नए वर्ष की डायरी से : जीवन का एक नया राग

ग्रीष्म ऋतु की भटकती चिड़िया
मेरी खिड़की तक आती है
गाने और फिर उड़ जाने के लिए..
और शरद ऋतु की पीली पत्तियाँ
जिनके पास गीत नहीं हैं, फड़फड़ाती हैं,
भूमि पर गिर पड़ती है…

…. और कुछ भी लिखने से पहले या लिखते समय मुझे यही अनुभव होता है कि मैं शरद ऋतु में भूमि पर पड़ी उन पीली पत्तियों को एकत्र करके अपनी डायरी में सहेजने का प्रयास कर रही हूँ.

मेरे शब्दों में और इन पीली पत्तियों में मुझे बहुत समानता दिखाई देती है. जब ये पत्तियाँ वृक्षों में हरी थी, हवा संग झूमती थी तब वह अपने आनंद की चरम सीमा पर थीं. और फिर समय के साथ इनके रंग रूप में परिवर्तन आया और एक दिन इन्हें वृक्षों से अलग होना पडा.

अपने जीवन की अंतिम सांस तक वह उस परम आनंद की गीत गाती हुई नज़र आती है. और जब वृक्षों से गिरकर वापस उसी भूमि में मिल जाती है, जहां से इनका उद्गम हुआ था, तो अपने पीछे कई नई कोंपलें और किसलयों को छोड़ जाती है.

मेरे शब्द भी जब अनुभव की प्रक्रिया से गुज़र रहे होते हैं, घटना और विचारों के वृक्ष पर लहलहा रहे होते हैं तब वे अपने आनंद की चरम सीमा पर होते हैं. फिर समय के साथ उनके रंग रूप में परिवर्तन आता है. विचारों के वृक्ष से जब वो पीली पत्तियों की भाँति झड़ने लगते हैं, तो मैं उन्हें सहेजकर अपनी डायरी में रख लेती हूँ.

ये मेरे शब्द वही समेटी हुई पीली पत्तियां हैं, जो खुद अपनी हरियाली और परम-आनंद की कहानियां कहती हैं. अपने उन दिनों की व्यथा और कथा कहती हैं जब वो किसी कविता की आत्मा में गुनगुनाया करती थीं और मिटने से पहले वो कविता को देह का वरदान दे जाती हैं…..

नव वर्ष,
यूं तो तुम हर साल आते हो
और मैं सहज रहने का भरसक प्रयास करती हूँ
हालांकि मुझे पता है
कि तुम हर बार मेरे अन्दर
कोई नया तार झंकृत कर जाते हो,
और तब मुझे पता चलता है
कि मैंने जीवन का
एक नया राग सीख लिया है…

आज का सबक – दिन के हर घंटे के बाद यदि हम पांच मिनट का अंतराल लेकर बीते एक घंटे में किए अपने अभिनय पर एक पुनर्दृष्टि डालें, तो अगले एक घंटे के अभिनय में काफी सुधार लाया जा सकता है.

… जीवन के रंगमंच का सबसे अच्छा अदाकार ही इस नाटक को अंत तक चलाए रख सकता है…

– माँ जीवन शैफाली की डायरी का पहला दिन

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