संता और साधु

सुबह अभी रजाई में ही था कि बेटे की आवाज़ आयी “पापा आज रात को सेंटा क्लॉज आयेंगे और सब बच्चों को गिफ्ट बांटेंगे. आप बस दरवाजे पर एक झोला टांग दीजिएगा रात को सेंटा क्लॉज उसी में गिफ्ट भरकर चले जायेगें” तभी बिटिया ने कहा कि “सेंटा क्लॉज मेरे लिये रिमोट वाली कार लायेंगे”. बेटा बोला मेरे लिये खिलौना और केक लायेंगे”.

मेरे पुत्र जो अभी यूकेजी के विद्यार्थी हैं उनकी एक आदत में शुमार यह भी है कि वह हर शब्द को अंग्रेज़ी में पूछता है… मसलन “टकला” को अग्रेज़ी में क्या कहते हैं.. “चोखा” की अंग्रेज़ी क्या होगी?अपनी इसी आदत के क्रम में उसने पूछा “पापा! सेंटा क्लॉज को अंग्रेज़ी में क्या कहते हैं”?

मैंने हँसते हुए बताया कि बेटा! यह अंग्रेज़ी का ही नाम है. हाँ हिन्दी में उन्हें “संत कैलाश” (सनद रहे कि संत कैलाश को मैंने फेसबुक से ही कॉपी किया है) कहते हैं. मैंने बताया कि भगवान शिव कैलाश पर्वत से अपना एक दूत भेजते हैं वही बच्चों को टाफी और गिफ्ट बांटते हैं….

खैर बच्चों का क्या…. जो मन को भा गया वही सेंटा क्लॉज हो गया.. हांलाकि मैंने हँसते हुए कहा कि बेटा तुम लोगों के सेंटा क्लॉज तुम्हारे मम्मी- पापा हैं वही न हमेशा तुम लोगों के लिये टॉफी और गिफ्ट खरीदते हैं…. और जब आप, कल सेंटा क्लॉज बने थे तो आपकी झोली में मैंने ही तो टॉफी और चाकलेट भरा था. बेटा! तुम्हारे पापा सेंटा क्लॉज की भी झोली भरते हैं. अब बच्चों को भला कौन समझाये कि तुम्हारे पापा जब अंग्रेज़ी स्कूल की फीस भरते हैं और टीवी का रिचार्ज करते हैं उसी रास्ते संता चाचा चले आते हैं नहीं तो मेरी रजाई तक तो नहीं पहुंच पाते तुम्हारे सेंटा चाचा!

सच तो यह है कि बालमन पर नायक और खलनायक के चित्र गढ़ने का कार्य भी परिवार और समाज द्वारा होता है. जैसे जब बच्चा छोटा होता है और खाना न खाने की जिद्द या बहुत शरारत करने पर उसकी मम्मी कहतीं हैं कि अगर खाना नहीं खाओगे तो तुम्हें “साधु बाबा” पकड़ ले जायेंगे…

साधु बाबा की वेशभूषा का जो वर्णन किया जाता है वह इस प्रकार है- स्थूलकाय शरीर, बढ़ी हुई दाढ़ीदाड़ी, लबादा और बड़ा सा झोला या बोरा टांगे कोई आदमी…यदि कोई उक्त वेशभूषा का व्यक्ति उधर से गुजर गया तो उस व्यक्ति को दिखाकर बच्चों को डराया जाता है कि देखो! आ रहे हैं साधु बाबा झोला टांगे…. अभी उसी में भरकर तुम्हें जंगल में लेकर चले जायेंगे.

बच्चा, साधु बाबा के डर से एक रोटी अधिक निगल कर बैठ गया लेकिन जब वहीं दूसरी ओर उसी कदकाठी का एक व्यक्ति लाल रंग का परिधान ओढ़े झोला टांगे आ रहा है तो वह सेंटा क्लॉज बन गया. दरअसल होता यह है कि एक साधु बाबा वो थे जो झोला में बच्चे को बिठा ले जाते थे और एक यह साधु बाबा हैं जो झोला से निकाल कर गिफ्ट बांटते हैं… दरअसल यही होती है मार्केटिंग… जो यह समझती है कि बच्चों को प्रेम, रंग लालच और करतब से कैसे अपना दिवाना बनाया जाये और एक हम हैं जो बच्चों के मन में शुरु से भर देते हैं कि साधु बाबा मतलब “धरकोसवा”.

दण्ड और पुरस्कार दो ऐसे कारक हैं जिसके बल पर बच्चे या व्यक्ति से कोई मनोवांछित कार्य कराया जाता है… भय से किये गये कार्य में बच्चे कार्य तो संपादित कर देते हैं लेकिन उस वस्तु से उनका लगाव नहीं बन पाता वहीं दूसरी ओर पुरस्कार में भी कार्य सम्पन्न होता है लेकिन उस कारक से भी जुड़ाव हो जाता है जो पुरस्कृत करता है.. हमारे यहाँ कामिक्स में कुछ ऐसे पात्रों को गढ़ा गया जो सुनने में नकारात्मक भले हों लेकिन उनके कार्य इतने मित्रवत् एवं सहयोगात्मक थे कि बच्चों नें उन्हें अपना मित्र स्वीकार किया.. जैसे राज कामिक्स का “प्रेत अंकल” जंगल बुक का बगीरा आदि…

हमारे बच्चों का किसी चरित्र या पात्र से जुड़ना इस बात पर निर्भर है कि हम उन पात्रों को उनसे कैसे परिचय कराते हैं जैसे… बहुत से बच्चों को डाक्टर से इसलिए डराया जाता है कि वह सूई लगाते हैं लेकिन डाक्टर साहब का बेटा यह समझता है कि मेरे पापा से डरने वाली कोई बात नहीं क्योंकि वह सूई उसी को लगाते जो बीमार होता है.

मेरी समझ से हमारे बच्चे बिल्कुल निश्छल होते हैं.. वह सहज रूप से उन्हें स्वीकार कर लेते हैं जहाँ उनका मनोरंजन हो, जहाँ उन्हें भय न लगे जिससे वह मित्रवत हों …जो रंगबिरंगा हो.. जो मिठास बांट सके. हमारे बच्चों को इस इस बात से क्या लेना-देना की चोगे के भीतर “सेंटा क्लॉज” हैं या “संत कैलाश”.

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