मुझे घोर निराशा होती है.

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