मदारी और देवकन्या

खुद ही मदारी बनकर खेल रचता है, खुद ही जमूरा बनकर करतब दिखाता है और खुद ही दर्शक बनकर ताली पीटता है… अद्भुत कला थी उसमें अपनी ही दुनिया में मायाजाल रचकर जीवन भर उसमें उलझे रहने को वास्तविक आनंद समझने लगा था…

देवलोक की एक कन्या का एक दिन वहां से गुज़रना हुआ…

उसकी अद्भुत कला को देखकर अचंभित होती है… इस आदमी को पता ही नहीं ब्रह्माण्ड का कौन सा स्वर्णिम सूत्र इसके हाथ लग गया है… वो मायाजाल नहीं माया के परिवार से मिली वो कला है जिसका वास्तविक उपयोग इसको पता ही नहीं…

देवलोक की कन्या को लगता है, यदि वो उसे इस सूत्र का वास्तविक उपयोग सिखा देगी तो उसे पिछले जन्म की उस विस्मृत कला का ज्ञान हो जाएगा जिसकी झलक मात्र से आज वो इतना बड़ा खेल रच रहा है.. जब उसका ज्ञान हो जाएगा तो ब्रह्माण्डीय स्तर पर होनेवाली माया को वो समझ सकेगा…

उसको पिछले जन्म की विस्मृत बातों को याद दिलाने के लिए उसे उसके मस्तिष्क और ह्रदय पर कई प्रहार करने पड़े…. कभी प्रेम से कभी पीड़ा से…. इस प्रक्रिया में देव कन्या को उस मदारी से प्रेम हो जाता है…. वो अपनी जान लगा देती है कैसे भी उसे पिछली बातें याद आ जाए…. इधर उसके देवलोक में लौटने का समय करीब आता जाता है….

देव लोक से बुलावे पर बुलावे आने लगते है… और वो अपने जीवन का अनमोल समय देवलोक में गिरवी रखकर थोड़ा सा और समय मदारी के लिए उधार ले लेती है… बस ये अंतिम प्रहार होगा उसके ह्रदय पर और उसे सब याद आ जाएगा…

अब तक उसके प्रहार बड़े प्रेम पूर्ण थे मदारी को अधिक पीड़ा नहीं हो रही थी… तो वो समझ नहीं पा रहा था… इधर देवकन्या का आखरी समय भी ख़त्म होने की कगार पर था… उसके पास एक ही रास्ता था कि वो उसके ह्रदय पर इतना जोर से प्रहार करे कि उसके सारे सुप्त बिंदु जागृत हो जाए लेकिन उसके इस प्रहार से मदारी के ह्रदय में उसके लिए नफरत हो जाएगी ये भी उसे पता था… एक तरफ उसका प्रेम था दूसरी तरफ मदारी की आगे की यात्रा…

वो अपने प्रेम की परवाह किये बिना एक ज़ोरदार प्रहार उसके ह्रदय पर करती है…

मदारी के अन्दर एक अद्भुत परिवर्तन देखती है लेकिन वो उसकी खुशी का कारण बन पाता उसके पहले ही जो कुछ भी उसकी आँखों के सामने घटित होता देखती है….

मदारी का खेल बदल चुका है खुद ही आत्मा बन जाता है, कभी खुद ही परमात्मा, फिर खुद ही मनुष्य बनकर पीड़ा भोगता है… फिर खुद ही संन्यासी बनकर लोगों को सत्य-असत्य, अध्यात्म, वेद, उपनिषद के प्रवचन देने लगता है…

सारी उठापटक के बाद भी वो कुछ नहीं बदल सकी थी… उसका वो मनोरंजक खेल जारी था… बस स्वरूप बदल गया था…. लेकिन शायद वो उसी में खुश था…

इधर देवलोक से अंतिम पुकार आ चुकी है…. देवकन्या अपने बिखरे प्रेम के टुकड़ों को समेटते हुए बार बार मदारी की तरफ देख रही है…. शायद मदारी का खेल ख़त्म हो और वो उसे अपने साथ ले जा सके….

लेकिन तालियों की गड़गड़ाहट और मनुष्य जगत की वाहवाही का मोह उससे छूट नहीं रहा…. वो नहीं जानता चंद वाहवाही और मायाजाल के सुकून में वो कितना बड़ा पुरस्कार पाने से वंचित हो रहा है…. मदारी ने एक नया मुखौटा लगा लिया है… और देवकन्या की अंतिम उम्मीद ख़त्म होने की कगार पर है….

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