बनारस के लोगों की प्राथमिकता में ट्रैफिक है ही नहीं

कल का दिन बनारस में बीता.

यूँ तो बनारस की हर गली, कूचा, सड़क जाम रहती है, पर कल का दिन कुछ खास था.

कल पूरा शहरे बनारस हैप्पी न्यू ईयर मनाने सड़कों पर उतर आया था.

जिसे देखो वही अपने बीबी बच्चों और ‘गरल’फ़्रेंड के साथ निकल आया था सड़क पर…

जो शहर आम दिनों में ही जाम रहता है वो ऐसे खास दिन पर क्या करेगा?

बनारस में अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि मोदी जी ने बनारस के लिए कुछ नहीं किया. ट्रैफिक की समस्या जस की तस है.

कल भी ये बात उठी. मेरा बेटा मेरे साथ था.

मैंने कहा कि प्रत्येक समाज की अपनी priorities प्राथमिकताएं होती हैं… बनारस के लोगों की प्राथमिकता में ट्रैफिक है ही नहीं.

आप बनारस की किसी भी सड़क पर निकल जाइये. हर सड़क को चौड़ा करने का प्रयास किया गया है.

अगल बगल के घरों-इमारतों को तोड़ के सड़क को चौड़ा किया गया है. पर हर सड़क पर हर 100-200 मीटर पर कोई न कोई मंदिर विराजमान है.

अब कोई बहुत प्राचीन, कोई ऐतिहासिक मंदिर हो तो बात समझ आती है पर सड़क पर कुल जमा 2 फुट का, एक मंदिर नुमा ढांचा जिसमें कुल 8 ईंट लगी है, वो सड़क के बीचोंबीच विराजमान हैं.

कई पूजास्थल तो ऐसे हैं कि जहां कोई मंदिर नही बल्कि किसी पेड़ पर ही चार ठो धागा लपेट के 4 ठो झंडा लगा दिया और पूजन अर्चन हो रहा है…

अब प्रशासन और सरकार की क्या औकात कि ऐसे पूजास्थल / मंदिर जो सड़क के बीचों-बीच खड़े हैं, हटा दे.

ऐसे में समाज को आगे आना चाहिए कि मंदिर को कहीं और स्थानांतरित/ पुनर्स्थापित कर ले, पर नहीं… और ऐसे कोई 2-4 नही बल्कि सैकड़ों-हज़ारों मंदिर पूरे बनारस में सड़कों के बीचों बीच खड़े हैं.

प्रत्येक सड़क पर आपको हर 100-200 मीटर पर ऐसा एक मंदिर मिल जाएगा.

जिस शहर को अपने मंदिरों से इतना प्रेम है फिर उसे सड़कों-रास्तों से प्रेम त्याग देना चाहिये. भीड़भाड़ और ट्रैफिक जाम की शिकायत नहीं करनी चाहिए. मोटर गाड़ी और कार का भी मोह त्याग कर पैदल चलना चाहिए.

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