दो इशरत जहां के… दो आतंक भाव

मैं बात कर रहा हूं बिहार मूल की मुंबई में रहने वाली लश्करे तोयबा की आतंकवादी, गुजरात मुठभेड़ में मारी गयी मरहूम इशरत जहां और बंगाल के हावड़ा की रहने वाली, तीन तलाक के खिलाफ पांच याचिकाकर्ताओं की शुरुआती और मुखर याचिकाकर्ती इशरत जहां के दो अलग-अलग आतंक भावों की.

एक इशरत जो आतंकवादी उर्फ जेहादी बन इस्लामी आतंक का भाव पैदा करती है, तो दूसरी इशरत एक बर्बर, मध्ययुगीन इस्लामी प्रथा तीन तलाक के खिलाफ कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़, कानून बनवा कर स्त्री दासता के पालनहारों के मन में आतंक भाव पैदा करती है.

तीन तलाक पर कोर्ट के आदेश के बाद केंद्र सरकार का आया कानून… साफ चेतावनी है उन समानांतर कुव्यस्थाओं के मज़हबी केंद्रों और पुरुष सत्ताओं को कि यह देश सती प्रथा का यदि अंत कर सकता है तो… किसी भी मज़हबी चादर की आड़ में कोई बर्बरता भी समाज का हिस्सा नहीं बनी रह सकती.

मैं जब-तब अपने गढ़े दो चरित्रों… फरज़ाना बिटिया और उसकी अम्मी, मेरी भाभीजान के जरिये सहज हास्य-व्यंग भाव में मुस्लिम महिलाओं के राजनीतिक-सामाजिक नजरियों को लिखता रहा हूँ.

मेरा मानना है कि 2014 लोकसभा चुनाव के बाद और केंद्र में नई सरकार बनने के साथ ही राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर मुखर और स्वतंत्र अभिव्यक्तियों का एक प्रवाही, लोकतांत्रिक दौर शुरू हुआ.

हालांकि इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाव में बहुत कुछ सकारात्मक रहा और चल रहा है, तो फ्रीडम ऑफ स्पीच के साये तले नकारात्मकताओं ने भी अपनी जगह बनाई.

भारत तेरे टुकड़े होंगे से… उच्चतम न्यायालय से सज़ायाफ्ता अपराधी की फांसी का विरोध करने तक कई उदाहरण इसके गवाह हैं.

आइये इशरत जहां के इसी तुलना के क्रम को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खांचे में डाल कर देखें.

10 फरवरी 2016 को जब अमेरिका की जेल में बंद आतंकवादी डेविड कोलमैन हैडली ने पूछताछ में कबूला कि तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री, वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या के जेहादी मिशन की सदस्या इशरत जहां लश्करे तैयबा की सक्रिय आतंकवादी थी और आतंकी हाफिज सईद ने स्वीकार किया था कि उसकी एक लड़ाका गुजरात में शहीद हुई.

अभिव्यक्ति की आज़ादी ने जब पीछे मुड़ कर देखा तो उसे आतंकी इशरत जहां समेत पांच आतंकियों की मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए तमाम राजनैतिक पार्टियां और मुखर लोग दिखते हैं. शहीद का दर्जा देते हुए चेहरे याद आते हैं.

यही आज़ाद अभिव्यक्ति जब आज अपने सामने देखती है तो उसे तीन तलाक की बर्बरता की शिकार बंगाल की इशरत और उसके पीछे खड़ी हजारों-लाखों इशरतें दिखती हैं जो आज केवल खुशी और संतुष्टि भाव में ही नहीं बल्कि इसका इज़हार भी करती दिखाई देती हैं.

इसी सब के बीच बंगाल की मुखर इशरत जहां भाजपा को एक पार्टी के तौर पर अपनाते हुए भी दिखती हैं.

मुस्लिम धर्मगुरुओं, कट्टरपंथियों, कठमुल्लाओं के खिलाफ और मुस्लिम महिलाओं के हक-हक़ूक़ की इस योद्धा की ‘राजनैतिक अभिव्यक्ति’ की आज़ादी का सम्मान होना ही चाहिए.

उसे यह नैतिक हक है कि जिस सरकार ने उसके और उस जैसी लाखों भारतीय मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को महफूज़ रखा, मज़बूती दी… उसकी पार्टी को अपने सामाजिक मुद्दों के संघर्ष का मंच बनाये.

देखिए न! राजनीति, अभिव्यक्ति की आज़ादी और आतंक के भाव की इन दोनों इशरत जहां में कितनी बराबर मौजूदगी दिखती है. फर्क सिर्फ भाव की नकारत्मकता और सकारात्मकता का है.

एक मज़हबी आतंक के भाव को आत्मघाती आतंकी बन फैलाने निकल पड़ती है, तो दूसरी… तीन तलाक जैसे मज़हबी आतंक से मुक्ति दिलाने का काम करती है.

दोनों इशरतों में एक और समानता देखते चलिये : एक इशरत के आतंक से यह देश डरता है, तो दूसरी इशरत कुछ तंग ज़ेहनों को डराती है… बस एक बार फिर यहां डर के भाव का फर्क है.

सच ही कहा गया है, डरना ज़रूरी है.

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