जाने अनजाने देश तोड़ने का काम कर रही हैं ये भाषाएं

20वीं सदी के आरंभ में तुर्की में एक राष्ट्रपति हुए कमाल अतातुर्क और उन्होंने ये प्रण किया कि उनको इस जिहादी, अरबी, जाहिल इस्लाम से अपने मुल्क को आज़ाद कराना है.

प्रगतिशील आदमी थे. उन्होंने आदेश निकाला कि मुल्क में न अरबी कुरान चाहिए, न अरबी इस्लाम, न अरबी भाषा, न अरबी लिपि, न अरबी वेशभूषा, रहन सहन…

सो उन्होंने अपने शिक्षाविदों को बुलाया… बोले कि तुर्की से अरबी हटाओ और अपनी अलग तुर्की लिपि बनाओ जिसकी बनावट अरबी न हो.

मने अक्षर की बनावट अंग्रेजी की तरह हो… और वो कागज़ पर उलटे न चल के सीधे चले… मने अंग्रेजी हिंदी की तरह Left to Right पढ़ी जाए न कि अरबी उर्दू की तरह Right to left…

उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटीज़ के भाषाविदों से पूछा कितना समय लगेगा… वे सब बगलें झांकने लगे… पाशा कमाल बोले, 15 दिन में मेरे टेबल पर होनी चाहिए.

नई तुर्की लिपि 15 दिन में उनके टेबल पर आ गयी. अब वे बोले कि इसको पूरे मुल्क को सिखाओ… कितना समय लगेगा? जवाब मिला – हुज़ूर इसमे तो कई साल लगेंगे…

उन्होंने आदेश दिया कि 6 महीने के भीतर मुल्क के एक-एक आदमी को, बूढा हो, जवान हो या बच्चा, मर्द होय चाहे मेहरारू… 6 महीने के भीतर हरेक आदमी को नई लिपि में तुर्की भाषा लिखनी-पढ़नी आनी चाहिए…

इसके बाद उन्होंने कहा कि कुरान शरीफ का तर्जुमा इसी 6 महीने में नई लिपि में हो जाये, मस्जिदों से अब अजान अरबी में न हो के तुर्की में हो, नमाज़ अरबी में नही बल्कि तुर्की में पढ़ी जाए.

कोई मुल्ला अरबी लिबास मने बड़े भाई के कुर्ते और छोटे भाई के पाजामे में न दिखे, Coat Pant Tie और Hat अनिवार्य कर दिए गए… बिना मूछ की लंबी दाढ़ी पर प्रतिबंध लग गया.

औरतों को हुक्म हुआ कि बुर्का न पहनें… पर खवातीन इतनी जाहिल कि बुर्का छोड़ती ही न थीं… और जब 6 महीने बाद भी औरतें बुर्के में ही नज़र आती तो कमाल पाशा ने हुक्म दिया कि वेश्याओं और हिजड़ों के लिए बुर्का और इस्लामिक पोशाक अनिवार्य है… बुर्का रातों रात मुल्क से गायब हो गया. और तुर्की एक सभ्य समाज बन गया.

बहरहाल आज का विषय कुछ और है. मुझे ये भाषा और बोली का झगड़ा समझ नहीं आता. पंजाबी को भाषा का दर्जा प्राप्त है जबकि हिमाचली, डोगरी जो कि पंजाबी की ही बहनें हैं, ये अब तक हिंदी की बोलियां मने dialects ही मानी जाती हैं, उसी तरह हरयाणवी, या फिर राजस्थानी (हाड़ौती, मेवाड़ी, मारवाड़ी).

उधर भोजपुरी वाले भी जब तब मचलते रहते हैं. उनको भी भाषा का दर्जा चाहिए. मैं कहता हूँ कि फिर ब्रज, अवधी या मैथिली ने क्या बिगाड़ा है?

आखिर पंजाबी भी तो हिंदी की ही एक बोली मात्र है. एक अलग टोन में पंजाबी बोलने वाला हिमाचल अगर अपनी राजभाषा हिंदी रख सकता है, उसी तरह हरियाणा या राजस्थान, सबकी राजभाषा, राजकीय कामकाजी भाषा और लिपि अगर हिंदी है तो पंजाबी अलग क्यों?

किसी बोली – dialect को भाषा मानने का आखिर criteria क्या हो?

कुछ मित्र कहते हैं कि अपनी अलग लिपि होनी चाहिए… मैं कहता हूँ कि इसमें क्या बड़ी बात है और ये कौन सी रॉकेट साइंस है… अरे उस ज़माने में कमाल अतातुर्क को तो 15 दिन लगे थे तुर्की की नई लिपि बनवाने में… आज के युवा तो 15 घंटे में बना देंगे इन सभी बोलियों के लिए नई लिपि…

हिंदी की बोलियां और इनके बोलने वाले भला क्यों मरे जाते हैं खुद को एक नई भाषा के रूप में मान्यता दिलवाने को… ये भाषाएं और इनकी लड़ाई विघटन का कारण बन रही हैं… ये भाषाएं देश तोड़ने का काम कर रही हैं जाने अनजाने.

आज हिन्दुस्तान को भी एक कमाल पाशा चाहिए जो सभी भाषाओं को एक ही लिपि में तब्दील कर दे.

वरना वो दिन दूर नहीं जब राज्यों में अपने अपने कमाल पाशा अतातुर्क पैदा होंगे जो 15 दिन में अपने राज्य की बोली की अलग लिपि बनवा के दावा ठोक देंगे कि हमको भी अलग भाषा का दर्जा दो… और हर समुदाय की, हर जिले की अपनी अलग भाषा होगी – बोली नहीं.

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