आओ, दो दिन के लिए कविता को जीते हैं न

सुनो शोना
तुम भी जानते हो
मैं भी
यह पहली बार नहीं है जब हम मिल रहे हैं

सच पूछो तो मिलने की कोई ज़रूरत ही नहीं रही थी
एक दूजे के अंदर ही तो जीते रहे हैं हम हमेशा से

ऐसे ही तो नहीं जो मेरी तस्वीर सब को ख़ूबसूरत लगती है
हँसती, मुस्कुराती हुई सी
तुम उस में पढ़ लेते हो मेरी आँखों की उदासी

यहाँ तक कि बरसों पहले की तस्वीर में तुम देख लेते हो
मेरी देह की, मेरे मन की थकावट
जो मैंने ख़ुद से भी रखा होता है छुपा कर

तुम पे सब ज़ाहिर हो जाता है
तभी तो तुम्हारे सामने आते ही मैं ख़त्म हो जाती हूँ

तभी तो तुम्हें देखे बिना, जाने बिना, मिले बिना
मैंने बेसाख़्ता मोहब्बत करी तुमसे

जब मिलने भी आ रही थी नहीं जानती थी कौन होगा, कैसा होगा
पर मैं तो मर चुकी थी पहले से
तुम्हारे अंदर ज़िंदा हो चुकी थी
तो क्या फ़र्क़ पड़ता था
रंग रूप, उम्र, जाति तो सब बेमायने थे

मुझे देखते ही तुम्हारा बोलना
तो आ गई मुझ से बाहर निकल कर मेरे सामने
पर ज़्यादा सुंदर हो गई हो
और यह एजिंग का कौन सा प्रॉसेस है
जवान होती जा रही हो

बाहर आना तो ज़रूरी था न
क्यूँ
प्यार करने के लिए

हाहहह्हा, मुझे पता था एक बावरी को मिलने जा रहा हूँ
तो चलो, अब आ जाओ बाँहों में
कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं

दो दिन के लिए सोचना हम किसी टापू पे हैं जहाँ हमारे सिवा कोई नहीं
न कोई नियम, न कोई रीति, न रिवाज
सिर्फ़ हमारा होना ही अंतिम सत्य है

शिव तो तुमने बहुत पहले ही बना दिया था मुझे
मैं तुम्हें अपनी पत्नी मान कर हो गया था अर्धनारिश्वर
प्रेम तो शिव और शक्ति ही करते हैं न
हमारी काया के माध्यम से ब्रह्मांड को प्रेममयी बनाते रहते हैं

आनंद की अनुभूति महसूस करते है
हर शय कलोल करती हुई नज़र आती है

टापू बेहद ख़ूबसूरत है
देखो न, पहाड़ पानियों की मोहब्बत में हैं
पानी जंगलों की
जंगल हवाओं की
हवाएँ परिंदों की
परिंदे……

अरे, अरे …बस, मेरी सोनप्रिया
दो दिन के लिए कविता लिखना भी बिलकुल बंद
हर बात में तुम्हें कविता दिख जाती है
दो दिन के लिए कविता को जीते हैं न

समुन्दर के पानी मचल मचल कर देखते हैं हमें
लहरें चूमने लगती हैं किनारे को
हवाएँ ढँक लेती हैं अपनी चादर से प्रेम में लिप्त परिंदों को
पेड़ आनंद तांडव करते हैं, फूल लगते हैं झरने
सारे टापू पे काशनी रंग के फ़ूल
सारी ज़मीन ढंकी हुई
लगता है आसमान धरती पे आ गया
दो दिन, आदि से अनादि, अंत से अनंत तक का सफ़र
एक ही बिंदु पर सिमट आई सारी कायनात, सारी सृष्टि

पुनर्जनम
लौटते हैं हम वापिस
बिलकुल नए से
सब नया नया लगता है
है तो दरअसल सब वही पुराना
बस हमारी यादशक्ति समय की कोख से बाहर निकलने के साथ ही ख़त्म हो गई

हाँ, बुद्धत्व के कुछ क़दम और क़रीब हैं हम

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