प्रशासनिक कर्मचारियों को जनता जनार्दन के सामने नत मस्तक कर देगी नयी तकनीकी

ज़रा दिमाग पर ज़ोर डाल कर बताइये कि पिछली बार कब आपने सरकारी फ़ोन या इंटरनेट के लिए किसी नौकरशाह को घूस दी हो, उसके हाथ-पैर जोड़े हो, या टेलीफोन कार्यालय में प्रवेश किया हो?

क्या हुआ रातो-रात कि सारे के सारे टेलीफोन अधिकारी और कर्मचारियों का ‘दबदबा’ या प्रेस्टीज समाप्त हो गई?

पिछली बार कब आपने पोस्ट ऑफिस से टेलीग्राम (कुछ समय पूर्व यह सेवा समाप्त हो गयी) किया हो, मनी आर्डर भेजा हो?

पिछली बार कब आपने रेलवे या एयर इंडिया के टिकट के लिए किसी सरकारी बिल्डिंग में सरकारी कर्मचारी से टिकट बुक कराया था?

हम सभी ने कभी-ना-कभी उन बाबुओं की बदतमीज़ी का सामना किया था.

क्या सरकारी सेवाओं के लिए आप भारत सरकार या राज्य सरकार के सचिव से मिलते है? नहीं?

लगभग 90 प्रतिशत जनता किसी काउंटर पर बिजली, पानी, टैक्स, साफ़-सफाई, नक्शा पास करवाना, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, ट्रैफिक चालान, FIR, इत्यादि के लिए किसी जूनियर कर्मचारी के पास जाती है, वहां मामला नहीं सुलझा तो किसी सेक्शन अफसर, अंडर सेक्रेटरी या इंजीनियर.

आधे से ज्यादा लोगों को अभद्र व्यवहार और अपमान का सामना करना पड़ता है, और साथ में कुछ घूस भी देनी पड़ सकती है.

यह है सरकारी नौकरी की अभिलाषा का सच.

हमें सरकारी नौकरी इस लिए जॉइन करनी है क्योकि हम अपने ही नागरिकों को जता सकें कि अब हम बॉस हैं, और तुम हमारे गुलाम; साथ में कुछ ऊपर की कमाई.

और इसीलिए हम आरक्षण के समर्थन या विरोध में खड़े हैं.

परंतु, आने वाले कुछ ही वर्षो में तकनीकी के कारण एक आम नागरिक का सम्बन्ध पब्लिक सर्विस देने वालो से बदल जायेगा.

अगले दस वर्षो में लगभग सभी सड़कों, घरों और कारों में कैमरे लग जायेंगे.

अगर आप ट्रैफिक का नियम तोड़ते है तो आपके बैंक से सीधे पेनल्टी ले ली जाएगी और ईमेल या SMS से आपको फोटो सहित उस उल्लंघन की जानकारी.

अगर पुलिस प्रताड़ित करती है तो उसका रिकॉर्ड. अगर चोरी या मार-पीट होती है, तो उसका वीडियो.

अगर गुंडों ने मुंह छुपाकर चोरी या हत्या की है तो उनके छोड़े गए डीएनए से उनका हूबहू चेहरा कंप्यूटर पर कुछ सेकंड में बन जायेगा (जी हाँ, यह तकनीकी विकसित हो गयी है; सोचिये अगर हम डीएनए से माता-पिता पहचान सकते है, तो चेहरा क्यों नहीं बना सकते).

कम कैश के कारण अधिकतर पेमेंट डिजिटल होंगे, प्रॉपर्टी आधार से जुड़ जाएगी, और सोना-चांदी की खरीददारी GST से नियंत्रित होगी. ऐसे में चोरी का सोना (अगर कैमरे और डीएनए से बच गए) बेचना मुश्किल हो जायेगा.

फिर पुलिस का रोल भी बदल जायेगा. माई-बाप की जगह वे सरकारी ‘नौकर’ हो जायेंगे, वह भी बिना ऊपर की कमाई के.

‘पारम्परिक’ रूप से जांच-पड़ताल की जगह एक कांस्टेबल को भी ‘नॉलेज’ या ज्ञान के आधार पर कार्रवाई करनी होगी.

इसी तरह, म्युनिसिपल वालों ने सफाई की या नहीं, कूड़ा उठाया कि नहीं, सब वीडियो में रिकॉर्ड हो जायेगा और कर्मचारियों को जवाबदेह बनाया जा सकेगा.

इसी तरह, आप अपने भवन के नक़्शे को वेबसाइट पर अपलोड करेंगे, जिसको कृत्रिम बुद्धि जांचेगी कि सीढ़ी की ऊंचाई ठीक है कि नहीं, सामने कितना स्पेस छोड़ा है, इत्यादि.

नगर विकास प्राधिकरण के बाबुओं को घूस दिए बिना नक्शा ऑटोमेटिकली पास हो जायेगा. और तो और, भवन निर्माण के समय उपग्रह यह जांच करेगा कि आप ने नक्शा डिज़ाइन के अनुसार बनाया है या नहीं.

और फाइनल इंस्पेक्शन – जब बिजली-पानी की लाइन की जांच होगी – के समय सरकारी कर्मचारी के पास लेज़र स्कैनर होगा जो ऑटोमेटिक परिणाम दे देगा. इस पूरी प्रक्रिया में बाबू का रोल नगण्य होगा.

बिजली के क्षेत्र में एक आम घर-परिवार उपभोक्ता और विक्रेता दोनों हो जायेगा. वह बिजली खरीदेगा, साथ ही बेचेगा.

क्या कहा? लगता है मैं पागल हो गया हूँ? नहीं, ऐसा नहीं है. अमेरिका और यूरोप के कई घरों की छतों पर सोलर पैनल लगे हैं.

जब सूर्य तेज होता है, और मकान मालिक घर में नहीं है तो उसकी एक्स्ट्रा सौर ऊर्जा बिजली कंपनी खरीद लेती है और व्यावसयिक उपक्रम को बेचती है जहाँ AC चल रहा होता है या ग्रिड से वह बिजली कही और भेज देती है. बारिश और जाड़े में वही मकान मालिक बिजली खरीदता है.

इसी महीने जर्मनी में सौर और वायु से इतना बिजली उत्पादन हुआ कि विद्युत् कंपनियों ने व्यावसयिक उपभोक्ताओं को एक मेगावाट बिजली प्रयोग करने के लिए 50 यूरो का भुगतान किया, ना कि उनसे बिल लिया.

अंत में, बैंको के बारे में लिख ही चुका हूँ. अमेरिका में आपको कई प्रकार के लोन बिना बैंक जाए इंटरनेट के द्वारा केवल आपकी क्रेडिट रेटिंग (उपभोक्ता के लोन वापस करने का रिकॉर्ड) के आधार पर मिल जाएगा.

अगर भारतीय बैंक नहीं सुधरेंगे, तो सरकार का अगला कदम यही होगा. आप बिज़नेस प्लान को बैंक के वेबसाइट पर अपलोड करे; कृत्रिम बुद्धि या आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस आपका आधार कार्ड, बैंक अकाउंट और क्रेडिट रिकॉर्ड चेक करेगी और लोन का पैसा सीधे आपके अकाउंट में. बदले में बैंको के जॉब कम हो जायेंगे, जब कि आई टी में बढ़ जायेंगे.

अमरीका, स्वीडन और ब्रिटेन में भौतिक या वास्तविक संपत्ति (जैसे कि शेयर, प्रॉपर्टी, मशीन इत्यादि) की तुलना में निराकार या अभौतिक संपत्तियों (अनुसंधान और विकास, सॉफ्टवेयर, डेटाबेस, कलात्मक कृतियों – म्यूजिक, आर्ट, इत्यादि, डिजाइन, ब्रांडिंग, व्यवसाय प्रक्रिया इत्यादि) में निवेश अब अधिक है.

इन निराकार या अभौतिक संपत्तियों में नए रोज़गार के अवसर बन रहे हैं जिसमें सरकारी नौकरियों से अधिक वेतन और प्रेस्टीज है. लेकिन ऐसी संपत्ति मोबाइल होती है (हेडक्वार्टर कहीं पर, वर्कर कई देशों में, ‘प्रोडक्ट’ की पैकेजिंग या डाउनलोड किसी और देश में), जिससे उन पर कर लगाना मुश्किल हो जाता है.

अगर ऐसी भारतीय कंपनियों को आरक्षण के दायरे में लाने का प्रयास करेंगे, तो वे अपने दस कर्मचरियो को भूटान या आयरलैंड मूव कर देंगे और कहेंगे कि यह अब मेरा हेडक्वार्टर है और अब हम एक विदेशी कंपनी हैं.

रातों-रात उनकी ‘राष्ट्रीयता’ और टैक्स अधिकार क्षेत्र बदल गया. ना तो उनकी मशीन है, ना ही भारी-भरकम बिल्डिंग, ना ही कोई ‘दिखाई’ देने वाला प्रोडक्ट. सरकार उनका क्या बिगाड़ लेगी? उल्टा उनसे मिलने वाला टैक्स और रोज़गार के अवसर गंवा बैठेगी.

इसीलिए मैंने पिछले लेख में लिखा था कि अगले दस वर्षो में सामान्य और आरक्षित वर्ग में अंतर समाप्त हो जायेगा.

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