आतिश-परस्तों के महलों के कंगूरे उठ रहे हैं….

अरब-भूमि में जब नया मज़हब आकार ले रहा था, लगभग उसी दौरान उस समय की दो बड़ी हूकूमत रोम और फ़ारस के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया.

इसमें फ़ारस वाले रुमियों पर ग़ालिब आये. फ़ारस वाले मजूस यानि अग्निपूजक थे और उधर रोम वाले ईसाई थे.

ये खबर जब हुज़ूर तक पहुँची तो आपने रोमनों के हक़ में ये कहते हुये दुआ की कि ये अग्नि-पूजक मज़ूस तो काफ़िर हैं जबकि ये ईसाई अहले-किताब हैं इसलिये अल्लाह भविष्य में रुमियों को इन मजूसियों पर ग़ालिब करेगा.

उनकी इस दुआ की खबर मजूसियों तक भी पहुँची. ये बद्दुआ सुनकर वो आग-बबूला हो गये.

इधर रसूल साहब ने अपने आस-पास के कई मुल्कों के बादशाहों को दावती खतूत भेजे, एक ख़त ईरान के शाह खुसरो-परवेज को भी भेजा गया.

वो तो इन अरब वालों से पहले से जला-भुना बैठा था इसलिये जैसे ही उसे दावती ख़त मिला उसने उसे टुकड़े-टुकड़े कर जमीन पर फेंक दिया और ख़त लाने वाले को अपने दरबार से भगा दिया.

इस घटना के बाद से ही अरब में जन्मे नये मज़हब वालों ने ये ठान लिया कि इन अग्नि-पूजकों के गुरूर को मिट्टी में मिला देना है. मौका मिला पहले खलीफा हजरत अबू-बकर के समय.

उन्होंने हज़रत ख़ालिद बिन वलीद को कमांडर बनाकर ईरान फ़तह करने भेजा. ईरानी सेनाओं और वलीद की टुकड़ी के बीच दज़ला और फ़ुरात नदियों के बीच जंग हुई पर दुर्भाग्य से मजूसी हार गये मगर इधर हजरत अबू-बकर का देहान्त हो गया और अरब ईरान पर कब्ज़ा नहीं कर सके.

ईरान को जीतने की मंशा लिये अरबों ने हज़रत ऊमर के खिलाफ़त के दौर में ईरान पर लगातार आक्रमण किये.

रुस्तम, जाबान और नरसी जैसे मजूस वीर लगातार इन उन्मादियों से अपने वतन की रक्षा करते रहे, हजारों ईरानी सैनिक बलिदान हुये और आहिस्ता-आहिस्ता ईरान पर अरबों का कब्ज़ा हो गया.

ईस्वी सन 643 में अग्निपूजकों के राज्य का सूर्य पूरी तरह डूब गया. अग्नि-पूजक मज़ूस जिनको अपने आहुर-मज़्दा से सच्चा प्रेम था वो समंदर के रास्ते जान बचाते हुये वहां से निकल गये और जो वहां रह गये उन्होंने प्राण-रक्षा के लिये मजहब-परिवर्तन को नियति का लेखा मानकर स्वीकार कर लिया.

कहते हैं कि जब आख़िरी फतह हो चुकी थी तो एक ईरानी सेनापति से किसी अरब ने कहा – “अब समझ में आया कुफ्र और तौहीद का फ़र्क? हम अरब तुम्हें अब सच्चे दीन की तालीम देंगें”.

इस पर उस ईरानी सेनापति ने उससे कहा, “रेगिस्तान के जाहिल लालची बद्दू… तुम लोग सिर्फ और सिर्फ हमारे माल और दौलत के लिये आये हो इसे दीन या मज़हब का नाम न दो”.

फिर गुलामी के लंबे कालखंड ने उनसे उनका सब छीन लिया पर प्रतिशोध की ज्वाला उनके मन में सुलगती रही.

अरब से दुश्मनी का जरिया उन्होंने शिया मत को बना लिया और शिया पंथ का आश्रय लेकर अरबों से जंग करते रहे.

इस्लाम में जितने भी फितने उठे सब ईरानियों ने उठाये. हज़रत उस्मान से लेकर अली की खिलाफ़त के दौरान हुये तमाम साजिशों के पीछे यही लोग थे. शिया-पंथ के नाम पर इन्होंने हमेशा अरबों को अपने से कमतर ही माना.

काबे के मुक़ाबिल पर इन्होने नजफ़ और कर्बला को खड़ा कर दिया. अपनी अलग किताबें बना ली. प्रथम तीन खिलाफत और अरबों की लिखी हदीसों का इंकार कर दिया.

इन आतिश-परस्तों के सीने में ये हमेशा चुभता था कि महान ‘किसरा राज्य’ की संततियां किन जाहिलों की गुलामी कर रही है?

इस ईरान में फिर रजा शाह पहलवी पैदा हुये, बेशक मुस्लिम थे पर अरब सभ्यता के गुलाम नहीं थे. उन्हें ये एहसास हो गया था कि सिर्फ फितने खड़े करने और अरब से बदला लेने भर से मजूसी सीने में जल रही आग नहीं बुझेगी.

उन्हें ये भी एहसास हो गया था कि उनके मुल्क को अरब ने या इस्लाम ने नहीं गढ़ा, उनको सभ्यता जाहिल बद्दुओं ने नहीं सिखाई बल्कि ये तो तब से वजूद में है जब इस्लाम का उद्भव भी नहीं हुआ था.

कुरान तो 1300 पहले नाजिल हुई किताब है पर हम भी जाहिल नहीं थे, हमारे पास भी एक आसमानी किताब थी जिसका कलाम शायद दुनिया में वेदों के बाद सबसे सशक्त और मुकद्दस है.

हमारे अपने पूर्वज भी थे जो पैदा तो इस्लाम से पूर्व हुए थे पर जिनकी कीर्ति-पताका सारी दुनिया में फ़ैली हुई थी और सारे दुनिया में हमारे उन पूर्वजों के किसरा साम्राज्य की धूम मची हुई थी.

हमारे उन पूर्वजों की तलवार से रोमन शासन पनाह मांगता था. हमारे पूर्वज हमारे ऊपर थोपे गये इस गुलामी के चिह्न को मिटाने की कोशिश में बलिदान हुये थे.

इस गौरवबोध को लेकर नवजागृत रजा शाह ने ईरान में एक इंकलाब बरपा कर दिया, खुद को उन्होंने मुस्लिम से पहले एक आर्य कहा और इसलिए सदियों से चले आ रहे अपने मुल्क का नाम फारस से बदलकर ईरान कर दिया…

क्योंकि ईरान (या एरान) शब्द आर्य मूल के लोगों के लिए प्रयुक्त शब्द एर्यनम से निकला है, जिसका अर्थ है आर्यों की भूमि. यानि रजा शाह ने ईरान को इस्लाम की भूमि नहीं बल्कि आर्यों की भूमि घोषित किया.

1930 का उनका पूरा दशक ईरान में इसी गौरव-बोध को जागृत करने में गुजरा. उन्होंने शिक्षा में अभूतपूर्व सुधार किये, उन्मादी मजहबी शिक्षा को कड़ाई से रोका और कट्टरपंथी उलेमाओं को या तो जेल में डाल दिया या फिर देश से निकाल दिया.

समाज और राष्ट्र जीवन के हर काम से उन्होंने इस्लाम को अलग कर ईरान को बिलकुल पश्चिमी मुल्कों की तर्ज़ पर संवारा.

अतीत का गौरव जागृत करने और पूर्वजों की स्मृति सहेजने और संजोने के लिए उन्होंने स्कूल, कॉलेज, सड़क और अस्पतालों के नाम रुस्तम, सोहराब, जमशेद जैसे अपने महान पारसी पूर्वजों के नाम पर रखवाए.

पुरानी गौरवशाली सभ्यता के चिह्न खोजे जाने लगे पर दुर्भाग्य से किसी कारणवश ईरान फिर से खुमैनी जैसे मज़हबी उन्मादियों की गिरफ़्त में आ गया.

नये साल की पूर्व-संध्या से ही ईरान के लोगों में रजा शाह पहलवी की आत्मा जाग्रत हो गई है.

जरथुस्त्र कहते थे कि झूठ (बातिल) से जंग बिना नारी-शक्ति को साथ लिये नहीं लड़ी जा सकती.

जरथुस्त्र ये भी कहते थे कि स्वर्ग का पिता अग्नि-परीक्षा के जरिये से अंतिम-निर्णय देगा कि कौन अच्छा है कौन बुरा है और फिर वह पापियों को दण्डित करेगा.

इसी आशा और विश्वास को लिये ईरान की शक्तियाँ (नारी) आज सड़कों पर हैं गुलामी के हर चिह्न को फेंक देने के लिये, अपने पूर्वज रुस्तम और जमशेद को उनका खोया सम्मान दिलाने के लिये, अपने घर में फिर से अनवरण अग्नि जलाने के लिये, अपने जेंदा-अवेस्ता के पुनर्स्थापन के लिये, अपने आहुर-मज़्दा की स्तुति गीत गाने के लिये और अपने आर्य-गौरव को पुनः धारण करने के लिये.

सीरत लिखने वाले सुन्नी इतिहासकार कहते हैं जब मक्का-मुकर्रमा में हुज़ूर की विलादत हुई थी तो ‘किसरा राज’ के अग्नि-पूजक शहंशाह के महलों के कंगूरे गिर गये थे… आज वही कंगूरे उठ-उठ के खड़े हो रहे हैं.

प्रकृति बैक-ग्राउंड में अपना काम बड़े सलीके से करती है… इसलिये कभी-कभी हम जैसों को उस सृष्टा के कामों के मधुर संगीत को खामोश होकर सुनना चाहिये… स्वर्गिक आनंद आता है.

अटल जी होते तो कहते… दुनिया का इतिहास देखता… रोम नहीं, यूनान नहीं है पर घर-घर में सुबह अग्नि जलाता वह उन्नत ईरान यही है… वह उन्नत ईरान यही है.

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