यादों के झरोखे से : जब DTC की बसों में धक्के खाते सफ़र करते थे अटल जी

  • मनमोहन शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

आज की पीढ़ी को शायद इस बात पर विश्वास नहीं होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी पांच वर्षों तक दिल्ली परिवहन की आम बसों में साधारण यात्रियों की तरह धक्के खाते हुए सफर किया करते थे.

सन् 1957 के चुनाव में अटल जी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे.

एक सांसद के रूप में उन्हें साउथ एवेन्यू में फ्लैट नम्बर-110 पहली बार अलॉट हुआ था. इस फ्लैट में तब अटल जी अकेले ही रहा करते थे.

उन दिनों साउथ एवेन्यू में ही भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी भी रहते थे. उनके घर में उनके साथ कई संघ प्रचारक भी रहते थे. इनमें से पांचजन्य के यशस्वी सम्पादक यादवराव देशमुख, रमिन्द्र बनर्जी आदि का नाम उल्लेखनीय है.

उन दिनों मैं भी साउथ एवेन्यू में ही रहा करता था. तब मैं कुंवारा था. इसलिए अटल जी एवं दत्तोपंत ठेंगड़ी आदि के साथ हम लोग साउथ एवेन्यू की कैंटीन में ही भोजन किया करते थे. तब इस कैंटीन में भोजन की एक थाली 60 पैसे में मिलती थी.

उन दिनों जनसंघ पार्टी की आर्थिक स्थिति बहुत जर्जर थी. इसलिए पार्टी के सभी सांसद अपना सम्पूर्ण वेतन और भत्ता पार्टी फंड में दे दिया करते थे. उन्हें भोजन आदि के लिए पार्टी द्वारा एक सौ रुपये मासिक भत्ता दिया जाता था.

यही धनराशि अटल जी और ठेंगड़ी जी को भी प्राप्त होती थी. इसलिए यह दोनों हमेशा आर्थिक संकट से जूझा करते थे.

तब अटल जी के पास अपना कोई निजी वाहन नहीं था. टैक्सी या स्कूटर किराये पर लेना आर्थिक संकट के कारण सम्भव नहीं था. इसलिए अटल जी दिल्ली परिवहन की बसों में आम यात्री की तरह धक्के खाते हुए सफर किया करते थे. अटल जी ने पहली कार वर्ष 1967 में ली थी.

उन दिनों जनसंघ का मुख्य कार्यालय अजमेरी गेट के समीप एक कमरे में हुआ करता था. एक अन्य प्रचारक जगदीश माथुर मीडिया प्रभारी थे.

दत्तोपंत ठेंगड़ी को खाने-पीने का कोई खास शौक नहीं था. मगर अटल जी और जगदीश माथुर मिष्ठान और चाट प्रेमी थे. इसलिए इन दोनों को जब मौका मिलता यह दोनों चावड़ी बाजार, बाजार सीताराम और हौज काजी आदि के चक्कर लगाते और तरह-तरह की मिष्ठान की दुकानों और चाट भंडारों को तलाशते.

अटल जी को सड़क पर खड़े होकर खाना-पीना पसंद नहीं था इसलिए वह इन दुकानों से भांति-भांति के मिष्ठान साथ बांधकर ले आते.

अगर ऐसे मौकों पर हम भाजपा के दफ्तर में मौजूद होते तो फिर हमारी ईद होती और खूब डटकर मिष्ठानों और चाट पर हाथ साफ किया करते थे. अटल जी इसके साथ-साथ ठंडाई के भी बेहद शौकीन थे.

अब इनमें से हमारे अधिकांश साथी इस दुनिया से कूच करके वहां चले गए हैं जहां से कोई वापस नहीं लौट पाता. उनकी सिर्फ स्मृति ही शेष रह गई है.

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