नदी : पाँच कविताएं

१-

नदी गर्भ से है
और उगल रही है वह नग्न स्त्रियां
स्त्रियां भी गर्भ से हैं
और मछलियां उनका प्रसव परिणाम
नदी की देह में बैठ गया एक पुरुष
नदी को एक पक्का सुरक्षित मकान जान कर
पुरुष मछलियों को खा रहा है
और मुग्ध हो रहा है उन स्त्रियों पर

किसी आश्चर्य सी एक नाल उगती है नदी के पेट में
और बांध देती है पुरुष के पेट में एक गाँठ
उस गांठ को पुरुष, स्त्रियां और मछलियाँ घृणा से देख रहे हैं.

नदी किसी जर्जर ईमारत सा ढहती है
और पानी पानी हो जाती है.

२-

नदी एक चीख में बदल रही है.
और किनारे उसका गला दबोचे दो निर्मम हाथ
हाथ कसते ही जा रहे है
और बढ़ता ही जा रहा है नदी का दुःख!

मछलियाँ नदी की गूँगी बहने है.
जिनके आँसू नदी का क्षार बढ़ा रहे है
और घटा रहे है
निर्मम किनारों का जड़त्व!

एक दिन मछलियाँ जीत जाएँगी
और नदी की चीख पृथ्वी के चेहरे पर किसी हँसी सी फ़ैल जायेगी.

३-

जंगल नदी के आलिंगन में लिपटा अतृप्त प्रेमी है.
प्रेम-पाश में बेसुध नदी
सर पटकती है
पर जंगल अपनी बाहें ढीली नहीं करता
नदी तुनक कर थोड़ा आगे भागती है.
और जंगल,
किसी चीरे सा बढ़ता जाता है.

कि रास्ते में एक बांध आता है.

फिर नदी और जंगल किसी कहानी में बदल जाते हैं.

४-

नदी की हजार बाहें हैं.
पकड़े हुए पृथ्वी की पीठ को
कि उछल न जाये अपनी चंचलता में नदी आकाश की ओर

पृथ्वी की पीठ मिटटी की एक इतिहास यात्रा है.
जिसके कई पन्ने कुछ नदियों को किसी अफवाह सा दर्ज किये हैं.
अक्सर भयानक गर्मियों में
जब ये पन्ने फड़फड़ा उठते हैं.

किसी पृथ्वी की पीठ
एक मुरझाए हुए चेहरे में बदल जाती है.

इतिहास फिर उसके बाद बदलता है.

५-

नदी पाँव पाँव चलती है आकाश को देखते हुए
और आकाश झाँकता है
घर में बंद किसी बच्चे की खिड़की से,

नदी रोड पर जा रही है
नदी की आँखे नीली है.

आकाश उसके नीलेपन से चिढ कर बार बार उसे पानी से धोता है.
आकाश और सफेद हुआ जाता है
नदी और भी नीली पड़ती है.

पृथ्वी गोल घूमना बंद नहीं करती कुछ इस चाह में
कि किसी दिन दोनों में कोई छिटक कर नीचे आएगा
या कोई ऊपर उछल जायेगा.

पृथ्वी शरारती है.
इन बिछड़े प्रेमियों की इतिहास कहानियां
अपने पेट में दबाए
वह चुपचाप हँसती है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY