नए वर्ष की डायरी से : किसी को छोड़ देना इतना मुश्किल नहीं होता जितना अपना बनाना

खुदा को कौन सी सूरत से वो अपना बना लेगा
कि जिस इंसान से इंसान को अपनाया नहीं जाता – हजीम शबाब औरंग

जीवन का बहुत बड़ा सत्य उजागर करती हुई पंक्तियाँ है ये…. किसी को छोड़ देना इतना मुश्किल नहीं होता जितना किसी को अपना बनाना.

ऐसा सभी के साथ होता है, कोई हर्ज़ नहीं. हर्ज़ तो तब है जब आत्म विश्लेषण की प्रक्रिया में सभी के साथ होने वाली बात आपको अपने साथ बड़ी ओछी सी लगने लगे. सिर्फ यही बात नहीं बल्कि हरेक के जीवन में कोई न कोई ऐसी बात ज़रूर होती है, जिसको नहीं होना चाहिए और क्या करें नहीं छोड़ा जाता के बीच रखा जा सकता है. और हम अपने आप को हमेशा इसी रस्साकशी में पाते हैं. इस तनाव से मुक्ति के लिए हम हमेशा समय का आसरा लेते हैं लेकिन समस्या को टालने से उसका हल तो नहीं निकल आता ना? वही समस्या अपने नए रूप के साथ आपके सामने फिर खड़ी हो जाती है.

लोग चिंतन मनन किस वस्तु को कहते हैं नहीं जानती, लेकिन मैं अक्सर ऐसी ही समस्याओं पर विचार और पुनर्विचार करती रहती हूँ. कोई प्रत्यक्ष परिणाम शायद उस समय नज़र न आए लेकिन कभी किसी दिन अपने ही व्यवहार में अचानक कोई नई बात महसूस होती है. अच्छी या बुरी तो वस्तुस्थिति पर निर्भर करता है लेकिन हम हमारे स्वभाव के किसी नए पहलू को उजागर कर लेते हैं अनुकूल होने पर उसे दोबारा आने के लिए स्वतन्त्र छोड़ देते हैं और अनुकूल न होने पर आत्म-विश्लेषण की चक्की में उसे दोबारा डाल देते हैं.

आज का सबक

कभी कभी अपनी ही अपेक्षा के विपरीत कोई ऐसा काम कर लेना चाहिए जो हमारी स्थापित धारणा की नींव हिला दे.

– माँ जीवन शैफाली की डायरी से

नए वर्ष की डायरी से : जीवन का एक नया राग

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