चिट्ठियां पसंद है मुझे, तुम्हारे न होने पर भी होने का एहसास दिलाती हैं

शहर में अकेलापन होता है, पतझड़ के झड़ते पत्तों पर भी किसी का ध्यान नहीं जाता! गुलमोहर लाल पीले होने लगे हैं, तुम्हारी नयी वाली साड़ी के रंग जैसे. बात करने के लिए तुम होती नहीं तो उदासी घेर लेती है, कमरे की दीवारों से भी बात करने का मन करता है.
पोस्टकार्ड पर जगह कम है, तो बाकि अगले ख़त में.

बुद्धू बनाना तो कोई तुमसे सीखे, जैसे संवाद सीने में चक्कर खाता हो और बाहर निकलने की जगह ही न मिले. घर पे सब लोग कहते थे कि कितना बोलती हो. यहाँ भी सब हैं, सबसे बात भी होती है, पूरे पूरे दिन सब बहलाए रखने की कोशिश करते हैं. तुम्हारी नीली कमीज मैं रात में ओढ़ लेती हूँ. ऐसा लगता है कि कमीज़ के अन्दर मैं हूँ ही नहीं! हवा चक्कर काट रही हो जैसे! पोस्टकार्ड भी कितनी जल्दी ख़त्म हो जाता है!

सरकारी डाक का संवाद के फूलों के लिए तो एहसान जताना चाहिए न? किसी से एक तार जुड़ जाता है, प्यार का नहीं साझा करने का. एक ललक साथ की, बात की, स्नेह की, दुलार की, तमीज की, सलीके की! कभी कभी सोचना पड़ता है, तुम पत्नी हो या बिटिया!

बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे, लेकिन इतने कम पोस्टकार्ड छोड़ गए हो. ये शुरू होते ही ख़त्म हो जाती हैं. ऊपर से जब घर आती हैं तो सब लोग पढ़ भी सकते होंगे. लेकिन कोई देखता नहीं, एक हाथ से ले के दूसरे से मुझे थमा दिया जाता है. यहाँ के डाकिये की कितनी बड़ी मूछें हैं न! घर पे जो डाकिया आता था, वो ऐसे मुस्कुराता नहीं था. खडूस सा था, ये हमेशा माँ के पास हँसता सा आता है. और माँ भी देखती तक नहीं कि चिट्ठी किसके नाम की है. सीधा मुझे थमा देती हैं. मुझे हंसी भी आती है शर्म भी!

यहाँ तुम्हारी चूड़ी की खनक नहीं होती, तुम्हारे पायल की छन छन भी नहीं. मशीन बड़ी है, लेकिन सिर्फ खातर खट्ट करती है. सब संभाल के चलाने कहते हैं. अब मशीन न हुई जैसे बीवी ही हो गई. नखरे नहीं दिखाती लेकिन, नयी है न. तुम्हारी मीठी सी आवाज़ की कमी खलती है, मन करता है पगला जाने का. घर लौट के आने का , और दूर से घर देखने का. अगली बार अंतर्देशीय ले आऊँगा पोस्टकार्ड के बदले, ये तो शुरू होते ही ख़त्म हो जाती हैं!

चिट्ठियां पसंद है मुझे, तुम्हारे न होने पर भी होने का एहसास दिलाती हैं. गर्म नहीं होती तुम्हारी तरह, खर्राटे भी नहीं लेती. इन्हें तकिये के नीचे डाल के सोया भी जा सकता है. हम लोगों ने घर से मकड़ी के जाले हटाये हैं, कहते हैं उनके घर में होने से घर में कर्ज़ा आता है. घर पे माँ भी ऐसा ही कहती थी, यहाँ भी माँ ऐसा ही कहती है. सारी माएं शायद एक जैसी होती हैं. हमारे बच्चे भी मेरे बारे में जरूर ऐसी ही शिकायत करेंगे.

कितना काम करते हो? एक पोस्टकार्ड तक नहीं डाल पाते? मैं 15 दिन से रोज़ डाकिये को झाँक झाँक कर देखती हूँ. लेकिन खडूस तेज़ तेज़ पैडल मारता जल्दी जल्दी साइकिल से भाग जाता है. बिना चिट्ठी के रुक जायेगा तो क्या मैं उसे पानी भी नहीं पूछूंगी? इतने लोगों का काम करता है बेचारा! जैसे तुम करते हो, बच्चों की फीस, माँ की दवाई, सबका ख़याल रखना. तुम मेरे बाबूजी जैसे हो गए हो. वो भी कम बोलते थे.

ज्यादा ही दिन हो गए अब तो, तुमने एक भी चिट्ठी नहीं भेजी. अब तुम्हारी नीली कमीज़ पहन कर सोती हूँ. लेकिन ये बहुत बड़ी है, जैसे कमीज़ के अन्दर मैं हूँ ही नहीं. हवा चक्कर काटती है अन्दर, जैसे कुछ खाली खाली सा हो. होली भी नजदीक आ रही है, तुम अपने आने का टिकट पहले ले लेना. सुना है बाद में टिकट नहीं मिलता. बाबूजी कहते हैं कि सब बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजेंगे, लेकिन वहां अंग्रेजी नहीं सिखाते. मुझे पसंद नहीं, लेकिन सब बड़े हैं. उन्हें ज्यादा पता होगा.

आज बाबूजी आये थे, शायद मुझे साथ ले जाना चाहते हैं. मुझे तुम्हारे बिना जाने का मन नहीं होता, तुम चिट्ठी भी नहीं लिखते. मुझे अकेले रहना पसंद नहीं. तुम्हारे होने या हो सकने के करीब होते हुए भी ना होना अच्छा नहीं लगता. ये आखरी पोस्टकार्ड है. अब डाकिया घर पे नहीं रुकता. मैं चिट्ठी डालने पिछली बार भी गई थी तो सब ऐसे रुक के देखने लगे थे, जैसे मैं भूतों को चिट्ठी डाल रही हूँ. होली पे तुम आये नहीं, अब किस त्यौहार में छुट्टी मिलेगी ?

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