प्रेम के रूप अनेक

संग जीने-मरने के वादे,.
एक दूसरे की बाहें..
दीवानापन
प्रेम है…
सच है… किंतु अधूरा,

प्रेम
तब भी होता है जब
बेटी, पिता को डाँटकर कहती है,
“पापा, बहुत हो गई आज के लिए चाय
पीनी ही है तो शुगर फ्री लेमन टी लीजिए”

प्रेम
तब भी होता है जब
बेटा अपनी माँ को ऊंची आवाज़ में कहता है,
“तुम्हारी जिद नहीं चलेगी,
आँखें दिखानी ही पड़ेगी,
चश्मे की फ्रेम पहननी ही पड़ेगी..

प्रेम
तब भी होता है जब,
देवर, भाभी के पल्लू से हाथ पोंछते हुए,
भागते दौड़ते, अपने भाई की,
खूँटी पर अटी पैंट की तरफ
इशारा करके
पाँच सौ का नोट हवा में लहराता है
और कहता है,
“आपकी देवरानी से मिलने जा रहा हूँ,
भैया को सम्भाल लेना….”

प्रेम
तब भी होता है जब
छोटा भाई
मायके से फोन करके कहता है,
“जीजी, मम्मी-पापा को बताये बिना फिल्म
देखने जा रहा हूँ… आप सम्भाल लेना”

प्रेम
तब भी होता है जब
माँ आधी रोटी की जगह एक चौथाई
अपने हाथ में रखकर बची
तीन चौथाई को आधी बता
थाली में परोस देती है…
नाराज होने पर कहती है,
माँगी है उतनी ही तो दी है,
मेरे पेट में थोड़ी ही जा रही है ।।

प्रेम
तब भी होता है जब
‎मित्र के घर से आई खाद्य सामग्री
‎चुराकर खा लेते हैं
‎किंतु कभी फीस भरने में पैसे कम पड़ते दिखे
‎चुपके से उसके बटुए में रख देते हैं…

प्रेम
तब भी होता है जब
पति, पत्नी की हर बात पर झुंझलाता है किंतु
जब वह कभी चुप हो जाती है तो
बेचैन हो जाता है..

प्रेम तब भी होता है जब
पत्नी, पति की हर एक आदत से चिढ़ती है
किंतु जब उसकी जान पर बन आए,
वही आदतें स्वयं पूरी करती है…

प्रेम को संकुचित दायरे में न बाँधों
प्रेम को वासना से मत आँको.

– बबीता जैन

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