नमामि गंगे : आरोप-प्रत्यारोप बंद हों और सामूहिक प्रयास आरम्भ हों

गंगा भारत का प्राण है. यह सिर्फ़ जल की धारा नहीं अपितु भारत की मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है.

रामायण, महाभारत तथा अनेकानेक पुराणों में गंगा को पुण्यसलिला, पापनाशिनी, मोक्ष-प्रदायिनी आदि ना जाने कितने अलंकारों से विभूषित किया गया है पर मानवों के पाप को हर कर लगभग 50 करोड़ भारतीयों को जलरूपी जीवन उपलब्ध कराने वाली गंगा आज प्रदूषण से कराह रही है.

भाजपा के मंत्री ने कहा कि भारतीय अस्थियां विसर्जन कर गंगा को प्रदूषित करना बन्द करें.

जनमानस में आक्रोश है. क्या अस्थि-विसर्जन गंगा को प्रदूषित करता है? बेशक करता है. पर उतना नही..

मुख्यतः कैल्शियम फॉस्फेट तथा अल्प मात्रा में अन्य अवयवों जैसे मैग्नीशियम फॉस्फेट, सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन डाईऑक्साइड, सोडियम, नाइट्रोजन ऑक्साइड एवं नाइट्रेट एवं ट्रेस मेटल्स से बनी मानव अस्थियां वातावरण एवं शरीर पर हानिकारक प्रभाव नहीं ही डालती हैं

सामान्यतः लकड़ी से जलाया गया मानव शरीर 20-25 किलो भस्म तथा इलेक्ट्रॉनिक भट्टियों से जलाया शरीर 2-3 किलो भस्म ही उत्पन्न करता है और जो कि इतनी ज़्यादा नहीं है और देखा जाए तो ये भस्म जैव उर्वरक के तौर पर भी कार्य कर सकती है पर…

जब मोक्ष की चाहत में प्रतिदिन लाखों की संख्या में मानव शरीर अस्थियां सतत जल में प्रवाहित की जाएंगी तो जल में high PH level उत्पन्न होना स्वाभाविक है.

जल में अधिक मात्रा में ट्रेस मेटल्स एवं सल्फर का concentration जलीय जीवों पर, तो सोडियम-फॉस्फेट की अधिक मात्रा गंगा जल से सिंचित होने वाली वनस्पतियों पर गंभीर दुष्परिणाम डालती है.

ये कुछ ऐसा ही है कि… नमक हमारे शरीर के लिए लाभकारी है पर नमक अधिक मात्रा में फांक लेना बेहद विनाशकारी!

दोष रीति-रिवाजों से कही अधिक ‘जनसँख्या विस्फोट’ का है. और जनसँख्या विस्फोट के लिए हम नागरिक ज़िम्मेदार हैं या शासन तन्त्र?

पर फ़िर भी, अस्थि-विसर्जन से हुआ प्रदूषण, कुल प्रदूषण का 1% भी नहीं है. तो क्या औद्योगिक इकाइयां? ना ना… वे भी गंगा प्रदूषण में मात्र 15% प्रतिशत की हिस्सेदार हैं.

तो बाकी 80% से ज़्यादा प्रदूषण का दोषी कौन? दोषी हम हैं!!!

नगरीकरण के अंतर्गत गंगा के जीवन की कीमत पर आरामदेह जीवन बिताते हम इंसान !!

गंगा के 80% प्रदूषण का ज़िम्मेदार वो कचरा, गंदा पानी, टॉयलेट फ्लश, अपशिष्ट पदार्थ है, जो तीन अरब लीटर कचरा रोज़ाना आप के घर से निकल कर गंगा में अपने सफ़र को समाप्त करता है.

सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स लगाना आसान नहीं. जगह की ज़रुरत, धन की ज़रुरत, नगरों की पाइपलाइन व्यवस्था को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ने की ज़हमत आदि ना जाने कितनी दुश्वारियां हैं.

फ़िर भी प्रयास ज़ारी हैं. आज 30% से अधिक कचरा गंगा में प्रवाहित होने से पूर्व शोधित कर लिया जाता है. समय के साथ ये क्षमताएं और बढ़ेंगी.

नगरों का कचरा नदियों में प्रवाहित करना पुरानी परम्परा रही है. इसके अलावा विकल्प ही क्या है.

शुरू में नदियों का मुक्त प्रवाह अल्प कचरे के निस्तारण में स्वयं सक्षम था. तत्पश्चात आपकी सुविधा हेतु बिजली उत्पन्न करने के लिए नदियों पर बाँध बनाये गए. नदियों का प्रवाह अवरुद्ध हुआ. जनसँख्या निरंतर बढ़ती रही. परिणामस्वरुप प्रदूषण भी.

क्या सरकार देर से चेती?

नहीं… गंगा माँ किसकी है? चेते तो हम है तनिक विलम्ब से. सरकार गंगा प्रदूषण से निपटने के लिए उदासीन थी तो सरकार पर दबाव बनाने का कार्य कौन करेगा?

आखिर हमारे एजेंडे में आज से पहले वे सरकारें क्यों नही रहीं जो माँ गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के अभियानों पर गम्भीर हों?

ये सवाल सरकार से कौन करेगा कि नमामि गंगे प्रोजेक्ट में गंगा सफाई के लिए मिले दो हज़ार करोड़ में से आधे भी सरकार अब तक क्यों नही खर्च कर पायी?

दोष तो नागरिक चेतना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की हीनता का है. सरकार का नहीं.

पिछले कुछ हज़ार सालों में हम मानवों ने अपने लिए आरामदेह आशियानों की तलाश में जंगलों का अंधाधुंध सफाया किया. कोयला जला कर पृथ्वी के तापमान का संतुलन बिगाड़ा. ग्लोबल वार्मिंग के फलस्वरूप आज हिमालय के ग्लेशियर्स निरंतर पिघल रहे हैं.

स्वयं गंगा का उदगम, गंगोत्री पिछली दो शताब्दियों में तीन वर्ग-किलोमीटर पिघल चुका है. नयी बर्फ़ जम नहीं रही. मौज़ूद बर्फ पिघलने की दर प्रतिवर्ष बढ़ती हुई आज 22 वर्ग-मीटर प्रतिवर्ष तक आ चुकी है.

सन 2100 के अंत तक आखिर कहाँ मोक्ष प्राप्त करने हेतु डुबकी लगाएंगे हम भारतीय जब पापनाशिनी स्वयं गंगोत्री ग्लेशियर के विलुप्त हो जाने के कारण एक बरसाती नाला बन कर विलुप्त हो चुकी होगी?

वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमालय क्षेत्र में हज़ारों ग्लेशियर झीलें बन चुकी हैं. हिमालय क्षेत्र में बसे हज़ारों गाँव ‘केदारनाथ’ जैसी त्रासदियों का साक्षात्कार करने से सिर्फ एक कदम दूर हैं.

एक मामूली भूस्खलन इन झीलों को अपनी हदें तोड़ मानव बस्तियों पर आई कालदूत सुनामी के रूप में लाखों मनुष्यों की मृत्यु का कारण बना देगा.

आख़िर हम कब चेतेंगे? देर से चेतने का फायदा क्या, जब चहुँ ओर बिखरे असंख्य मानव लोथड़े हमारी अदूरदर्शिता और असफलता पर हमें मुंह चिढ़ा रहे हों?

कारण और निवारण अनेक हैं. विस्तृत रूप से कहीं लिखने की कोशिश करूँगा. आज का सन्देश सिर्फ़ इतना कि आरोप-प्रत्यारोप बंद हों और सामूहिक प्रयास आरम्भ हों.

हम इंसान, सर्वशक्तिमान नहीं है और अपने क़दमों के दूरगामी परिणामों को नही जान सकते. विज्ञान के उपयोग से अपना और अपनी सभ्यता का जीवन बेहतर बनाना हम सभी का बुनियादी हक़ है.

लेकिन, हमें ये याद रखना होगा कि गंगा जितनी हमारी है, उतनी ही गंगा में निवास करने वाले उन कछुओं, मछलियों की… जो हमारी मोक्ष की चाहत की कीमत अपने प्राणों से चुका रहे हैं.

गंगा का पराभव सिर्फ़ एक जलधारा का पतन नहीं बल्कि हज़ारों वर्ष पुरानी विश्व की प्राचीनतम सभ्यता का पराभव होगा.

किसने क्या किया? कितना प्रदूषण बढ़ाया… उसे छोड़ दीजिये.

रोगों का कारण जो भी हो. फ़िलहाल माँ परेशान है. रोगों का निदान ढूँढिये. अस्थियां मानव बस्तियों से दूर प्रवाहित करिये. गंगा स्नान की बजाय गंगा जल घर पर लाकर स्नान कीजिये. उन सरकारों को चुनिए जो गंगा सफाई पर गंभीर हों.

छोटे से छोटा प्रयास भी स्वागत योग्य है.

ये आरोप-प्रत्यारोप का दौर नही. माँ हमारी-आपकी है. ख़याल भी हमें आपको रखना है. याद रखिये… गंगा हमारी बपौती से ज़्यादा एक विरासत है… जिसे निर्मल रूप में भावी सभ्यताओं तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है.

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