बब्बर शेर कभी बूढ़ा नहीं होता

ये किस्सा मुझे एक ऐसे लड़के ने सुनाया है जो इस घटना का प्रत्यक्षदर्शी रहा है.

2008 Olympics… पहलवान सुशील कुमार Preliminary Round में ही अपनी दूसरी कुश्ती हार गए थे.

हार के हताश निराश चुपचाप एक कोने में बैठ गए. आंखें नम थीं. बुझे मन से धीरे धीरे जूते खोले और एक तरफ रख दिये.

वो जूते मने Wrestling Shoes उतारने – रखने का जो अंदाज़ था, वो बहुत कुछ कह रहा था. पहलवान अंदर से टूट गया था… बिखर गया था.

जीवन भर इतनी मेहनत की, तपस्या की… अर्जुन की तरह Olympic gold medal के अलावा कुछ दिखा ही नहीं… पर फिर भी हार गए? हताशा निराशा स्वाभाविक थी.

कोच आया… और उसने दिलासा दी… और फिर उसके बाद अगले दो घंटे बहुत परेशान उद्विग्न करने वाले थे. उनकी निगाह उस पहलवान पर थी जिसने उन्हें हराया था.

अगर वो सबको हराता हुआ फाइनल में पहुंच गया तो उस से हारे सभी पहलवानों को एक मौका और मिलता है… इसे Repeaches Round कहते हैं.

दोनों Groups के Finalist से हारे हुए पहलवान आपस मे लड़ते हैं और इस तरह Bronze medal का फैसला होता है.

सुशील का भाग्य अच्छा था कि उनको हराने वाला फाइनल में जा पहुंचा सो ये जूते टाइट कर पुनः mat पर जा चढ़े और Bronze Medal जीत लाये.

सबको लगा कि अब Olympic medal जीत के रिटायरमेंट ले लेंगे पर वहां से इनके करियर का दूसरा दौर प्रारम्भ हुआ. उसके बाद फिर एक बार World Championship में Gold लाये और पुनः 2012 में Olympic में Silver.

जब सुशील ने दूसरी बार मने 2012 में ओलंपिक पदक जीत लिया तो हम सभी ये मान कर चल रहे थे कि बस… अब बहुत हो गया. अब पहलवान जूते टांग देगा.

क्योंकि 2012 के बाद injuries का एक लंबा दौर चला. Injury खिलाड़ी को खा जाती है. पर पहलवान कहां हार मानने वाला? वो 2016 में फिर ताल ठोंकने लगा.

देश भर की politics हुई. नरसिंह यादव प्रकरण हुआ और दुर्भाग्य ही था कि 2016 में सुशील का olympic छूट गया.

तब हम सबने मान लिया था कि बहुत हुआ. अब पहलवान जूते टांग देगा. टांग देने भी चाहिए. उम्र भी हो गयी. दो-दो ओलंपिक पदक जीत ही लिए.

पर नरसिंह यादव प्रकरण में पहलवान के मन मे कसक रह गयी थी. सो उन्होंने फिर ताल ठोक दी और इसी नवंबर में हुई National Championship में फिर सबको रगड़ दिया.

अब कल से दिल्ली – सोनीपत में हुए Commonwealth Trials के दौरान पहलवान सुशील कुमार और प्रवीण राणा के समर्थकों के बीच आपस मे हाथापाई और मारपीट की खबरें टीवी पर चल रही हैं.

असली किस्सा क्या है मुझसे सुन लीजिए.

सुशील के सामने बच्चा है प्रवीण राणा… उस से कुश्ती चल रही थी. सुशील 6 – 3 से आगे था. तभी प्रवीण राणा कुश्ती में खुले हाथ चलाने लगा. ऐसा करना धृष्टता मानी जाती है. और फिर इतने सीनियर पहलवान से ऐसा व्यवहार?

सुशील ने समझाया, मना किया, protest किया कि भाई, पहलवान मान मर्यादा का ध्यान रहे, लड़ के जीतो यार… रैफरी ने भी मना किया पर प्रवीण राणा नहीं माना… उसने फिर खुले हाथ चलाये.

कुश्ती में अक्सर ऐसा होता है. हमारे लौंडे भी करते हैं. पर हम लोग, Coaches अभिभावक अपने पहलवान को मना करते हैं कि बदतमीजी नहीं…

कुश्ती में तो सीनियर प्रतिद्वंद्वी के पैर छूने की परंपरा संस्कार है… बराबर वालों से भी गले मिलने का संस्कार है…

ऐसे में कुश्ती की गर्मा गर्मी में कोई धृष्टता हो जाये तो पहलवान और उसके कोच, अभिभावक समर्थक को Sorry बोलना चाहिए, पर प्रवीण राणा का भाई बाहर से चिल्ला रहा था… और मार… खींच… और मार…

समय समाप्त हुआ, सुशील 6 – 3 से जीत गए तो कुश्ती के बाद सुशील समर्थकों ने प्रवीण राणा के भाई को दो हाथ धर दिए… बस इसी में थोड़ी बहुत हाथापाई हुई है… ज़्यादा कुछ नहीं…

भाई मेरे… कुश्ती है… जब दो सांड लड़ेंगे तो धूल तो उड़ेगी ही…

समस्या की मूल जड़ सुशील कुमार है जो कि लगभग 38 साल का होने के बावजूद अभी थकने, टूटने, हार मानने को तैयार नहीं, अभी भी अपने से आधी उम्र के लौंडों को बच्चों की तरह लड़ा खेला रहा है…

वो अगले Olympic के लिए तैयारी में हैं…

शेर बूढा नहीं हुआ है… बब्बर शेर है और बब्बर शेर कभी बूढ़ा नहीं होता.

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