जीवन के रंगमंच से : पिक्चर अभी बाकी है दोस्त

जीवन में घटने वाली हर महत्वपूर्ण घटना एक फिल्म के समान होती है जिसकी स्क्रिप्ट नियति द्वारा पहले से लिख दी गयी है, साथ में आपका किरदार भी.

अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप अपना वास्तविक चरित्र उसमें लाए बिना उस किरदार को अपने अभिनय से कितना सशक्त बनाते हो.

बावजूद इसके कि कई बार आपको फिल्म का अंत मालूम नहीं होता लेकिन यह अनभिज्ञता की स्थिति ही अभिनेता के लिए एक मौका है जब वो अपना पूरा पूरा इस कदर किरदार को समर्पित कर दे कि फिल्म बनाने वाले को भी उसका अंत बदलना पड़ जाए.

और फिल्म देखने वालों को भी अचंभित होना पड़े कि इस शख्स से इस किरदार को इतनी कुशलता से निभा ले जाने की उम्मीद तो नहीं थी.

वरना अभिनेता तो शाहरुख़ भी है जो हर फिल्म में शाहरुख ही नज़र आता है और अभिनेता कमल हसन भी है जिसके किसी किरदार में कमल कहीं नज़र नहीं आता. और एक अभिनेता संजीव कुमार भी थे जो एक ही फिल्म में नौ अलग अलग भूमिकाएं निभाकर लोगों को दांतों तले ऊंगली दबवा देते थे.

और यदि कहीं फिल्म में सस्पेंस है तो फिर कहना ही क्या. ऐसी फिल्म एक ही बार देखने लायक होती है. जीवन में कुछ घटनाएं इतनी ही रहस्यमय होती हैं जो सिर्फ और सिर्फ एक ही बार घटित होती है. यहाँ पुनरावृत्ति जैसा कुछ नहीं हो सकता. तब नियति की स्क्रिप्ट पर आपका अभिनय ही है जो एक नया इतिहास रच देगा. उसके बाद उसको देख कर कई फ़िल्में बनेगी लेकिन उस पहली फिल्म सा जादू नहीं रच सकेगी.

यूं तो जीवन की हर घटना एक ही बार घटित होती है लेकिन हर घटना में इतना ही सस्पेंस और थ्रील हो ज़रूरी नहीं. कुछ घटनाएं कायनाती साज़िश कही जाती है जो कुछ विशेष चुने हुए लोगों के लिए ही आयोजित होती है. और वो विशेष होते ही इसलिए हैं कि उन्हें भी इस बात का ज्ञान होता है. इसलिए कहानी के साथ पूरा न्याय करते हुए भी अपनी नई संभावनाओं को खुद ही परखते रहते हैं और अपने ही अभिनय के साथ प्रयोग करते हुए नए आयामों को छू पाते हैं, एक नई रहस्यमयी कहानी में चुने जाने के लिए.

इसलिए जीवन में आनेवाली हर कहानी में पूरे साक्षीभाव के साथ उतरिये, अपने अभिनय से उसमें चार चाँद लगाइए. अंत मालूम हो तब भी दर्शकों को पता नहीं लगने दीजिये. और अंत नहीं मालूम तो फिर कहना ही क्या हर सीन के बाद पूरे आत्मविश्वास से कहिये पिक्चर अभी बाकी है दोस्त.

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