ऎसी रिपोर्टिंग सिर्फ भूल तो नहीं हो सकती

बीते दिवाली के हफ्ते भर बाद कि बात है. जब दिल्ली में काफी ज्यादा स्मोग़ हुआ था.

तब नोयडा के किसी सज्जन ने NGT में पेटीशन दाखिल की कि उन्होंने अख़बार में पढ़ा कि NTPC किसानों से कृषि अपशिष्ट खरीद लेगी और किसान उसे जलाने के बजाये NTPC को बेचेंगे जिससे पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण की समस्या ख़त्म हो जाएगी.

अखबार की इस खबर के बावजूद धुआं हो गया. इस कारण वो सज्जन NTPC से काफी क्षुब्ध थे और कोर्ट चले गये.

प्रोजेक्ट पर काम करते करते, तकनीकी विषय पर NTPC का पक्ष रखने हेतु हमें NGT जाने का भी हुक्म हो गया.

असल में लगभग सभी अखबारों ने इस प्रोजेक्ट की जानकारी मिलते ही अपनी अपनी समझ के हिसाब से अतिउत्साह में बिना गुणा गणित के, बिना किसी टाइमलाइन को जाने और आधी अधूरी जानकारी के आधार पर इसे कुछ इस प्रकार रिपोर्ट किया कि अर्थ का अनर्थ हो गया.

तब से लोग ताने मारते पाए जा रहे हैं कि बहुत पढ़े थे अखबार में प्रदूषण कम तो नहीं हुआ? क्या सब हवा में ही है या कुछ ज़मीन पर भी है?

यही बातें जज साहब ने भी हमसे पूछी. हमने उन्हें बताया कि अभी तक हमने सफलता पूर्वक demonstrate कर लिया कि कृषि अवशेष पावर प्लांट में कोयले के रिप्लेसमेंट के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है.

इस सफलतम प्रयोग के बाद अभी हाल में केंद्र सरकार ने एक बायोमास पॉलिसी लांच की (जिसे ड्राफ्ट करने का सौभाग्य भी हमें मिला).

अब सबसे बड़ी चुनौती है कि अभी मार्किट में कृषि अवशेष को प्रोसेस्ड पेलेट उत्पादन की पर्याप्त क्षमता नहीं है. इस क्षेत्र में निवेश की आवश्यकता है.

यदि पंजाब, हरियाणा की राज्य सरकारें इसमें मदद करें और कृषि अवशेष के पेलेट बना के हमें दे और साथ ही साथ इसे अपने प्लांटों में जलाये तो अगले 3-4 वर्षों में इस समस्या का पूर्ण रूपेण निदान हो सकता है.

हालाँकि निकट वर्ष में ही एक बड़े क्षेत्र को पराली जलाने की प्रथा से मुक्ति दिलाई जा सकती है लेकिन प्रैक्टिकल तौर पर पूरे प्रदेश के लिए समय लगेगा.

जज साहब ने भी कहा कि NTPC ने खुद की पहल पर अच्छा कार्य किया है. अब आप पंजाब, हरियाणा, केंद्र सरकार के साथ मिलकर इस कार्य में आगे बढ़ें.

पेटीशन डालने वाले साहब के तेवर तब थोड़े ढीले हो गये.

वास्तव में ये सब मीडिया रिपोर्टिंग का कमाल था. जब याचिकाकर्ता हकीकत से वाकिफ हुए तो उन्हें भी लगा कि अख़बार में छपी खबर से ही वो भ्रमित हुए. ये काम इतना आसान नहीं है और न ही इतनी जल्दी इसका निदान हो सकता है. समय लगेगा.

हमने अपने ही कार्य की अख़बार में प्रकाशित ख़बरों को जब भी पढ़ा तो पाया कि उनमें अर्थ का अनर्थ किया गया था.

जैसे कुछ रोज पहले सरकार ने घोषणा की कि NTPC 5500 रुपये प्रति टन के दर से कृषि अपशिष्ट के पेलेट लेगी.

माने पेलेट बनाने वाली कोई कंपनी होगी जिससे NTPC पेलेट लेगा, किसान उस कंपनी को कच्चा माल यानी कृषि अपशिष्ट देगा.

लेकिन अख़बारों ने छाप दिया कि किसानों को कृषि अपशिष्ट के एवज में 5500 रुपये प्रति टन दिए जायेंगे. द हिन्दू जैसे अखबार ने भी ये छापा.

किसान खुश हो गए कि इतने में तो फसल बिकती है, अब भूसा का इतना भाव मिलेगा. कुछ किसान अप्रोच करने लगे कि मेरा भूसा ले लो, 5500 रुपये प्रति टन दे दो. बाद में उन्हें समझ आ गया कि कुछ गलत खबर छपी.

वास्तव में ये तो वो घटना है जिसे हम प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं. देखा जा रहा है कि मीडिया ऐसी खबरें प्रकशित करता है कि हमारी उम्मीदें अचानक बहुत बढ़ जाती है और हम वास्तविक तथ्यों से दूर हो जाते हैं.

पुनः उन उम्मीदों के पूर्ण न होने पर, उतनी ही तेजी से मीडिया डिफेम भी करता है और असंतोष इस हद तक बढ़ जाता है कि लोग अकारण बिलकुल विरोधी हो जाते हैं.

कुछ ऐसी ही रिपोर्टिंग अन्य कई परियोजनों में हो रही है. ये सिर्फ भूल नहीं हो सकती.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY