तुमको क्रिसमस की शुभकामनायें तो है लेकिन…

तब के मध्य-पूर्व के पाशविक समाज में एक अगुआ हुये जिनका नाम था ‘मोज़ेज़’. उन्होंने उस जंगली समाज को एक उपहार दिया था जिसने उन नर-पशुओं को सभ्यता का दर्शन कराया.

वो उपहार था ‘टेन कमांडेंट्स’ यानि ‘दस धार्मिक आदेश’. कहते हैं कि ‘सिनाई पर्वत’ पर ‘मोज़ेज़’ को सत्य का साक्षात्कार हुआ था और वो वहां से ‘दस ईश्वरीय आदेश’ लेकर उतरे थे.

इन आदेशों में जो बातें थी वो उस जंगली समाज के लिये बिलकुल नई थीं. इन आदेशों में कुछ तो ऐसी भी थी जो हमारे वैदिक सभ्यता की नकल ही प्रतीत होती है. ‘मोजेज़’ को मिले वो कुछ आदेश थे:-

1. तू अपने माता-पिता का आदर करेगा

2. तू किसी मनुष्य की व्यर्थ हत्या नहीं करेगा

3. तू चोरी नहीं करेगा

4. तू झूठी गवाही नहीं देगा

5. तू व्यभिचार नहीं करेगा

6. तू परस्त्री की कामना नहीं करेगा

7. तू पराये धन का लालच नहीं करेगा

‘मोज़ेज़’ के ये विचार कितने अनमोल थे इसका पता जर्मन कवि ‘हाइने’ की एक उक्ति से लगता है जिसमें वो कहते हैं, “ये सिनाई का विशाल पहाड़ उस ‘मोज़ेज़’ के मानव कद के सामने कितना छोटा लगता है जिसने ऐसे अद्भुत आदेश दिये”.

खैर, ‘मोज़ेज़’ ने अपने लोगों को ये ‘टेन कमांडमेंट’ तो दिया पर वो लोग उसकी अहमियत नहीं समझ सके इसलिये इसी शिक्षा को थोड़ा परिष्कृत रूप में लेकर उसी समाज में मोज़ेज़ के चौदह सौ साल बाद जीसस आये.

सही मायने में देखा जाये तो जीसस और कुछ भी नहीं करने आये थे सिवाय इसके कि यहूदी धर्म को पूर्णता प्राप्त हो और वो ऐसा कहते भी हैं.

जीसस ने एक जगह बड़ा खुलकर कहा, ‘Do not think that I have come to abolish the Law or the Prophets; I have not come to abolish them but to fulfill them’.

‘जीसस’ ने जो शिक्षा दी वो वही था जिसको ‘सरमन ऑन द माउंट’ के नाम से दुनिया जानती है और जिसे सिर्फ पन्द्रह मिनट में दुहराया और समझाया जा सकता है.

मैंने जीसस को जितना समझा है उसके आधार पर स्पष्ट मानता हूँ कि जीसस छद्मी नहीं थे, उनकी करनी और कथनी में समानता थी, वो कपटी भी नहीं थे और न ही वो उन सब चीजों को लेकर आये थे जिसे ईसाई मिशनरियां आज उनके नाम पर बेचती हैं.

बल्कि अब तो ये भी स्पष्ट है कि ईसाई धर्म की स्थापना ईसा ने नहीं की थी बल्कि उनको पॉल ने जबर्दस्ती अपने बनाये मत में फिट कर दिया था और उनके नाम पर दुकान खोल दी थी.

आज से ठीक छः साल पहले क्रिसमस के दिन अपने शहर के एक गिरिजाघर में इन्हीं बातों को लेकर मेरा वहां के फादर और उस चर्च के दूसरे अधिकारियों के साथ संवाद हुआ था.

चर्च में घूमने आये लोगों को वो फ्री में न्यू-टेस्टामेंट बाँट रहे थे और ईसाईयत की ओर बुला रहे थे. तब मैंने उनसे पूछा था कि ये ईसाईयत प्रचार आप किसके आदेश से कर रहें हैं? क्या जीसस ने आपको इसकी अनुमति दी है?

वो कहने लगे, बिलकुल दी है.

मैंने कहा, तो अपने बाईबल से दिखा दीजिये कि कहाँ आपको ये आदेश दिया गया है?

वो कहने लगे, है, हमारे बाईबल में बिलकुल ऐसा आदेश है, आपको जो हमने ‘नया नियम’ दिया है उसे घर ले जाकर पढ़िए, उसमें सब लिखा है.

मैंने कहा, आप नहीं बताते तो चलिये मैं बता देता हूँ. आप अपने न्यू-टेस्टामेंट से ‘गॉस्पेल अकॉर्डिंग टू मैथ्यू’ अगर पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि जीसस अपने बारह शिष्यों को जब प्रचार के लिये भेज रहे होते हैं तो उनसे कहते हैं कि तुम अन्य जातियों की ओर न जाना बल्कि सिर्फ इज़रायल के अंदर ही प्रचार करना. इज़रायल की सीमा के अंदर ही प्रचार का ये आदेश प्रलय-काल तक के लिये था.

जीसस ने उनसे ये भी कहा था कि मैं सिर्फ इज़रायल के घरानों की खोई हुई भेड़ों की तलाश में निकला हूँ. इसके साथ एक सत्य ये भी है कि ईसा सिर्फ अपनी यहूदी जाति को ही श्रेष्ठ समझते थे. इसका प्रमाण भी आपकी इसी किताब में हैं.

एक बार जब एक कनानी महिला उनके पास अपने बेटी का दुष्टात्मा निकलवाने की विनती लेकर आई तो मसीह ने उसे ये कहते हुए झिड़क दिया था कि कुत्तों के आगे मैं रोटी नहीं डालता.

ईसा स्वयं एक यहूदी पैदा हुए और यहूदी रूप में ही उनका निधन हुआ. उनके जन्म से लेकर दफन तक के सारे संस्कार यहूदी रीति से संपन्न हुए. उनका संदेश, दर्शन और आदेश केवल और केवल यहूदियों लिये था तो आपने क्यों और कैसे उन के शिक्षाओं की अवमानना शुरू कर दी?

जब ईसा ने अपने चेलों को इज़रायल की सीमा से बाहर जाने के लिये नहीं कहा था तो आप भारत और दुनिया भर में कैसे चर्च खड़े करने लग गये?

उनके आदेश की अवहेलना के साथ-साथ आप इस बात के लिये भी ईसा के अपराधी हैं क्योंकि आपने दुनिया भर में अपने साम्राज्य विस्तार के लिये सूलीकरण, पुनर्जीवन, सदेह स्वर्गारोहण, चंगाई कृत्य और उनके ब्रह्मचर्य का झूठ फैला रखा है.

इसलिये आपको ये याद कराना ज़रूरी है कि आपके जीसस ने कहा था – “और मैं तुमसे कहता हूँ कि जो-जो व्यर्थ बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन वो हरेक बात का लेखा देंगे. क्योंकि तू अपनी बातों के कारण निर्दोष और अपनी बातों के कारण ही दोषी ठहराया जायेगा”.

दुनिया को सबसे अधिक नुकसान आपके विस्तारवाद ने पहुँचाया है. आपके कृत्यों में एक भी बात ऐसी नहीं है जिसका आदेश मसीह ने दिया हो. आपने कई सभ्यताओं और संस्कृतियों को निगल लिया.

पूतना की तरह आप पहले सेवा, दया और सहायता का ढोंग करते हैं और फिर उसकी कीमत किसी का मत बदल कर वसूलते हैं और ईश्वर के कृत्य को बदलने का अपराध करते हैं.

आज जब दुनिया का लगभग हर तीसरा इंसान उस महामानव के जन्मोत्सव की तैयारी में लगा हुआ है तो इसके साथ ही चर्च और उसके अनुयायियों के सामने आज ये प्रश्न भी खड़ा हुआ है कि ‘गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू’ में प्रभु ईसा ने जब ये कहा था कि :

‘मेरे पिता से आशीष पाने वालों, आओ, उस राज के वारिस बन जाओ जो दुनिया की शुरूआत से तुम्हारे लिए तैयार किया गया है. इसलिए कि मैं भूखा था और तुमने मुझे खाने को दिया. मैं प्यासा था और तुमने मुझे पानी पिलाया. मैं अजनबी था और तुमने मेरी मेहमाननवाज़ी की. मैं नंगा था, और तुमने मुझे कपड़े पहनाए. मैं बीमार पड़ा और तुमने मेरी देखभाल की. मैं जेल में था और तुम मुझसे मिलने आए.’

तब नेक जन उसे इन शब्दों में जवाब देंगे, ‘प्रभु, हमने कब तुझे भूखा देखा और खिलाया, या प्यासा देखा और तुझे पानी पिलाया? हमने कब तुझे एक अजनबी देखा और तेरी मेहमाननवाज़ी की, या नंगा देखकर तुझे कपड़े पहनाए? हमने कब तुझे बीमार या जेल में देखा और तुझसे मिलने आए?’

तब जवाब में राजा उनसे कहेगा, ‘मैं तुमसे सच कहता हूँ कि जितना भी तुमने मेरे इन छोटे-से-छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे साथ किया.”

तो क्या ये कहने के साथ ये भी कहा था कि ये सब तुम तभी करना जब वो ईसाई बनने को तैयार हो जायें? अपनी परम्पराओं को लात मार आएं? अपने बाप-दादों को मूर्ख और जाहिल मानने लगे? अपने पूर्वजों से खुद को काट लें?

और अगर प्रभु ईसा ने ये नहीं कहा था तो फिर क्या चर्च को आत्ममंथन की आवश्यकता नहीं है? ईसा के आदेश से अलग जाकर दुनिया भर में ईसाईयत के विस्तार का पाप और उनके बारे में झूठ फैलाने का पाप क्या उन्हें ईसा का अवज्ञाकारी नहीं बनाता?

ईसा की करुणा तो उस स्त्री के लिये भी थी, समाज जिसे वेश्या कहकर पत्थरवाह करना चाहता था पर आपने तो अपने साम्राज्य विस्तार के लिये अपनी प्रचारिकाओं को लगभग वही बना दिया.

आपके मसीह ने कहा था कि बच्चे ही स्वर्ग के अधिकारी हैं पर आपने क्या किया? आपने हज़ारों बच्चों का यौन-शोषण कर उनसे उनका बचपन छीन लिया. आप झूठ और पाखण्ड को चंगाई सभा का नाम देते हुये ये क्यों भूल जाते हो कि आपके मसीहा ने कहा था,

“उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैंने तुमको कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालो, मेरे पास से चले जाओ.”

इन प्रश्नों पर चर्च और उसके अधिकारी आत्ममंथन करें, वो सोचें कि वो जीसस की सही शिक्षाओं का प्रचार करेंगे या फिर जीसस की शिक्षाओं का नाम लेकर मत-विस्तार की अपनी राजनैतिक आकांक्षाओं को विस्तार देंगे?

दूसरों को मुक्ति दिलाने का दावा करने वालों को ये झूठ और फ़रेब क्या स्वयं उनको मुक्ति दिलायेंगे जबकि मसीह ने कहा था “and you will know the truth, and the truth will set you free.”

क्रिसमस की इस पूर्व संध्या पर उनके लिये और मानव जाति के लिये इससे बड़ी सद्कामना और सलाह और क्या होगी कि आप कम से कम वो अपने मसीहा के नाम पर और पाप तो न करें.

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