अप्प दीपो भव : अँसुअन जल सींच सींच प्रेम बेली बोई, अब तो बेल फैल गई आनंद फल होई

हर लेख पढ़ता हूँ….. आनंदानुभूति होती है….. आँसू ही नहीं गिरते, मौन भी छा जाता है…. और अदभुत ये लगता है कि प्रश्न कोई भी हो, हर जवाब में मेरे दिल के लिए कुछ ख़ास रहता है….. आपको अनंत अनंत…… मिलियंस आफ थेंक्स प्यारे प्रभु फोर मेकिंग मी फ़ील अबाउट माय पोसिबल डेस्टीनी एज़ ए ह्युमन बीइंग. – Swami Dhyan Adhar

प्रिय स्वामी ध्यान आधार
प्रेम प्रणाम

नज़र का वार था दिल पर तड़पने जान लगी
चली थी बर्छ किसी पर किसी को आन लगी

हाँ जी ऐसा भी होता है कोई और प्रश्न पूछ कर चला जाता है और जवाब का इंतजार भी नहीं करता शायद ऐसे ही कुतूहल वश प्रश्न पूछ लिया होगा. बस पूछने के लिए ही पूछ लिया होगा. सोचा होगा मैं फ़ौरन उनके प्रश्न का जवाब दे दूँगा ऐसा भी मन में आया होगा शुरू शुरू के दिनों में मेसेंजर पर मेरे साथ ऐसा ही होता था कुछ लोग प्रश्न पूछते तो मैं फ़ौरन उन्हें जवाब लिख कर दे देता तो वे जल्दी से दूसरा प्रश्न पूछते.

मैं उसका भी जवाब दे देता तो वे चार पाँच प्रश्न और पूछते और फिर मेरे बारे में क्या करते हैं, लंडन कैसे पहुँच गये, शादी हुई कि नहीं, आपका असली नाम क्या है, कितना कमाते हैं इस तरह के ढेर सारे प्रश्नो को बार बार मैं अलग अलग लोगों को जवाब दे देकर तंग आ गया तो फिर सहज ही संस्मरणों का लिखना शुरू हो गया तो मैंने मेसेंजर पर बातचीत बंद कर दी.

जब संस्मरण पूरे होने लगे तो किसी मित्र ने दो तीन महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ लिये तो फिर अप्प दीपो भव की श्रंखला अलग से शुरू करनी पड़ी और आज कल यही सहज चलती जा रही है कई मित्र आये गये और कुछ नये मित्रों से ओशो प्रेमियों और संन्यासियों से भी यहाँ पर उनके प्रश्नों के बहाने दिल की बात हो जाती है.

कभी कभी मुझे ऐसा लगता है कि मैं पूना आश्रम के दफ़्तर में बैठा हूँ और ओशो ने जो हिन्दी पत्रों के जवाब देने का काम मुझे सौंपा था वह मैंने अभी तक पूरा नहीं किया इसलिए लंडन में फिर से वही काम ओशो मुझसे करवा रहे हैं.

हाँ यह बात सन 1975 के जुलाई महीने की है ओशो ने मुझे रहस्यमयी ढंग से बँबई से अपने पास बुला लिया और गुरू पूर्णिमा से पूना के आश्रम में मुझे हिन्दी पत्रों के जवाब देने का सबसे पहला काम ओशो ने सौंपा था और मैं कुछ महीनों के बाद वह काम छोड़कर अपनी गर्लफ़्रेंड के साथ रहने चला गया था. उसके बाद मैंने फिर आश्रम में और भी कई काम किये हैं लेकिन यह भगवान श्री के नाम से हिन्दी में आये पत्रों का जवाब देने का मेरा पहला काम था.

और बिलकुल इसी तरह मैं रोज पन्द्रह बीस पत्रों के जवाब लिख कर भारत के कई शहरों और गाँवों में पोस्ट किया करता था आश्रम के बारे में भी सूचनाएँ देनी होती थी ध्यान के साथ बहुत से निजी प्रश्न भी हुआ करते थे. आज फिर स्वामी ध्यान आधार की भाव भरी प्रीति पूर्ण बातें सुनकर मुझे भी बँबई के दिन याद आ रहे हैं जब मैं इसी तरह के चार चार पेज के पत्र लिख लिख कर भगवान श्री को दिया करता था.

उन दिनों की मस्ती और हँसना रोना आज जब किसी मित्र के ऐसे पत्र या कोमेंट में पढ़ता हूँ तो मुझे अपने बीते हुए दिनों की याद आ जाती है. स्वामी ध्यान आधार आपने लिखा है कि आप हर पोस्ट पढ़ते हैं आनंदानुभूति होती है और आँसू ही नहीं गिरते मौन भी छा जाता है…. वाह यही तो होता है जब हम अपने हृदय से पढ़ते हैं तो हृदय की भाषा आनंद की भाषा है प्रेम की भाषा है इसलिए तो आँखों से आँसू छलक छलक जाते हैं. मीरा ने ऐसी ही अनुभूति को बड़े भक्तिभाव में डूबकर गाया है.

अँसुअन जल सींच सींच प्रेम बेली बोई
अब तो बेल फैल गई आनंद फल होई
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई ……

स्वामी प्रेम आधार अब तुम्हारे हृदय में भी प्रेम के आनंद के फूल खिलने लगे हैं यह बड़े ही सौभाग्य की घड़ी है जी भर के बहने दो इन आँसुओं को पता नहीं कब से कितने जन्मों से रुके पड़े होंगे. सदगुरू ओशो के बहाने अब भाव भक्ति के प्रेम के बादल घिरने लगे हैं. इसी से अंतर यात्रा का मार्ग खुलेगा जब सारा शैवाल बह जायेगा तो मौन भी धीरे धीरे छाने लगेगा और फिर अंतर आकाश की अनुभूति भी होगी. निश्चित ही सदगुरू ओशो ने ही तुम्हारे हृदय पर दस्तक दी है यह उन्हीं की प्रेम भरी चिट्ठी है मैंने तो सिर्फ़ डाकिये का, पोस्टमैन का काम किया है लेकिन यह जान कर आनंदित हूँ कि चिट्ठी ठीक पते पर पहुँची है. इसलिए तो आप आभार प्रकट करने से स्वयं को नहीं रोक पाये.

मोहब्बत के लिए कुछ ख़ास दिल मख़सूस होते हैं
ये वो नग़मा है जो हर साज़ पे गाया नहीं जाता

शरीर से हम मनुष्य हैं लेकिन यह मिट्टी, पानी, हवा, और भोजन से चलने वाला शरीर केवल आवरण मात्र है इसलिए इसकी सीमा हमें दिखाई देती है लेकिन यह असीम से और अनंत से जुड़ा हुआ है वह हमें नज़र नहीं आता.

जरा सोचिये कि क्या यह शरीर सूरज के बिना जीवित रह सकता है ? सूरज तो करोड़ों मील दूरी पर है क्या यह शरीर हवा के बिना भी एक दो मिनिट जी सकता है ? और जो भोजन हम इस शरीर से करते हैं वह कहाँ से आता है एक एक दाने में सूरज की रोशनी सूरज की तपिश मौजूद है पानी मिट्टी और हवा मौजूद है शायद चाँद सितारों की अदृश्य किरणें इसमें सम्मिलित हैं इसीलिए तो ऋषियों ने इसे “अनन्म ब्रह्म” कहा है.

हमारे इस छोटे से शरीर में कोई और भी इससे महान उपस्थित है जिसका हमें साधारणतया बोध नहीं होता. इसके द्वारा हमें अनंत और असीम की अनुभूति हो सकती है. हमें निश्चित ही अपने स्वभाव का पता लग सकता है. यह पोस्ट तो बहुत से लोग पढ़ते हैं कुछ लाइक करते हैं कुछ टिप्पणी भी कर देते हैं लेकिन सभी तो इस तरह अभिभूत नहीं हो जाते. ऐसा ही ओशो के प्रवचनों में होता था बहुत से लोग चुपचाप बैठे सुनते कुछ बुद्धी से समझ कर सर हिलाते और कुछ रोते रहते और कुछ दीवाने परवाने तो ओशो को एक नज़र देखते ही भाव विभोर होकर बिलखने लगते मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ है मैं ओशो की पुस्तकें आधी आधी रात तक पढ़ते पढ़ते खूब रोया करता एक एक पृष्ठ को कई कई बार पढ़ता फिर भी दिल नहीं भरता और आज भी ऐसी बातें लिखते लिखते वही गंगा जमुना बहने लगती है तो ऐसा लगता है आप सब के बहाने जैसे मैं ओशो को ही प्रेम पत्र लिख रहा हूँ. ओशो का लिखा हुआ एक छोटा सा पत्र याद आया.

बीज ही बीज नहीं है
मनुष्य भी एक बीज है
बीज ही फूल नहीं बनते
मनुष्य भी फूल बनते हैं
और धर्म मनुष्य के फूल बनने का विज्ञान है.

आपको कभी अवसर मिले तो ओशो के लिखे हुए पत्रों की पुस्तक अवश्य पढ़िये.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY