भारत वर्ष को इंडिया बनाने में इंग्लैंड से ज़्यादा काँग्रेस का ही योगदान

भारत की इंडियन नेशनल काँग्रेस ने कल अपना 133वां स्थापना दिवस मनाया.

यह काँग्रेस की ही विचित्रता है कि जिस काँग्रेस पार्टी का 1885 में गठन हुआ था, वह 1969 में टूट कर काँग्रेस (एस) काँग्रेस (आर) और 1978 में काँग्रेस (आई) बनते हुये आज भी इंडियन नेशनल काँग्रेस ही बनी हुई है.

यह कितनी हास्यास्पद स्थिति है कि सोनिया राहुल गांधी की काँग्रेस आज अपने उस अतीत को याद कर रही है जब एक राजनैतिक संगठन का गठन, भारत के लिये नहीं बल्कि केवल इंडिया के लिये किया गया था.

आज भी यह काँग्रेस नेतृत्व से लेकर विचार व नाम तक से भारतीय नहीं है! मेरा मानना है कि भारत वर्ष को इंडिया बनाने में इंग्लैंड से ज्यादा इस काँग्रेस की पार्टी का ही ज्यादा योगदान रहा है.

यह तो सबको ही पता है कि काँग्रेस पार्टी के गठन के पीछे एक सेवानिवृत्त सिविल सर्विस के अधिकारी एलन ह्यूम की सोच थी जिसे उस वक्त के वाइसरॉय लार्ड डफरिन का समर्थन प्राप्त था.

दरअसल यह ह्यूम का, भारत में इंग्लैड के हितों की रक्षा व उनके राज को अनंतकाल तक चलते रहने के लिये भारतीय गुलामों की एक पीढ़ी तैयार करने का प्रयास था, जो भारतीय न होकर ब्रिटिश परिधान, शिक्षा व अंग्रेज़ी बोलने वाले इंडियन थे.

आज ह्यूम की आत्मा अवश्य प्रसन्न हो रही होगी क्योंकि जिस बीज को उसने रोपित किया था उसी बीज को स्वतंत्र भारत में एक राजनैतिक पार्टी अपना आदि मान कर उससे शर्मिंदा न हो कर गौरवान्वित हो रही है.

यह ठीक वैसा ही है जैसे आज भी भारतीय मुसलमानों का एक वर्ग पश्चिम व सेंट्रल एशिया से आये बलात्कारी, लुटेरे मुस्लिम आक्रान्ताओं में अपने बीज खोजता है.

आज जो लोग खुश हो रहे हैं क्या उनको मालूम है कि आज से 132 वर्ष पूर्व 28 दिसम्बर 1885 को कौन लोग किस विचार को लेकर, क्रिसमस की छुट्टियों के बीच मिले थे?

खरमास की इस तारीख को बॉम्बे में काँग्रेस का प्रथम अधिवेशन आहूत हुआ था जिसके अध्यक्ष डब्ल्यू सी बनर्जी थे.

इस अधिवेशन में भारत के विभिन्न भागों से आये हुये अंग्रेजी में शिक्षित ‘सभ्रांत’ व्यक्तियों और वकीलों ने भाग लिया था.

यह वह सब 72 लोग थे जो भारतीयता से अलग होते हुये, नये बने इंडियन की प्रथम श्रृंखला थे.

इन्होंने भारतीय मान्यता के विपरीत अशुभ काल खरमास में, अपने विदेशी शासकों के त्योहार क्रिसमस के काल में नवपार्टी की स्थापना जैसे शुभकार्य को करना स्वीकार किया था.

किसी भी दल या संगठन का प्रथम अधिवेशन व प्रथम अध्यक्षीय भाषण सबसे महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वही उस दल व संगठन की विचारधारा व अपेक्षाओं को तय करता है.

इसको हम यह भी कह सकते हैं कि यही उस दल व संगठन की आत्मा का संचार करती है जो तमाम परिस्थितियों व परिवर्तनों के बीच भी अपने मूल का त्याग नहीं कर पाती है.

ऐसे में काँग्रेस के प्रथम अध्यक्ष डब्ल्यू सी बनर्जी के अध्यक्षीय भाषण का महत्व बहुत बढ़ जाता है. आज से 132 वर्ष पूर्व बनर्जी ने अपने भाषण में कहा था –

“हम, ब्रिटिश साम्राज्य के ईमानदार और स्वामीभक्त समर्थक लोग हैं. हमारी अभिलाषा है कि भारत में, ब्रिटिश शासन को स्थायित्व मिले और यह कामना करते हैं कि भारत मे ब्रिटिश शासन अनंत काल तक चलता रहे. हमारी यह आधारभूत महत्वकांक्षा है कि हमको ब्रिटिश प्रशासन में हमारी हिस्सेदारी मिले. हम लोग, ब्रिटिश नागरिकों से ज्यादा ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठावान और उसके अटल शुभाकांक्षी है. भारत के लिये, ग्रेट ब्रिटेन ने बहुत कुछ किया है. हमें रेलवे और पाश्चात्य शिक्षा दी है. इसके लिये हम लोग, ग्रेट ब्रिटेन के प्रति सच्चे अर्थों में कृतज्ञ हैं.”

आज, 2017 में जब राहुल गांधी की अध्यक्षता में काँग्रेस इन्ही दासता के भावों में डूबे शब्दों, विचारों और मानसिकता का उत्सव मना रही है, तब काँग्रेसियों का भारतीयता व भारत के हितों से विमुख होना व विदेशियों के प्रति उनका स्वामीभक्ति प्रदर्शित करना बड़ा स्वभाविक प्रतीत होता है.

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