उस ‘एक’ नंबर के लिए एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हुए हैं दलित, पिछड़े और सवर्ण

मेरे कई लेख पर मित्रगण आरक्षण की अन्यायपूर्ण व्यवस्था और सरकारी नौकरी की कमी के बारे में लिखते है. इस बारे में कई संदेश भी मुझे मिलते रहते हैं.

मै पहले लिख चुका हूँ; आज फिर दोहरा रहा हूँ, आज की तकनीकी ने सूचना और ज्ञान हमारी मुट्ठी में रख दिया है. एक अदद सरकारी नौकरी में कुछ भी नहीं रखा है.

आप एक पल के लिए सोचिये, अगर सारी सरकारी नौकरी दलितों और पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित हो जाए, तो क्या तब भी सभी दलितों और पिछड़ों को रोज़गार मिल जायेगा?

या फिर, अगर आरक्षण रातों-रात समाप्त हो जाए, तो सामान्य वर्ग के सभी लोगों को रोज़गार मिल जायेगा? नहीं, क्योकि हर महीने भारत में दस लाख लोग एम्प्लॉयमेंट मॉर्केट में आ रहे है.

मैंने अभी UPSC Civil Services 2016 के फाइनल मार्क्स चेक किये और पाया कि एक-एक मार्क्स पे कई कैंडिडेट बैठे हुए है.

उदाहरण के लिए, 1000 से 1095 मार्क्स यानि की 96 मार्क्स पर 432 प्रत्याशी बैठे है. UPSC Civil Services 2016 के फाइनल में 878 मार्क्स पर 26 प्रत्याशी है.

आप अपने आस-पास कई ऐसे लोगो को जानते होंगे जो केवल एक नंबर, दो या तीन नंबर से प्रिलिम्स, मेंस या फिर फाइनल सूची में आने से रह गए.

किसी भी प्रतियोगिता का लक्ष्य आपको सेलेक्ट करना नहीं, बल्कि आपको रिजेक्ट करना होता है.

2015 की Civil Services के लिए साढ़े नौ लाख अप्लिकेशन जमा हुई थी, जबकि 4,65,882 लोगो ने प्रिलिम्स दिया, जिसे सिर्फ 15008 लोग ही पास कर पाए. फाइनल परिणाम में लगभग 1150 लोगो ने ही पास किया.

जो 4,64,000 लोग पास नहीं हुए, वो आरक्षण पे आक्रोश निकालेंगे.

सवर्ण इसलिए कि पास हुए आधे से ज्यादा लोग आरक्षित वर्ग से है, नहीं तो ‘वे’ आईएएस बन गए होते. और आरक्षित वर्ग के लोग इसलिए कि ‘इन’ सवर्णो के कारण वे नहीं सेलेक्ट हो पाए, नहीं तो ‘वे’ भी तीर मार देते.

यही भ्रम, यही आक्रोश हर प्रतियोगिता के बाद लाखों लोग महसूस करते है. लाखों लोग उस एक नंबर की तलाश में रहते है जो उन्हें एक स्थाई नौकरी दिला देगा, उस एक यूनिवर्सिटी या IIT या मेडिकल कॉलेज में भर्ती करा देगा.

और उस एक नंबर के लिए दलित, पिछड़ा वर्ग और सवर्ण, सभी एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हुए हैं, जिसका लाभ छुटभईये नेता उठाते है और इन तीनो वर्गो का शोषण करते हैं.

मज़े की बात यह है कि एक अति पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति, एक चायवाला, इन तीनों को उद्यम लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, उन्हें मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया की तरफ मोड़ने का प्रयास कर रहा है, उसके लिए लोन दे रहा है. जब कि एक IIT का पढ़ा हुआ आप सभी को लॉलीपॉप पकड़ा रहा है.

राजस्थान में अभी 6.5 लाख सरकारी कर्मचारियों को मंहगाई भत्ता मिला है. यानि कि 30 वर्ष की अवधि में (जॉइनिंग से रिटायरमेंट तक) कुल 6.5 लाख सरकारी कर्मचारी; हर वर्ष 22 से 25 हज़ार नयी भर्ती.

आप स्वयं सोचिये यदि पटेलों को गुजरात और गुर्जरों को राजस्थान में 5 प्रतिशत आरक्षण मिल जाए तो हर वर्ष कितने लोग इनके समुदाय से नौकरी पा लेंगे? सिर्फ 2000 के आस पास या उससे भी कम, अगर केंद्र सरकार की भी नौकरी जोड़ दी जाये.

और इन 2000 नौकरियों के लिए कुछ नेता एक स्वाभिमानी और गर्वीले समाज को पिछड़ा कहलवाने में जी-जान से तुले हुए है और कुछ तो भारत के टुकड़े करवाने वालों से भी हाथ मिलाने को तैयार बैठे हैं.

मेरा लिखने का मतलब यह नहीं है कि आप प्रतियोगिता के लिए जी-जान से तैयारी ना करें, उसमे भाग ना लें. मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि प्रतियोगिता में असफलता के लिए केवल आरक्षण को ही दोषी ना मानें. और ना ही अपने आप को.

यह भारतीय परिवारों और हमारे समाज की विडम्बना है कि हम असफलता को बुरा मानते है और असफल लोगों का मजाक उड़ाते है.

हर परिवार में, हर मोहल्ले में एक आध नवयुवक, नवयुवती मिल जायेंगे जिन्होंने कोई कॉम्पिटिशन निकाल लिया है और उनसे हर उस व्यक्ति की तुलना की जाएगी जो असफल हुआ है. शायद एक-आध ताने भी.

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. मैं सिर्फ यही कह सकता हूँ कि आज के युग में कोई भी असफल नहीं होता, उसे सिर्फ किसी अन्य क्षेत्र में प्रयास करना चाहिए.

जहाँ कॉम्पिटिशन आप स्वयं देते हैं, उसके विपरीत सरकारी नौकरी के बाहर किसी अन्य क्षेत्र में आपको सहयोग की ज़रूरत पड़ेगी, मित्रों का नेटवर्क बनाना होगा, हर मित्र की अलग-अलग काबिलियत को समझना होगा और उसे एक छतरी के नीचे लाना होगा, एक नया उद्यम खड़ा करना होगा. इसके लिए आपको मुद्रा लोन की व्यवस्था भी प्रधानमंत्री मोदी जी ने करी हुई है.

अमेरिका में नेटवर्क पर बहुत ज़ोर दिया जाता है. अगर आप को कभी संयुक्त राष्ट्र का साक्षात्कार देना पड़ा, तो उसमें एक प्रश्न टीमवर्क के बारे में अवश्य होगा.

यही हाल गूगल, फेसबुक इत्यादि कंपनी का है. वे इस प्रश्न के द्वारा यह देखते हैं कि क्या आप अलग-अलग व्यक्तियों, जिनका बैकग्राउंड और शैक्षिक पृष्ठभूमि भिन्न है, के साथ सहयोग कर सकते है, क्या आप एकदम नया प्रोडक्ट, एकदम अनूठी एनालिसिस बना सकते है?

क्या आप मिलकर विश्व में, बाज़ार में एक नया पैटर्न पकड़ सकते है? तभी यह देश (अमेरिका) विश्व में सबसे आगे है, क्यों कि यहाँ पर कोई भी फेल नहीं होता. सिर्फ एक प्रयोग में सफल नहीं होते और वे एक दूसरे प्रयोग में जुट जाते है.

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