सर्वत्र अत्याचारी और पीड़ित का समीकरण खोजता और बनाता हुआ व्यक्ति ही वामपंथी

कुछ दिनों पहले की बात है. एक अमेरिकन लड़की लंच में नारीवादी रोना रो रही थी.

मैंने पूछा – तुम्हें नारी होने से क्या समस्या हो गई? तुम तो अमेरिकन स्वतंत्र नारी हो… तुम कोई सूडान, सीरिया, अफगानिस्तान की तो नहीं हो… तुम्हें क्या घट गया जो रोए जा रही हो?

उसने कहा – तुम औरत नहीं हो, तुम्हें नहीं पता औरत होने से कितना स्ट्रगल करना होता है…

– क्या करना होता है? क्या तुम्हें भी माथे पर पानी का घड़ा भर कर लाना होता है स्कूल जाने से पहले… या स्कूल के बाद दो घरों का बर्तन माँजती थी?

या स्कूल में मास्टर तुम्हें लड़की होने की वजह से कम नंबर देता था? या तुम्हें मेडिकल में एडमिशन के लिए लड़कों से ज्यादा नंबर लाने पड़े? या तुम्हें कोई जॉब लड़की होने की वजह से नहीं मिला? यह रोना क्यों?

तुम्हारी नानी अगर 1960 में यह शिकायत करती थी तो समझ में आता था… आज तुम किस हक़ से शिकायत कर रही हो? कौन सा अन्याय अत्याचार हो रहा है तुम्हारे साथ?

– तुम्हें नहीं पता… दिखाई नहीं देता… पर होता है…

यह एक वामपंथी प्रचार है – माइक्रो-एग्रेशन… वो अन्याय जो दिखाई नहीं देता, पर होता है. यानि आप किसी तरह की विक्टिम-आइडेंटिटी को सब्सक्राइब करते हैं.

आप किसी विक्टिम ग्रुप के सदस्य हैं… महिला हैं, अल्पसंख्यक हैं, अश्वेत हैं, समलैंगिक हैं… तो आपके साथ कोई ना कोई अन्याय अवश्य हो रहा है… चाहे आपको पता चले या नहीं, दिखाई दे या नहीं.

एक सर्वव्यापी सूक्ष्म अन्याय है… आप उसको कभी दूर नहीं कर सकते. वह और कहीं नहीं तो किसी के मन में कहीं छुपा होगा… और उसकी कल्पना करके आप माइक्रो-एग्रेस्ड होते रह सकते हैं.

अन्याय के प्रतिकार का यह स्टैंड वामपंथियों का बहुत ही सशक्त शस्त्र है. समाज में अन्याय को खोजना, फिर उसे अन्यायी और पीड़ित के ग्रुप्स में बाँटना… संगठित और संस्थागत अन्याय का नैरेटिव खड़ा करना…

फिर पीड़ित व्यक्ति के लिए आवाज़ उठाने के नाम पर तथाकथित पीड़ित समाज का झंडा खड़ा करना और समाज में सतत संघर्ष का माहौल बनाये रखना… यही वामपंथी रणनीति है.

भारत के संदर्भ में यह बहुत ही सफल नैरेटिव रहा है. उसमें भी अन्याय की एक अपरिभाषित हायरार्की है. अपरिभाषित इसलिए कि उसमें सुविधानुसार संशोधन किया जा सके.

उनके नैरेटिव में पहले अमीर, गरीब पर अत्याचार करता था… अब यह ज्यादा जटिल है. अब हिन्दू, मुसलमान पर अत्याचार करता है, सवर्ण दलित पर, पुरुष स्त्री पर…

अब सोचें… अमीर मुसलमान और गरीब हिन्दू में कौन किस पर अत्याचार करने में सक्षम है? दलित और मुसलमान में अन्यायी और पीड़ित की भूमिकाएं किसकी होंगी? मुसलमान पुरुष और सवर्ण महिला में अन्यायी और पीड़ित के बीच क्या समीकरण होगा?

कोई भी समीकरण हो… समाज में कहीं ना कहीं, कोई ना कोई अन्याय हो ही रहा होगा… और हर स्थिति में ये कोई ना कोई समीकरण निकाल कर एक अन्यायी वर्ग और एक एक पीड़ित वर्ग ढूँढ़ ही लेते हैं.

और अगर कहीं अन्याय आज नहीं हो रहा हो तो तीन सौ साल पहले हुआ होगा… कहीं नहीं तो किसी के मन में किसी पूर्वाग्रह के रूप में छुपा होगा…

और अगर यह कहानी ठीक ठाक नहीं बिक रही हो तो उन्हीं के बीच से एक व्यक्ति ऐसा एक काण्ड कर देगा जिसे उनके मनपसंद अन्याय के नैरेटिव में फिट किया जा सके. एक आध सवर्ण-पुरुष-बहुसंख्यक-सम्पन्न अन्यायी तो ये स्पॉन्सर कर ही सकते हैं.

वामपंथियों को पहचानने का यह सबसे सटीक और स्पष्ट तरीका है… हर सामाजिक संपर्क में अत्याचारी और पीड़ित का समीकरण खोजता और बनाता हुआ व्यक्ति वामपंथी है… उसे सीपीआई-सीपीएम में खोजना बन्द कर दें…

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