एजेंडा के तहत सनातन के साथ खेला जा रहा खेल

एक श्रीमान देवदत्त पटनायक हैं. आजकल टीवी पर हिन्दू देवी-देवताओं पर कार्यक्रम करते हुए देखे जा सकते हैं.

इनकी कई पुस्तकें हिंदू पौराणिक कथाओं पर हैं जो हर जगह उपलब्ध है और खूब बिक रही है.

उम्मीद तो यही की जानी चाहिए कि महान सनातन के अद्भुत जीवन दर्शन पर लिखने वाला आत्ममंथन कर अमृत परोसेगा, मगर ये महोदय किस तरह से धीरे से रायता परोसते हैं, उसका एक उदाहरण यहां देखिये.

यह इनकी पुस्तक DEVLOK – 2 के पेज क्रमांक 120 पर से है, ये लिखते हैं –

Who narrated the Ramayana for the first time?

In the Baalkand (childhood episode) of Valmiki’s Ramayana, Rama’s sons Luv and Kush narrate it to him themselves. While hearing the story of this great king, Rama asks, ‘Whose story are you narrating?’

The children say, ‘It’s your story.’ He says the epic poem is so grand, the king is so great that he can’t recognize himself in it – ‘I am not that good’, he says.

The implication is that the Rama in their poetry is probably better than the real one. It’s a beautiful beginning of the Ramayana.

लव-कुश और श्रीराम के बीच का वार्ता सुनने के बाद श्रीमान देवदत्त के अनुसार “The implication is that the Rama in their poetry is probably better than the real one” अर्थात “यह निहितार्थ है कि शायद रामायण काव्य के राम वास्तविक राम से बेहतर हों.”

अब इन लेखक महोदय से कोई पूछे कि कोई महान व्यक्ति जब अपनी बड़ाई सुनता है तो सदा यही कहता है कि “मैं उतना योग्य (अच्छा) नहीं.”

कोई क्या अपने मुँह से अपनी प्रशंसा का समर्थन करेगा? यहां तो फिर पुरुषोत्तम श्रीराम की बात हो रही है, जिनके नाम के पहले ही मर्यादा लगा हुआ है. भला वो अपनी कहानी सुनने के बाद इसके अतिरिक्त क्या कहते कि ‘I am not that good’.

इसके बाद तो कोई और सार्थक – सक्षम लेखक होता तो प्रतिक्रिया में लिखता कि देखिये श्रीराम की महानता, उनकी सहजता, उनका बड़प्पन, उनकी सरलता, उनकी सज्जनता आदि आदि.

मगर यहां तो लेखक देवदत्त पटनायक ने धीरे से अपनी असली भावना का एक बीज पाठकों के मन में बो दिया.

ये वही लोग हैं जिनकी किताबें खूब प्रचारित प्रसारित की जाती है, क्यों? अब इसका कारण कोई भी यहां समझ सकता है. इस तरह से एक एजेंडा के तहत सनातन के साथ किस तरह का खेल खेला जा रहा है यहाँ समझा जा सकता है.

क्या देश में निश्छल सद्गुणी विद्वानों की कमी है जो इन वामपंथियों के मुख से राम कथा सुननी पड़े. इन लोगों की व्याख्या से तो कही अधिक सुरुचिपूर्ण ढंग से गांव का एक अनपढ़ भी रामकथा सुना सकता है.

मगर इन काले अंग्रेजों का मकसद कुछ और ही है. बहरहाल देवदत्त पटनायक को यही कहूंगा कि “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी”

तो पटनायक महोदय, आप जो मर्जी कर-कह-लिख लो, मगर प्रभु श्रीराम तो लोगों के दिल में बसे हैं, जिसका अदभुत वर्णन हनुमान जी के माध्यम से हमारे ऋषि-मुनियों ने पहले ही कर रखा है. इसलिए आप जैसों के द्वारा परोसे जा रहे रामायण के वर्णन-व्याख्या की सनातनियों को आवश्यकता नहीं.

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