तुम देना मेरा पैगाम अपने मुर्शिद को, इश्क़ कहाँ है कोई रिश्ता

तुमने कहा मुझ से,
तुम्हारे मुर्शिद ने बताया है तुम्हें,
यह रिश्ता आगे नहीं चल सकता,
इसे यहीं छोड़ देना अच्छा;

इश्क़ रिश्ता कहाँ होता है,
न कोई बंधन,
न पाने की चाह,
न खोने का डर,
इश्क़ तो बस इश्क़ होता है;

वो जो चढ़ते सूरज की लालिमा है न,
क्षितिज पर,
और गुलाबी रंग डूबते सूरज के,
गहरे बादल भी गुलाबी हो गए हैं,
वो इश्क़ है;

वो समुन्दर की बल खाती लहरें,
चमकती हुई शाह रात में,
मचलती चाँद को छूने को,
समय के शुरू से,
यह इश्क़ है ;

इक नन्ही सी चिड़िया,
अपनी नन्ही सी चोंच में,
सात – आठ तिनके उठाये,
पानी पे बैठे सी – गल्स,
बिना भीगे, अछूते,
यह भी इश्क़ है;

खुली खिड़कियों से अंदर आते बादल,
झर झर करते झरने,
पहाड़ की एक तरफ अँधेरा,
दूसरी सुनहरी,
सब कुछ ही तो इश्क़ है;

तो तुम देना मेरा पैगाम,
अपने मुर्शिद को,
इश्क़ कहाँ है कोई रिश्ता,
रिश्ते तो उनसे होते हैं,
जो दुनिया में बसते हैं,

मैं तो हूँ इश्क़ में उसके,
जो रहता है मेरे अंदर,
जो बसता है मेरे अंदर,
जो ‘मैं’ ही हो गया है……

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