मेकिंग इंडिया गीतमाला : जहाँ पे सवेरा हो, बसेरा वहीं है

खामोशी की झालर छत पर टांग दी थी. कभी अपना हाथ बढ़ाकर उसमें फुर्सत का रंग भर देते तो कभी सुकून के सितारें. और कानों में घुलती मौसिकी की तरंगे मन के पानियों को तरंगित कर जाती……

जिसने फुर्सत के पलों में मौसिकी का ये जादू महसूस किया हो, वही इस बात को समझ सकता है कि बिना कोई लफ्ज़ का जामा पहने भी दोनों घंटो एक दूसरे से कैसे बतियाते रहते और एक दूसरे के चेहरे पर बदलती बातों को पढ़ते रहते.

इस दौरान दुनियावी ज़रूरतें भी उनसे होकर गुज़र जाती और कायनाती पल भी उनमें घटित हो जाते. उनका उठना बैठना, चलना, खाना, पीना…. कोई उस खुदा की नज़रों से देखें तो लगेगा दो शरीर एक रूह … दो तितलियाँ एक फूल पर मंडराती सी.

लेकिन दिन के उजाले की ये ताज़गी रात होते होते थोड़ी सी मुरझा जाती क्योंकि उन एक रूह वाले दो शरीरों को उस समय अलग होना होता और फिर एक की जुबां पर कुछ हर्फ़ आकर अटक जाते…. मेरी सूरजमुखी….

और दूजा उसकी देह को सूरजमुखी से रातरानी के फूलों में तब्दील कर लेता जो रात भर महकती रहती, चाँद से बतियाती रहती और सूरज उगने के समय फिर सूरजमुखी बन जाती…
ये सिर्फ उस खुदा के तिलस्मी गुलशन में ही मुमकिन है जहाँ फूलों की आत्मा भी अपनी देह बदल सकती है और उसी खुदा के आसमान का जादू है कि आफताब और माहताब दो बदन की तरह हो जाते हैं.

फिर संगीत की लहर इतनी ऊंची हो जाती है कि खामोशी की झालर से अब चाँद सूरज और सितारे हाथ बढ़ाकर छूए जा सकते हैं……. – माँ जीवन शैफाली

कभी पास बैठो, किसी फूल के पास
सुनो जब ये महकता है, बहोत कुछ ये कहता है
हो कभी गुनगुना के, कभी मुस्कुराके
कभी चुपके चुपके, कभी खिलखिला के
जहाँ पे सवेरा हो बसेरा वहीं है

कभी छोटे छोटे शबनम के कतरे
देखे तो होंगे सुबह और सवेरे
ये नन्ही सी आँखें जागी है शब भर
बहोत कुछ है दिल मैं बस इतना है लब पर
जहाँ पे सवेरा हो बसेरा वहीं है

ना मिटटी ना गारा, ना सोना सजाना
जहाँ प्यार देखो वहीं घर बनाना
ये दिल की इमारत बनती है दिल से
दिलासों को छू के उम्मीदों से मिलके
जहाँ पे बसेरा हो सवेरा वहीं है

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