लालू यादव संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं

जब से मैंने पढ़ना शुरू किया है तब से ही मुझे इस बात का एहसास था कि जो लिखता है वह लिखता ही है.

लेकिन अब यह समझ में आ रहा है कि जो सिर्फ लिखने के लिये लिखता है वो लेखन नहीं है बल्कि वह उसके लेखक बने रहने के अस्तित्व का संघर्ष है.

वह न सत्य होता है और न ही मासूम होता है. वह सिर्फ खुद से बेईमानी होती है.

यह बात मैं आज इस लिये कह रहा हूं क्योंकि पिछले 3-4 महीने से मैं चाह कर भी कुछ अपना नहीं लिख पा रहा हूँ.

एक से एक मौके आ रहे हैं जिस पर दिल कहता है लिखो, लेकिन दिमाग कहीं और होता है.

कई बार लिखना शुरू करता हूँ लेकिन बीच मे लेखनी का संवाद दिल और दिमाग से टूट जाता है और जब 2-3 दिन बात उससे जुड़ता है, तब तक विषय ही बदल जाता है.

आज जो कुछ लिख पा रहा हूँ उसका पूरा श्रेय 2जी, आदर्श और चारे पर विभिन्न तीन न्यायाधीशों के फैसले को जाता है.

मैं जानता हूँ कि कल तक आये निर्णयों पर बहुतों ने मुझे टैग किया है लेकिन मैं इस स्थिति में नहीं था कि उनको कोई सार्थक जवाब दे पाता. लेकिन आज लालू यादव के खिलाफ आये निर्णय ने मेरा दिल तोड़ दिया है.

लालू ने ऐसा क्या अपराध किया है जो उसको न्यायालय सज़ा सुनाये और 2जी पर मारन व साथी पर भ्रष्टाचार का कोई मामला नहीं बनता और आदर्श घोटाले पर अशोक चव्हाण के खिलाफ राज्यपाल द्वारा कार्यवाही की संस्तुति को न्यायालय गलत मानते हुये निरस्त करता है?

मैं आज लालू के पक्ष में इसलिए हूँ क्योंकि आज न्यायपालिका भ्रष्ट है. मुझे आज लालू से सहानुभूति इस लिये है क्योंकि आज उसका समय खराब है, नहीं तो मारन और अशोक चव्हाण को भी इसी न्यायपालिका द्वारा अपराधी बताना चाहिये था.

आज भारत में राजनीतिज्ञ और उनके साथ बेईमानी के मामले में नौकरशाही बदनाम है लेकिन उगता सत्य यही है कि न्यायपालिका सबसे ज्यादा भ्रष्ट है.

अब तो न्यायाधीशों ने वह सीमा ही तोड़ दी है जहां से भारत के भारत बने रहने का गुमान होता था. लालू यादव संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं.

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