यही सच है, माँ! मुझे अब तुम्हें एक शिशु की भाँति बाँहों में झुलाना है

इन दिनों
मानव -वय के वैश्विक पंचांग को पढ़ते हुए,
जब मैं,
अपने देह-विज्ञान के प्रति अधिक संवेदनशील हूँ
घुटनों, जोड़ो में कभी जब जकड़न होती है
तो, अचानक तुम्हारे घुटनों से चटखने की आवाज़
अब नजदीक.. बेहद नजदीक
एकदम कान से सनसनाती हुई दिल को भेद जाती है

बालों में उग आयी चाँदी की लकीरों को देखकर
उन्हें जब छिपाने की कवायदें शुरू करती हूँ
तो न जाने क्यों
तुम्हारे हाथ को बालों की लटों में उलझा हुआ पाती हूँ
जीवन-वृत्त के इस शाश्वत चक्रांश से गुजरते हुए
मुझे तुम्हे अब,
अंकस्थ करने की चाह है, माँ !

यही सच है, माँ !
मुझे अब तुम्हे एक शिशु की भाँति बाँहों में झुलाना है
जहाँ, मैं समझ पाऊँ कि
जब, तुमने अपनी आँखों के गीलेपन का दोषी
कभी प्याज के तीखेपन को,
तो, कभी सील पर लगी मिर्च को बनाया था
तब, अचानक मेरे गाल पर नमक क्यों उग आता था?
मैं अब तुम्हारे चेहरे के आस-पास
उन फुसफुसाती आवाजों में अपना चेहरा आसानी से छुपा लेती हूँ
जो हमेशा सर्दी-जुक़ाम का त्वरित परिणाम भी नहीं होती थी.

बीते कुछ दिनों से…
फ़ोन पर तुम्हारा मौन व मेरे अनुनय-विनय की श्रृंखला
लगता है जीते जी वैतरणी पार करने सी
अंतहीन प्रक्रिया मेरे हिस्से में आ गयी है
यूँ लगता है, अब तुम मुझसे ज्यादा जिद्दी हो चली हो
क्योंकि, तुम्हारे इस कुतर्क के चक्रव्यूह का कोई वाज़िब तोड़ नही है
जहाँ, तुम मुझे यह कहकर करवट ले सो जाती हो…
“तुम पर बोझ नहीं बनना है.”

अब, वह तर्क किस पोथी में खोजूँ
जहाँ, कोई यह अमिट व अमर रूप में लिख गया हो
कि एक सन्तति
जो, मौत सदृश्य प्रसव की दिव्य बेला को
माँ को भेंट कर अंधकारमय गर्भ से मुक्ति पाती है
तो,
उसे भी उस मुक्ति से पुण्य कमाने के लिये
मात्र पुत्र जन्म पाना जरूरी नहीं है..
वह, एक पुत्री भी हो सकती है
सन्तति मात्र, माँस का एक लोथड़ा भर नही है, माँ !
वह एक पूर्ण शरीर से उत्पन्न, एक सम्पूर्ण शरीर ही है

जिसकी आत्मा का जीवित तर्पण,
पालकों की जीवित तृप्त आत्मा में ही सम्भव है.

जितनी चाहो जिद्दी बनो
पर ऐसा कुछ न करना, माँ !
जो मुझे तुम्हारी चिरविदायी के बाद अपराधी बना दें
कि, मैंने भी किसी दूसरी बेटी के लिये
कोई पोथी नहीं लिख छोड़ी …..
जहाँ,
एक मिथ्या लोकाचार को कभी कोंचा ही नहीं गया कि..
“ब्याही बेटी के महल में, पालकों के नसीब में कोई नंगी खाट तक नहीं होती….”

– मंजुला बिष्ट

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