गद्य-कविता : वह थे

मसला यह था, कि उन सभी ने अपने-अपने हिसाब से चीज़ों को जिया, उनके बीतने और आगमन का अनुमान लगाया. उन्हें संशय और विश्वास की दृष्टि से देखा और महसूस किया. वह अपने हिसाब से ‘बचे हुए’ को गिनते थे.

उनकी अपनी-अपनी प्रतीक्षाएं और यात्राएं थी, और बहुत बार तो वह तब शुरू होती थी जब बाकी सभी यात्राएं समाप्त हो जाती थी. उन्होंने मील के पत्थर को बार-बार लज्जित किया. बहुत बार तो तमाम मंजिलों को इतनी वासना से देखा कि वह उनके पास आने में डरती रही.

उन सभी के पास अपने-अपने ‘सही’ और ‘गलत’ थे और अपने हिसाब से वह सभी ‘लगभग’ सही थे.

अग्नि उनके काम की चीज थी पर वह राख का उपहास उड़ाते थे. थकने से अधिक घृणास्पद उनके लिए कुछ भी न था. जब उनके पास करने को कुछ विशेष नहीं होता तो वह अपने ‘अर्थ’ स्वप्नों से उधार मांग लेते थे. उनके चेहरे सबसे सुंदर तब होते जब वह नींद के भीतर होते, वह जब जागते तो देखने वाले कहते कि देखो, दृश्य के भीतर ‘एक देखने वाले पुष्प’ ने फिर से अपनी आंखें खोली हैं.

वह अपने वर्तमान की सबसे आश्चर्यजनक चीज थे क्योंकि वह जानते थे कि एक दिन कुछ भी नहीं बचेगा, दिन भी नही, फिर भी वह सभी एक साथ अपने समय में पूरी ऊर्जा के साथ मौजूद थे और लगातार उसकी व्याख्या किये जा रहे थे!

दृश्यों में बने रहने का उनका अपना तरीका था. वह अपनी मूर्खता के भीतर से बाहर झांकते थे और किसी समझदार की तरह कई बार सर हिलाते थे!

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