नव वर्ष में फलीभूत होती एक प्रार्थना

ma jivan shaifaly article sun and earth

कल, अलसुबह
जब, आसमान पूरी रात की प्रसव-पीड़ा के बाद
एक नन्हा सूरज….
तुम्हें उन तमाम प्रतिक्षाओं के सुफल में देगा
जो, तुमने गुजरतें वक़्त की शिराओं में सहेजी थी

तो, हो सकता है किसी के लिये
वह, एक सुहागन के माथे की बिंदिया हो
या किसी ठिठुरते तन के लिये
एक बूढ़ी दादी के हाथ मे सुर्ख-नारंगी ऊन का गर्म गोला
या, दूर क्षितिज में टिमटिमाता हुआ एक लैम्प पोस्ट
जिसके नीचे बैठकर
तारो व चाँद ने, सूरज की प्रतीक्षा में कोरस गाया था
उस कोरस में उन्होंने कुछ प्रार्थनाएँ सहेजी हैं…

उन प्रार्थनाओं में प्रांजल बूंद की उस विदाई का भी जिक्र होगा
जो, अब हरी दूब से सप्तम स्वर की भाँति विलोपित होकर भी मौजूद है
वहीं कहीं एक गौरेया भी नीड़ के तिनके चुन रही होगी

तुम, उसे एक गर्भधारिणी स्त्री समझ, समाधिस्थ होने देना
उस दौरान तुम अल्पकालीन निद्राभ्यास करते हुए यह देख पाओगे कि
ब्रह्माण्ड की सारी गर्भवती प्राणशक्ति
एक समान ईश्वरीय चेहरा, क्यों दिखती है
चाहे, वह ठंड में पाले के प्रहार से बचती हुई
गर्भवती गेहूँ की बालियां ही क्यों न हो…..

तुम, नींद से जागकर पाओगे कि
नींद के आगोश से वापसी
पुनः जिंदा रहने का अनुपम अहसास था,
सच तो यह है कि
नींद, तुम्हारी मृत्यु का एक पूर्वाभ्यास है…
अब, तुम्हे नींद को वरदान समझ
मृत्यु को वांछनीय प्रतीक्षा रूप में स्वीकार करना है

एक प्रार्थना,
उन ह्रदयों के लिये जरूर सहानभूति लिए होगी
जिन्होंने, तुम्हारे साथ छद्म भावनाओं के मल्ल-युद्ध किये..
घात-प्रतिघातों के शुलों से ह्रदय की जमीन को
आँसुओं के लिये उपजाऊ बना दिया
उनके प्रति तुम्हे सबसे अधिक दयालु व प्रेमिल रहना है

क्योंकि उन्होंने तुम्हे अपना सर्वोत्तम दान किया है
और तुम्हें आगामी अनुभवों के लिये अधिक संवेदनशील बना दिया है
लेकिन, उसी वक़्त तुम्हें यह भी याद रखना चाहिये
कि, अतीत की धड़कनें व वर्तमान की साँसों में बहुत
बड़ा फर्क होता है ।

इन प्रार्थनाओं की पोटली बेहद मजबूत होगी
वहाँ एक प्रार्थना
उन जीवट पेड़ो के लिये भी रखी होगी
जो, तुम्हारी अनगिनत यात्राओं को सुगम बनाते हुए
अचर साथी बनते हैं

तुम्हें उन पेड़ों से, समय को पथिक की भूमिका में
देखते हुए यह सीखना होगा कि
जीवन-पथ में साक्षी भाव से उतरने मात्र से
भावनाओं के वाहन बहुत ज्यादा विचलित नहीं करते हैं

हो सकें,
तो इन प्रार्थनाओं को आती नारंगी-बैंगनी सांझ में
वापस उसी लैम्प पोस्ट पर छोड़ आना
जहाँ, तारे व चाँद इस बात की तसदीक कर सकें कि
अब, तुमने भी लौटाना सीख लिया है
ताकि, हर रात
जब भी आसमान वेदना काल से गुज़रे
तो, यह सोचकर जन्मोत्सव की तैयारी कर सके कि

तुमने,
किसी एक जीवन के लिये
इस संसार में कुछ प्रतिक्षाओं के तले
प्रार्थनाओं को अनवरत जन्म देने की अकूत सामर्थ्य
विकसित कर ली है.

मंजुला बिष्ट

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