महारथी नागनिका : दुनिया में पहली रानी, जिनका अपना सिक्का चलता था

विदेशी इतिहास की तुलना में अगर भारतीय मंदिर स्थापत्य को देखें तो एक अनोखी सी चीज़ आपको ना चाहते हुए भी नजर आ जायेगी.

आप जिस भी प्रसिद्ध मंदिर का नाम लेंगे, पूरी संभावना है कि उसका पुनर्निर्माण रानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया होगा.

दिल्ली के कालकाजी मंदिर से काशी के ज्ञानवापी तक कई इस्लामिक आक्रमणकारियों के तुड़वाए मंदिरों के जीर्णोद्धार का श्रेय उन्हें ही जाता है.

इसी क्रम को थोड़ा और आगे बढ़ा कर अगर ये ढूँढने निकलें कि जीर्णोद्धार तो चलो रानी ने करवाया, बनवाया किसने था?

तो हुज़ूर आपको आसानी से राजवंश का नाम मिलेगा. थोड़ा और अड़ जायेंगे तो पता चलेगा कि ज्यादातर को बनवाया भी रानियों ने ही था.

कईयों के शिलालेख बताते हैं कि किस रानी ने बनवाया. धूर्तता की अपनी परंपरा को कायम रखते हुए इतिहासकार का वेष धरे उपन्यासकार ये तथ्य छुपा ले जाते हैं.

काफी लम्बे समय तक भारत में परिचय के लिए माँ का नाम ही इस्तेमाल होता रहा है. पिता के नाम से परिचय देने की ये नयी परिपाटी शायद इस्लामिक हमलों के बाद शुरू हुई होगी.

अक्सर बचपन में जो लोग ‘नंदन’ पढ़ते रहे हैं उसका ‘नंदन’ भी अर्थ के हिसाब से यही है. नामों मे ‘यशोदा नंदन’, ‘देवकीनंदन’, भारतीय संस्कृति में कभी अजीब नहीं लगा.

हाँ इसमें कुछ कपटी कॉमरेड आपत्ति जताएंगे कि ये तो पौराणिक नाम हैं, सामाजिक व्यवस्था से इनका कोई लेना देना नहीं.

ये भी छल का एक अच्छा तरीका है. ये आसान तरीका इस्तेमाल इसलिए हो पाता है क्योंकि भारत का इतिहास हज़ारों साल लम्बा है.

दो सौ-चार सौ, या हज़ार साल वालों के लिए जहाँ हर राजा का नाम लेना, याद रखना आसान हो जाता है, वहीँ भारत ज्यादा से ज्यादा एक राजवंश को याद रखता है, हर राजा का नाम याद रखना मुमकिन ही नहीं होता.

भारत के आंध्र प्रदेश पर दो हज़ार साल पहले सातवाहन राजवंश का शासन था. इनके राजाओं के नामों में ये परंपरा बड़ी आसानी से दिखती है.

सातवाहन राजवंश का नाम सुना हुआ होता है, और इसके राजा शतकर्णी का नाम भी यदा कदा सुनाई दे जाता है. कभी पता कीजिये शतकर्णी का पूरा नाम क्या था?

अब मालूम होगा कि शतकर्णी नामधारी एक से ज्यादा थे. अलग अलग के परिचय के लिए ‘कोचिपुत्र शतकर्णी’, ‘गौतमीपुत्र शतकर्णी’ जैसे नाम सिक्कों पर मिलते हैं. एक ‘वाशिष्ठीपुत्र शतकर्णी’ भी मिलते हैं.

ये लोग लगभग पूरे महाराष्ट्र के इलाके पर राज करते थे जो कि व्यापारिक मार्ग था. इसलिए इन नामों से जारी उनके सिक्के भारी मात्रा मे मिलते हैं.

कण्व वंश के कमजोर पड़ने पर कभी सातवाहनों का उदय हुआ था. भरूच और सोपोर के रास्ते इनका रोमन साम्राज्य से व्यापारिक सम्बन्ध था.

पहली शताब्दी के इनके सिक्के एक दूसरे कारण से भी महत्वपूर्ण होते हैं. शक्तिशाली हो रहे पहले शतकर्णी ने ‘महारथी’ राजकुमारी नागनिका से विवाह किया था.

नानेघाट पर एक गुफा के लेख में इस पर लम्बी चर्चा है. महारथी नागनिका और शतकर्णी के करीब पूरे महाराष्ट्र पर शासन का ज़िक्र भी आता है.

दुनिया में पहली रानी, जिनका अपना सिक्का चलता था वो यही महारथी नागनिका थीं. ईसा पूर्व से कभी पहली शताब्दी के बीच के उनके सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि में, सिक्कों के बीचो बीच ‘नागनिका’ लिखा हुआ होता है. उनके पति को विभिन्न शिलालेख ‘दक्षिण-प्रजापति’ बताते हैं.

चूँकि शिलालेख, गुफाओं के लेख कई हैं, इसलिए इस साक्ष्य को नकारना बिलकुल नामुमकिन भी हो जाता है. मर्दवादी सोच होने की वजह से शायद ‘महारथी’ नागनिका का नाम लिखते तथाकथित इतिहासकारों को शर्म आई होगी.

बाकी अगर पूछने निकलें कि विश्व में सबसे पहली सिक्कों पर नाम वाली रानी का नाम आपने किताबों मे क्यों नहीं डाला? तो एक बार किराये की कलमों की जेब भी टटोल लीजियेगा, संभावना है कि ‘विक्टोरिया’ के सिक्के निकल आयें!

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