भारतीय कानून व्यवस्था : कितनी कठोर, कारगर और व्यावहारिक

आइये उस कानून की बात करते हैं जिसे आप बाल मजदूरी के कानून के नाम से जाना जाता है. 1986 में बने इस कानून में 2016 में कुछ संशोधन भी किया गया है. Child Labour Act के अनुसार आप 18 वर्ष से छोटे बच्चे से मजदूरी नहीं करवा सकते. यदि आप काम करवाते हुए पकड़े जाते हैं तो मुक़द्दमा चला कर आपको 50,000 रुपये का जुर्माना और 2 वर्ष तक की जेल की सज़ा हो सकती है.

हाल में हुए संशोधन के उपरांत अब बच्चे को मात्र तीन ख़तरनाक उद्योग में नहीं रख सकते. पहले यह आंकड़ा 83 का था. इसके साथ ही बच्चे को स्कूल के अवकाश के बाद और छुट्टी के बाद काम करने पर पाबन्दी हटा दी गयी है. अब प्रश्न होता है कि क्या अब बाकी 80 स्थान बच्चों के लिए खतरनाक नहीं रहे या हमने अपनी सुविधा के लिए कानून को अमली जामा पहनने के लिए यह सुधार कर लिए हैं.

अब इसकी मूल भावना को समझें. बच्चों का बचपन छिन जाता है, उनके पढ़ाई का नुकसान होता है, उसका सर्वांगीण विकास नहीं हो पाएगा अगर वह अपना बचपन पढ़ाई और खेल के स्थान पर मजदूरी पर समय लगाएगा. यह सब सैद्धांतिक रूप से सर्वमान्य और स्वीकृत तथ्य है.

अब ऐसे कितने अभिभावक है जो अपने बच्चों का भला नहीं चाहते. शायद ही कोई मिलेगा. परंतु शायद उसके विचार से पढ़ने से कुछ हासिल नहीं होगा या उसकी आज की स्थिति इस प्रकार की नहीं है कि वह अपने बच्चे को पौष्टिक भोजन करवा कर स्कूल में भेज सके. यही निर्धनता उसके लिए बेबसी बन जाती है और इसी मजबूरी में बच्चे को काम करने भेज दिया जाता है.

1998 तक भारत के सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25.3 करोड़ बच्चों में से 1.3 करोड़ बाल मजदूरी में लिप्त थे. 2011 के आंकड़ों के अनुसार 26 करोड़ में से 60 लाख ही हैं. यह तो थे सरकारी आंकड़े जो census से प्राप्त किए गए हैं. वहीं जून 2015 में सरकार की एक और रिपोर्ट के अनुसार हर 11 बच्चे में से एक बच्चा बाल मजदूर है. यानि लगभग 9% बच्चे मजदूरी करते हैं.

पूरे एशिया में यह आंकड़ा 7.80 करोड़ के आस पास आँका गया है. अब यह भी जानिए कि यह मात्र सरकारी आंकड़ा है, जो भी लोग इस आंकड़े को बनवाने मे सहयोग करते हैं उन सब को मालूम है कि यह गैर कानूनी है इसलिए इसकी गिनती को अधिक दिखने का तो प्रयास हो ही नहीं सकता हाँ कम ज़रूर बताया जाएगा.

जो माता पिता या अभिभावक बच्चे को काम के लिए भेजते हैं उन पर कोई कानूनी सज़ा का विशेष प्रावधान नहीं है. आंकड़े यह भी बताते हैं कि आधे से अधिक बच्चे जो मजदूरी करते हैं कृषि से संबन्धित कामों मे अपने परिवारों के साथ काम करते हैं.स्पष्ट है कि यदि कृषक की इतनी आमदनी या कमाई हो कि वह किसी कुशल कारीगर या वयस्क को रख सके तो वह अपने बच्चे से यह काम नहीं करवाएगा. परंतु निर्धनता के कारण उसके पास कोई उपाय नहीं है.

कमोवेश यही स्थिति देश के हर कस्बे, हर शहर की है जहां हर स्थान पर सस्ती मजदूरी के लिए बच्चे काम करते आपको मिल जाएंगे. यहाँ पर कानूनी दोगलापन नज़र आता है. बच्चे खेल कर परिश्रमिक कमा सकते हैं. फिल्मी उद्दयोग मे रह सकते हैं. TV पर गाने और नाच के कार्यक्रमों मे आकार पैसा या इनाम जीत सकते हैं पर अपने खेत, अपनी दुकान पर माता पिता का हाथ नहीं बंटा सकते हैं. अब जो टीवी पर पैसा कमाता है वह बच्चा निर्धन तो नहीं कहा जा सकता. एक किसान का बच्चा जो निर्धन है किसी खेत पर काम नहीं कर सकता. एक माली, एक बढ़इ या कोइ और मजदूर यदि अपने बच्चे से काम करवाए तो वह गैर कानूनी है.

इसके अतिरिक्त विभिन्न उद्योगों में भी जो सस्ता समान बना कर आप निर्यात करके डॉलर कमाते हैं और पूरे विश्व में अपना नाम बनाते हैं उन सभी में बाल मजदूरों का उपयोग धड़ल्ले से होता है. कपड़ों के निर्यात, कालीन के निर्यात इत्यादि के सभी कारखाने इन बच्चों का प्रयोग करते हैं. यदि वहाँ बच्चे न आयें तो आपके उद्दयोग की लागत बढ़ जाएगी और आप बाज़ार में प्रतियोगी कीमत पर समान नहीं बेच पाएंगे.

इस प्रकार के कानून से पहले सरकार यह सुनिश्चित करे कि धन के अभाव में बच्चा काम न करे. पर सत्य तो यही है. बाल मजदूरी करवाने वाला इसलिए शिकायत नहीं करता कि उसे सस्ता मजदूर मिलता है. बच्चा इसलिए नहीं करता कि उसे दो वक़्त की रोटी उससे ही मिल रही है. कानून का तो दूर दूर तक लेना देना नहीं है. अब अगर सरकार निर्धनों के बच्चे को धन देने की बात करती है तो ही यह संभव है पर उसके लिए सरकार के पास धन होना चाहिए. जिस देश की सरकार 6 लाख करोड़ के स्वयं के कर्जे पर जी रही हो वह इस प्रकार के धन का प्रयोग करने मे स्वयं ही असमर्थ है.

तो क्या करें ?? इस कानून से पहले सरकार सशक्त हो अर्थक्रांति जैसी नीतियों से स्वयं को समृद्ध करे और फिर इस कानून के अमली जमा पहना कर देश के सभी बच्चों को शिक्षा दे. अन्यथा जैसा आजकल हो रहा है वही होगा. कैलाश सत्यार्थी जैसे महानुभावों को नोबल मिलेगा पर जिस के लिए नोबल मिला वह आपको गरीबी की चक्की में पिसता ही नज़र आएगा.

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