दिवाली पर पटाखा बैन का गुस्सा क्रिसमस पर फोड़ना फ़िज़ूल, असली दुश्मन को पहचानें

ख्रिसमस पर इस समय काफी गुस्सा है हिंदुओं में, यह ख्रिसमस पहले से अलग है.

लेकिन कहीं ये गुस्सा misplaced और misdirected लगता है. ऐसा क्यों लगता है इसके कारण भी दे रहा हूँ.

अचानक इस साल यह गुस्से का कारण है दीपावली पर पटाखे बैन होना और इस समय उन पर से बैन हटाया जाना.

यहाँ हमें एक बात समझनी होगी कि हमारे साथ जो भी हो रहा है यह वामपंथी कर रहे हैं. उनका सिस्टम पर ताबा है और उनका अजेंडा, बहुमती हिंदुओं को सामर्थ्यहीनता का अनुभव कराना है ताकि उनमें हिन्दुत्व के मुद्दे पर एकजुटता न हो.

अधिकृत सत्ताप्राप्ति के लिए उनका यह अपना अजेंडा है हालांकि वे कसाई-ईसाई दोनों से लाभान्वित भी हैं इसलिए उनकी करतूतों पर कुछ नहीं बोलते.

अगर हम देखेंगे तो हमारे ऊपर लगाए जाते सभी ताजा निर्बंध हिन्दू नामधारी वामियों ने ही लगाए हैं. कहीं भी कोई ईसाई या कसाई नहीं दिखेगा. और ये निर्बंध सरकारी मशीनरी के सामने गुहार लगाकर लगाए गए हैं.

कोई हिन्दू घर में ही जन्मा फरियादी होता है जो निर्णयालय के सामने अपनी फरियाद रखता है. निर्णयालय उसके बताए गए तथ्यों और आंकड़ों पर वाद प्रतिवाद सुनता है, निर्णय देता है.

अक्सर यही देखा गया है कि निर्णयालय के निर्णय हिंदुओं पर बंधनों को और कसते हैं और इस बात को सेक्युलर सरकार के निर्णयालय द्वारा दिये जाने पर नैतिक अधिष्ठान भी मिल जाता है.

यही रिपोर्ट होता है, इतिहास में लिखा भी यही जाता है. और ये अपने ही स्थानीय और इंटरनेशनल गिरोहों से खुद को समाज सुधारक का तमगा भी देते हैं जिससे उनके कहे झूठों को भारी वज़न प्राप्त होता है और वे सत्य के नाम पर स्थापित भी हो जाते हैं.

हाँ, इसमें दो राय नहीं है कि भारत के हिंदुओं के विरुद्ध हज़ारों युद्ध छिड़े हैं और हिन्दू विरोधी होना फायदे की चीज़ है और हिन्दुत्ववादी होना नुकसान की गैरंटी.

कई युवा जो मूल रूप से हिन्दुत्व विरोधी नहीं हैं, कूल डूड कहलाने के चक्कर में या लड़कियों की नज़र में गंवार न ठहरने के दबाव में हिन्दू होना या हिन्दू संस्कृति का अभिमान होना गंवारपन की निशानी मानने लगते हैं.

धीरे धीरे यह मान्यता मकसद साधने के लिए ओढ़ा चोला न रहकर हार्डकोर भी बन जाती है.

और भी हैं जो फायदे के लिए भी हिन्दू विरोध करने लगते हैं क्योंकि हिन्दू बने रहने में कोई लाभ नहीं बल्कि उनके चुने हुए करियर में उन्हें नुकसान भी दिखने लगते हैं.

अगर वो मुखर होगा तो वामी प्रोफेसर उसे टॉप नहीं करने देंगे या उसका वर्ष खराब करेंगे, इतना डर भी काफी होता है.

समस्या लाइलाज नहीं है. वैसे अगर हम किसी रोग की बात करें तो हम जानते हैं कि केवल डॉक्टर / वैद्य की दी हुई दवाइयों से रोग नहीं मिटता, हमें आहार में पथ्य पालना आवश्यक होता है, मतलब कुछ व्यंजन छोड़ने होते हैं या बहुत कम सेवन करने होते हैं.

शारीरिक श्रम करना भी आवश्यक हो जाता है. भले ही ऑफिस का बैग उठाने के लिए भी सेवक हो लेकिन साहब को उसके पाँच से दस गुना वज़न पेलकर पसीना बहाना जरूरी हो जाता है.

रोग से मुक्ति पाने या कम से कम उसकी तीव्रता कम करने के लिए इतना आवश्यक है. यह आप भी जानते हैं और कर तो लेते ही हैं.

बस यहाँ कुछ इसी तरह का इलाज आवश्यक है. होम डिलिवरी की सुविधा या ज़रा सस्ते दाम की लालच का त्याग कर, अपने व्यवहार केवल हिंदुओं से करें.

यहाँ मैं, मेरे अपने उन दिनों की बात करता हूँ जब मैं भी सब धर्म समान मानता था. स्थानीय म्युनिसिपल मार्केट में एक भायजान की दुकान से मसाले का पैकेट लिया और उससे सोसायटी चायपत्ती का पैकेट मांगा.

उसके पास नहीं था लेकिन बहुत ही प्रेम से उसने मुझे सामने बाजू दस दुकान छोड़कर एक दुकान का नाम दिया जहां मिलने की गैरंटी थी.

ठीक, मैं वहाँ से निकला, उस दुकान की ओर. इतने में एक दुकान छोड़कर लगी हुई दुकान में सोसायटी टी का बोर्ड देखा. यह था कृष्णा प्रोविज़न. वहाँ मिलना ही था.

और जहां मुझे भायजान भेज रहे थे वो था मुदस्सर टी मार्ट. कुछ ऐसी ही बातों से ये सम भाव का भाव कम कम होते होते खत्म हो गया, वो बात अलग है.

हाँ, तो बात कर रहा था कि व्यवहार हिंदुओं से करें. उनको व्यवसाय के लिए प्रेरित करें. नौकरी आदमी को चाकर बना देती है, उसका सर झुका देती है उसके हाथ पाँव के साथ जुबान भी बांध देती हैं.

सभी HR शिक्षा संस्थानों में वामियों ने अपनी पैठ यूं ही नहीं जमाई है. स्वरोजगार करते मनुष्य के हाथ भी खुले होते हैं. हमें इस ओर हमारे समाज के भाइयों को प्रेरित करना होगा. उसके लिए दान की सोचें.

बिना अभिमान दान. आज हम उस नेमप्लेट के प्यासे हैं और दान उसी के लिए करते हैं. दान दिए धन पर भी अपना अधिकार जमाना चाहते हैं.

ज़रा सोच बदलें. हमारे शत्रु भी दान करते हैं लेकिन उनका अभिगम अलग है, यही उनके यश का कारण है. कुछ सीखें.

वचन का पालन करें, अपने से कमज़ोर को दिया वचन न तोड़ें, उसे ठगने को या अपने से कम ज्ञानी या अज्ञानी को ठगने को होशियारी या अपना जन्मगत अधिकार न समझें.

अब यह बात पसंद न आए तो न आए, सच्चाई है. कथित सवर्ण राजाओं के लिए जिन्हें आज दलित कहा जाता है, वे समाज भी जान लगाकर लड़ते थी, क्यों इस पर मनन करें. रोग के बारे में ऊपर जो लिखा है उसे दुबारा पढ़ें.

यही बात है, यही इलाज है. हिन्दू होना फायदे की बात बनाएँ, क्षरण रुक जाएगा. जहां से क्षरण हो रहा था वहीं से, उन्हीं में से अपने रक्षक खड़े करें. वहाँ सेंध लगाने जो आ रहे हैं, उनका निर्ममता से कठोर इलाज करें.

बात ख्रिसमस से शुरू हुई थी. हमें इलाज वामियों का करना है. बेकार में ख्रिसमस को क्या कहना? किसी ईसाई ने सीधा दशहरा या दीपावली पर आपत्ति नहीं जताई थी. विसर्जन पर प्रदूषण पर किसी मुसलमान ने आपत्ति नहीं जताई.

यह सब हिन्दू नाम धारी वामी ही थे. उन्हें क्रिप्टोख्रिश्चन कहना आज फ़ैशन है, मैं उससे सहमत नहीं. सभी क्रिप्टोख्रिश्चन नहीं, वे बस विधर्मियों के हाथों बिके लोग हैं.

मातारोम ईसाई है इसके कारण हमें वे क्रिप्टोख्रिश्चन लगते हैं, अगर वे मुस्लिम होती तो ये क्रिप्टोमुस्लिम लगते. ये केतलियाँ हैं जो हमेशा चाय से ज्यादा गरम होती हैं.

आपने वो फोटो देखा होगा जहां केजरीवाल और मनीष (उसका सरनेम लेना महाराणा का अपमान है) जाली टोपी और चौकड़ी के रुमाल पहन कर बैठे हैं और नजीब जंग और हमीद अंसारी बिना कोई टोपी या रुमाल के हैं. ये किराए के सैनिक हैं, पैसे देनेवाले का यूनिफॉर्म पहनते हैं.

और इलाज यह भी है कि पॉल्यूशन पर केवल सोशल मीडिया में बात न करें, अपना संगठन बनाकर उस पर आवाज़ उठाएँ. उसके लिए धन परम आवश्यक है. पर्याप्त धन ही नहीं, प्रचुर धन चाहिए और यह मिल तो सकता है, वह भी बिना कष्ट के, बस समय रहते मिले यह ज़रूरी है.

आवाज़ उठाने वाले लोगों की आय, सुरक्षा आदि का ख्याल रखना होगा क्योंकि वे अगर अपनी आजीविका के लिए नौकरी पर निर्भर हैं तो सिस्टम उन पर टूट पड़ेगा, यह पत्थर की लकीर है.

आज कोई 45+ का व्यक्ति जो कहीं मैनेजर या उससे अधिक है, महिना लाख-सवा लाख की सैलरी लेता है. आज अगर दबी जुबान में लड़ रहा है तो नौकरी की मजबूरी है. खुल कर लड़े तो नौकरी गयी, तब आजीविका और परिवार का क्या?

यह कहना बहुत आसान है कि त्याग करें, कहने वाले करते कुछ नहीं.

उनको लड़ाई जारी रखने के लिए धन चाहिए, आजीवन धन चाहिए क्योंकि दूसरा कोई पर्याय नहीं रहेगा, तो हमारा ही कर्तव्य बनता है. यह बात अन्यों को भी प्रेरित करेगी और संख्या की आवश्यकता भी है.

त्याग से कुछ नहीं होता और कोई ढंग का काम निस्वार्थ नहीं होता, यह गांठ बांध लीजिये. यह बात आप जानते तो हैं, व्यक्तिगत आचरण भी आप का यही है लेकिन सार्वजनिक काम की बात आई तो सभी लोग त्याग और निस्वार्थ की दहाड़ें मारने लगते हैं, यह हमारे लिए ही अपरिमित नुकसान की बात है.

सोच यह होनी चाहिए कि इसके लिए तो IIM का टॉपर मार्केट रेट से सैलरी दे कर काम पर रखना चाहिए. वैसे लेवल के दिमाग की ज़रूरत है हमें आज, समय रहते नीयत बना लें वरना तो नियति दिख ही रही है.

बाकी बहुत कुछ है. इसे आगे बढ़ाकर एक धक्का दे सकते हैं. और सुनिए, सब को “मेरी बिज़नस!”

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