ईवीएम खुद पूछेगी, ‘कितने वोट चाहिए थलाइवा’

रजनीकांत के राजनीति में प्रवेश के बाद मुझे लगता है कि एक जीवंत किंवदंती का निर्मम अंत हो जाएगा.

शिवाजी राव गायकवाड़ जितना अच्छा अभिनेता है, उससे कहीं बेहतर इंसान है. उसकी सदाशयता के किस्से तमिलनाडु की गरीब बस्तियों में सुनाए जाते हैं.

वह इतना कृपालु है कि फिल्म न चलने पर वितरकों को पैसा लौटा देता है. एक सोने के मन वाला मनुष्य राजनीति के कठोर पथ पर कदम रखने जा रहा है.

रजनी सर ने आज सुबह से भारत की राजनीति में भूचाल ला दिया है.

कुछ दिन पूर्व एक युवा अन्वेषक ने भारत में ‘तटवर्ती क्षेत्रों में बड़ा भूकंप’ आने की भविष्यवाणी की थी. मुझे लग रहा है उसकी भविष्यवाणी सत्य हुई है.

रजनी सर का सियासत में आना किसी भूकंप से कम है क्या. ये तो तय हो गया है कि रजनीकांत तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में बड़े होकर उभरेंगे. उन्होंने ये भी स्पष्ट कर दिया है कि लोकसभा चुनाव में भी अपने उम्मीदवार उतारेंगे.

मुझे ये कहने में कोई हिचक नहीं है कि रजनी की अपार लोकप्रियता उन्हें राजपथ के दरवाजे तक आसानी से पहुंचा सकती है और दक्षिण भारत में तो अभिनेताओं के राजनीति प्रवेश की सुदीर्घ परंपरा रही है.

सुबह उन्होंने मीडिया के समक्ष कई बातें कही. उनमें से एक ये भी थी कि ‘वे सत्ता में आने के तीन साल के भीतर अपने चुनावी वादों को पूरा करने में असमर्थ होते हैं, तो इस्तीफा दे देंगे’.

रजनीकांत ने अब तक अपनी फिल्मों में ‘तीन घंटे’ में जन कल्याण का चमत्कार किया है लेकिन दुर्भाग्य से ये असली सियासत है. यहाँ तीन साल तो क्या अगले कार्यकाल में भी चुनावी वादें पुरे नहीं होते.

फिर वे कहते हैं ‘मुझे कैडर नहीं गार्ड चाहिए जो गलत होने से रोक सके’. क्या उन्हें अपने जैसे ईमानदार और विश्वसनीय साथी राजनीति में मिल पाएंगे?

न रजनीकांत को सत्ता चलाने का कोई अनुभव है न ही उनके साथियों को. ऐसे में वे केवल बड़ी राजनीतिक पार्टियों के ‘टूल’ बनकर रह जाएंगे.

जितनी साफगोई से रजनी राजनीति में आ रहे हैं, मुझे संदेह से ज़्यादा भय सता रहा है.

आज वे 67 वर्ष के हैं और अपनी सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके हैं. उन्होंने तमिलनाडु के निर्धन वर्ग के लिए बहुत कुछ किया है लेकिन अपनी गाँठ के पैसों से.

ऐसा व्यक्ति सरकार बनाएगा तो न खुद खाएगा, न किसी को खाने देगा.

सत्तर साल से काले हो रहे सत्ता भवन में एक आस का ‘दीप’ जलेगा तो सत्ता के गलियारे भभक उठेंगे. वर्षों से सह सहमति से निर्बाध जारी भ्रष्टाचार पर जब रोक लगेगी तो कितने नाग फुँफकार उठेंगे.

एक पुरानी कहावत है ‘राम राज्य एक यूटोपिया स्वप्न है, एक आदर्श राज्य जो इस धरती पर कहीं नहीं है’.

सियासत के खेल में ‘निर्मल मन’ होना पहली प्राथमिकता कतई नहीं है. ये आप उस दिन समझेंगे जब आप चुनकर विधानसभा पहुंचेंगे और चुनावी वादे निभाने की शुरुआत करेंगे.

मुझे दुःख है कि आज पृथ्वी पर एक जीवित किंवदंती का अंत हो गया. बाकी ईवीएम आपसे एक बार पूछने अवश्य आएगी कि ‘कितने वोट चाहिए थलाइवा’.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY