साधारणतः दो अज्ञानी व्यक्तियों के बीच की ही संभावना है गर्भाधान

प्रश्न : बुद्ध, महावीर और क्राइस्ट जैसे लोग ज्ञानोपलब्धि के बाद भी क्या गर्भाधान करवा सकते हैं? और वे पुनः संभोग क्यों नहीं करते ताकि श्रेष्ठ आत्मा को जन्म दे सकें? और क्या गर्भाधान दो अज्ञानी व्यक्तियों के बीच की ही संभावना है?

ओशो : साधारणतः गर्भाधान दो अज्ञानी व्यक्तियों के बीच की ही संभावना है. यह समझने जैसा है. महावीर या बुद्ध जैसे व्यक्ति जन्म देने को राजी न होंगे. दो कारणों से.

एक तो वे किसी भी व्यक्ति को जीवन-मरण की यात्रा पर भेजने की तैयारी नहीं दिखा सकते. वे किसी भी व्यक्ति के जीवन और मृत्यु की लंबी यात्रा के लिए कारण नहीं बन सकते.

असल में महावीर और बुद्ध जैसे व्यक्ति तो हम सबको ऐसे जगत में भेजने के लिए उत्सुक हैं जहां से लौटना न हो, जहां से फिर जीवन न हो. वे तो आवागमन से मुक्त कराने के लिए आतुर व्यक्ति हैं. हम सब लोगों को आवागमन से मुक्त कराने के लिए आतुर व्यक्ति हैं. हम किसी को इस पृथ्वी पर लाना चाहते हैं, महावीर और बुद्ध किसी को इस पृथ्वी से मुक्त करना चाहते हैं.

महावीर और बुद्ध भी कहीं जन्म देना चाहते हैं, लेकिन वह मोक्ष है, जहां वे जन्म देना चाहते हैं. कहीं पहुंचाना चाहते हैं जहां शरीर नहीं है, जहां दुख नहीं है, जहां पीड़ा नहीं है. वे भी जीवन भर दौड़ रहे हैं आपके किसी नए जन्म के लिए, लेकिन आपके शरीर के जन्म के लिए उनकी आतुरता नहीं है.

बुद्ध के जीवन में एक मीठी घटना है, वह आपसे कहूं तो समझ में आ सके.

बुद्ध बारह वर्ष बाद घर लौटे हैं. तो वे अपने पुत्र राहुल को सिर्फ एक दिन का छोड़ कर भाग गए थे. अब वह बारह वर्ष का हो गया है. उसकी मां स्वभावतः बुद्ध पर नाराज रही है. और अपने बेटे को भी उसने बुद्ध के खिलाफ बहुत बातें कही होंगी. अपने बेटे को भी उसने काफी तैयार कर रखा है कि जब बुद्ध आयें, तो उनसे झगड़ना ही है.

फिर बुद्ध आए तो उसने अपने बेटे से कहा, अपने हाथ फैलाकर इस भिखारी बाप से मांग ले कि बेटे के लिए वसीयत क्या है? बेटे के लिये क्या है? जन्म दिया था सिर्फ, अब जीवन के लिए पाथेय भी दे दें.

मजाक था, क्रूर मजाक था. व्यंग्य था और अत्यंत गहरा था. लेकिन क्षमा किया जा सकता है यशोधरा को. क्योंकि बिना पूछे बुद्ध उसे छोड़कर चले गए थे. उसका क्रोध स्वाभाविक ही है. कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह घटना घटेगी.

बुद्ध ने आनंद से कहा, आनंद, मेरा भिक्षा-पात्र कहां है? राहुल को मेरा भिक्षा-पात्र दे दो और इसे संन्यास में दीक्षित करो. वह यशोधरा तो छाती पीटकर रोने लगी.

उसने कहा, यह क्या कर रहे हैं. बुद्ध ने कहा, जिस परम धन को मैंने पाया है, वसीयत में वही मैं अपने बेटे को भी देना चाहता हूं. जिस परम आनंद की यात्रा पर मैं गया हूं और जिन खजानों को मैंने खोज लिया है, वही तो मैं अपने बेटे को भी दे देना चाहता हूं.

राहुल दीक्षित कर लिया गया. बारह साल का छोटा-सा लड़का संन्यासी हो गया. बुद्ध को औरों ने भी कहा, ऐसा मत करें. बुद्ध के पिता ने भी कहा कि तू घर छोड़कर गया और जो हमारी आंखों का एकमात्र तारा है, तू उसको भी हटा रहा है. फिर इस राज्य का मालिक कौन होगा?

तो बुद्ध ने कहा कि मैं एक और बड़े महाराज्य की खबर लाया हूं. यह बहुत छोटा राज्य है और इसके लिए उसको छोड़ना बड़ा महंगा सौदा है. मैं एक महाराज्य की खबर लेकर आया हूं और उस महाराज्य का महासम्राट बनाता हूं इसे.

पिता ने दुख में ही बुद्ध को कहा कि फिर हमें भी तू दीक्षा दे दे. बुद्ध ने कहा, इससे शुभ और क्या हो सकता है! और अपने पिता को भी दीक्षा दे दी.

फिर यशोधरा चिल्लाने लगी, मुझे यहां अकेला किस लिए छोड़ देते हैं, तो मुझे भी दीक्षा दे दें. बुद्ध ने कहा, इससे शुभ और क्या हो सकता है. फिर वह पूरा घर दीक्षित हो गया.

अब यह बुद्ध जैसा व्यक्ति भी जन्म दे रहा है, किसी और महाराज्य में, किसी और जीवन में. इस शरीर की कैद में किसी आत्मा को लाने के लिए बुद्ध और महावीर जैसे व्यक्ति, ज्ञान के बाद राजी नहीं हो सकते.

ऐसा ही समझें कि एक जेलखाना है. जेलखाने में रहने वाले लोगों को कुछ भी पता नहीं है कि बाहर भी एक दुनिया है फूलों की, सूरज की, चांद-तारों की, खुले हुए आकाश की, आकाश में उड़ते हुए पक्षियों की. उन्हें कुछ भी पता नहीं है. वे सदा से वहीं हैं. वे वहीं पैदा हुए हैं.

फिर एक दिन ऐसा आता है कि एक आदमी जेल की दीवार पर चढ़ कर एक खुला आकाश, चांद-तारे, सूरज, पक्षियों के गीत आदि को देख लेता है. और उस आदमी से उसकी पत्नी कहती है कि और लोग बच्चे पैदा कर रहे हैं, तुम बच्चे पैदा नहीं करोगे?

तब वह आदमी कहता है कि इस कारागृह में मैं किसी को भी जन्म न देना चाहूंगा. मेरा बच्चा तो कम से कम इस कारागृह में नहीं हो सकता है. अब अगर जन्म ही देना है तो उस खुले आकाश की यात्रा में जन्म दूंगा.

लेकिन उस जेल के भीतर कौन समझेगा इस बात को? ये कैदी कहेंगे, पागल हो गए हो, लौट आओ अपने घर. अपने घर मतलब अपनी सेल, अपनी कोठरी. और वह आदमी कितना ही कहे कि चांद, सूरज, फूल वहां होंगे, वे कुछ भी न समझेंगे. क्योंकि उन्होंने न चांद देखा, न सूरज देखा, न फूल देखे. उन्होंने सिवाय अंधकार के और जंजीरों के कुछ भी नहीं देखा है.

हो सकता है जैसे हम आज यहां पूछ रहे हैं, वैसे ही वे लोग भी पूछेंगे, क्या कोई आदमी कारागृह की दीवालों पर बैठने के बाद एक बार लौटकर बच्चे को जन्म दे सकता है? या कि केवल वे ही लोग बच्चों को जन्म देते हैं जो कभी दीवाल पर चढ़कर नहीं खड़े हुए हैं? ठीक वैसा ही हमारा सवाल है.

बुद्ध और महावीर जिस जगत को, जिस जीवन को, जिस महाजीवन को देख रहे हैं, उस जीवन का हमें कुछ भी पता नहीं. हम इस शरीर में, इस छोटे-से शरीर के कारागृह में बंद हैं. जिंदगी भर इस कारागृह को लिए घूमते रहते हैं.

हम सोचते हैं, बड़ा जीवन यहीं है. तो हम सोचते हैं कि इसमें और आत्माओं को जन्म दो न, और अच्छी आत्माओं को लाओ न. बुद्ध और महावीर इस कोशिश में लगे हैं कि यहां से बुरी आत्माओं को भी भेज दें, छुटकारा दिला दें. और हम इस कोशिश में लगे हैं कि और अच्छी आत्माओं को यहां ले आयें.

हमारी और उनकी दृष्टि में, हमारे और उनके डायमेंशन में, आयाम में बुनियादी फर्क है. इसलिए हमें खयाल में नहीं आ सकता. ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति जन्म नहीं दे सकता है. नहीं दे सकता है इसलिए कि किसी को कारागृह में डालने की जिम्मेवारी नहीं ले सकता है.

हां, वह जन्म दे सकता है किसी और विराट मुक्ति के जीवन में, किसी परम स्वतंत्रता में. लेकिन वह जन्म शरीर का जन्म नहीं, आत्मा का जन्म है. वह जन्म दिखाई पड़ने वाले का जन्म नहीं, अदृश्य का जन्म है. ज्ञात का नहीं, अज्ञात का जन्म है.

महावीर और बुद्ध ने ऐसे बहुत जन्म दिए हैं. महावीर के पचास हजार संन्यासी थे. महावीर इनके लिए पिता से क्या कम हैं? निश्चित ही ज्यादा हैं! बुद्ध के हजारों संन्यासी थे. बुद्ध क्या इनके लिए पिता से कम हैं? पिता से बहुत ज्यादा हैं.

पिताओं ने क्या दिया है जो इन्होंने दिया है. लेकिन वह जिन्हें मिला है, केवल वे ही जान सकते हैं. हमारी अपनी कठिनाइयां हैं, हमें कुछ भी पता नहीं, इसलिए हम ऐसे सवाल उठा सकते हैं. इसलिए समझ लेना उचित है कि ऐसे सवालों को भी हम समझ लें.

आज के लिए इतना काफी!

ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं चदरिया, प्रवचन -12

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