गांधी को महात्मा बनाने वाले स्वामी श्रद्धानंद, जिनके हत्यारे की गांधी ने की प्रशंसा

23 दिसम्बर का दिन प्रेरणा लेने का है क्योंकि आज के दिन धर्म के लिए बलिदान हुये युग प्रवर्तक स्वामी श्रद्धानंद जी – का पुण्यस्मरण!

स्वामी श्रद्धानंद जिन्होंने मोहनदास करमचंद गांधी को पूरी दुनिया में महात्मा की उपाधि देकर महात्मा गांधी के नाम से पहचान कराने वाले का बलिदान दिवस (23 दिसम्बर 1926) है, कितने लोगों को पता है?

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सत्याग्रह आंदोलन के लिये गुरुकुल, कांगड़ी के ब्रह्मचारियों ने भोजन में दूध बंद कर, एक बाँध पर मजदूरी द्वारा 1500 रूपए इकठ्ठे कर ऐसे समय दिये, जब आंदोलन का काम धन की कमी के कारण अटक रहा था.

सन 1916 में गांधी जी जब अफ्रीका से भारत आये तो स्वामी श्रद्धानंद जी की कुटिया में श्रद्धा व आदर से अभिभूत होकर स्वामी जी के पैर छुये, परिचय दिया – मैं आपका छोटा भाई, मोहनदास करमचंद गांधी. स्वामी जी ने प्रेम से उनको ‘महात्मा’ कहकर गले लगाया. इसके बाद गांधीजी महात्मा के नाम से प्रसिद्ध हो गये.

मैकाले की शिक्षा पद्धति के कारण जब लोग गुरुकुल की बात करने पर ठहाके लगाकर हंसते थे, तब सन् 1868 में गुरुकुल खोलकर शिक्षा देने के लिए 18 महीने तक सभी काम छोडक़र, बिना घर जाये 40 हजार रूपये इकठ्ठे करने वाले जालंधर के जाने माने वकील ‘लाला मुंशीराम’ अर्थात स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल परंपरा शुरू कर हिन्दू समाज को जाति-पाति, ऊँच-नीच, छुआछूत, धर्मान्तरण रोककर समरसता, समानता तथा घर वापिसी कर (पुन: हिन्दू बनाकर) हिन्दू समाज को संगठित किया.

गुरुकुल शुरू करने के लिए अपने दोनों बच्चों के साथ अपने 12 से 15 मित्रों के बच्चों को गुरुकुल में पढ़ाकर हिन्दुत्व को बचाने की शुरुआत की. वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने मातृभाषा के द्वारा शिक्षा देने के महत्व को समझा.

कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग के प्रधान मि. सैडलर ने स्वीकार किया कि मातृभाषा में शिक्षा देने के परीक्षण मे गुरुकुल को अपार सफलता मिली. मित्र रेग्जे मैकडॉनल्ड जो इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री भी रहे, उन्होंने लिखा है कि भारत में जिन्होंने राजद्रोह के बारे में पढ़ा है, उन्होंने गुरुकुल का नाम अवश्य सुना होगा.

न्यू स्टेटसमैन ने 1914 में पत्र लिखा कि गुरुकुल की सबसे बड़ी विशेषता कि उसने जाति पाति का भेदभाव दूर कर दिया. सात वर्ष की आयु का बालक पच्चीस वर्ष तक की आयु में देश के पूरे सेवक बन जाते हैं.

गुरूकुल के माध्यम से जाति-पाति छुआछूत के कोढ़ को दूर कर हिन्दू समाज को समान भाव से स्वामी श्रद्धानंद जी ने खड़ा कर दिया. इसी कारण उन्होंने अपने दोनों बेटों तथा बेटी का विवाह समाज के विरोध के बाद भी अन्तर्जातीय ही किया.

बेटी एक दिन स्कूल से घर आती है तो गीत गाती है –
तू तो ईसा-ईसा बोल, तेरा क्या लगेगा मोल।
ईसा मेरा रमैया, ईसा मेरा कृष्ण कन्हैया।।

स्वामी श्रद्धानंद ने उसी समय धर्म-अनुकूल शिक्षा का संकल्प लेकर, सन् 1890 में जालंधर में ‘कन्या महाविद्यालय’ शुरू किया. हिन्दी प्रांतों में स्त्री शिक्षा का बहुत बड़ा स्त्रोत यही शिक्षा संस्थान रहा है.

पंजाब की जिस भूमि में पानीपत के तीन युद्ध, पठान, मुगलों के लगातार आक्रमण ने जिस समाज को सुदृढ़ व संघर्षशील तो बनाया किन्तु विधर्मियों के साथ रहने के कारण वह हिन्दू संस्कृति व सभ्यता को भूल गया.

इसी कारण अंग्रेजों ने पंजाबियों को अपने साथ मिलाकर रखने का सतत प्रयत्न किया. 1857 के संग्राम में पंजाब की सेना ने अंग्रेजों का साथ दिया. अंग्रेज बड़ी योजना से इस समाज में फैशन परस्ती, अंग्रेजियत तथा ईसाईयत को बढ़ावा देते रहे तथा नौकरी देकर अपने राज्य को मजबूत बनाते रहे.

स्वामी श्रद्धानंद जी ने समझ लिया कि, बिना भाषा प्रचार के धर्म प्रचार नहीं हो सकता क्योंकि हिन्दू धर्म की सभी पुस्तकें हिन्दी तथा संस्कृत में है. इसी कारण जालंधर अपने निवास स्थान से प्रचार आरंभ किया.

अपनी ससुराल तथा उच्च पदस्थ तथा प्रसिद्ध व्यक्ति होने पर भी स्वामी श्रद्धानंद वर्षों तक एक तारा बजाकर प्रात:काल शहर में भजन व दोहे गाते थे. उन्हें भिखारी समझकर कुछ देविया अन्न वस्त्र दान देती, तो उन्हें लाकर आर्य समाज मंदिर में जमा करा देते थे.

काकीनाड़ा के कांग्रेस अधिवेशन में मौलाना मोहम्मद अली ने कहा कि- अछूत तो लावारिस माल है, इन्हें हिन्दू-मुसलमान को आधा-आधा बांट लेना चाहिए. इससे स्वामी जी के मन को गहरी चोट लगी और कांग्रेस से मतभेद हो गया.

हिन्दुत्व की रक्षा करना उनका अटल ध्येय था. इसी कारण हिन्दू संगठन का कार्य आरंभ किया. उन्होंने देखा कि दिल्ली के आसपास गांव में ईसाई प्रचारक दलित बंधुओं को अहिन्दू बनाने का कार्य कर रहे है. तब उन्होंने ‘दलितोद्धार सभा’ की स्थापना कर अछूतों को नागरिक अधिकार दिलाने का कार्य आरंभ किया.

ख्वाजा हसन निजामी नामक मुसलमान लेखक ने ‘दार ए इस्लाम’ नामक पुस्तक में हिन्दुओं को मुसलमान बना हिन्दू विधवाओं को बहलाकर निकाह करने की युक्तियों का वर्णन किया था।

यह जानकारी समाचार पत्रों के माध्यम से हिन्दू समाज को प्राप्त होने पर सनसनी फैल गई। स्वामी जी ने ‘भारतीय शुद्धि सभा’ की स्थापना कर गैर हिन्दुओं को शुद्ध कर घर वापिसी का कार्य प्रारंभ किया.

मथुरा, आगरा, भरतपुर तथा आसपास के मलकाना राजपूत जो दबाव में मुसलमान बन गये थे, पर हिन्दू पद्धतियों को आज भी मानते थे। उनसे बातचीत कर, पुन: शुद्ध कर पांच लाख से अधिक मुस्लिमों को सम्मेलन कर घर वापिसी कर हिन्दू बनाया.

इससे देश भर के हिन्दुओं में जोश व नई जागृति फैल गई. इस कारण कट्टरपंथी मुसलमानों का बैर भाव भी स्वामी श्रद्धानंद जी से बढऩे लगा.

जो लोग यह समझते है कि स्वामी श्रद्धानंद जी मुसलमानों से घृणा करते थे, वे बड़ी भूल करते है. बड़ी संख्या में मुसलमान भी स्वामी जी के अनुयायी थे, क्योंकि वे मुसलमान शहीदों के प्रति गहरी सहानुभूति रखकर उनके परिवार की सहायता करते थे.

इसी कारण मुसलमानों के बुलावे पर दिल्ली की जामा मस्जिद में मिम्बर (इमाम के स्थान) पर खड़े होकर भगवा वस्त्र पहनकर ऋग्वेद का मंत्र ‘‘त्वं हिन: पिता वसो त्वं माता’’ हिन्दू मुसलमानों को समझाया. धर्म-प्रेम व उदारता की शिक्षा देता है. छोटी-छोटी बातों पर हठ करना नासमझी है.

मुसलमानों के कई मतों से वे सहमत नहीं थे तथा उनका पूरी जोरदारी से खंडन करते थे. जो मुसलमान, इस्लाम छोडक़र हिन्दू धर्म में आना चाहते है, उनको स्वामी श्रद्धानंद जी ने हिन्दू भी बनाया.

इसी कारण 23 दिसम्बर 1926 को अब्दुल रशीद नामक मुसलमान ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी. किन्तु गांधी ने हत्यारे की निन्दा भी नहीं की, उल्टे वक्तव्य दिया कि, “हत्यारे ने अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कार्य किया!”

आज भी उनका बलिदान, उनके कार्यों को आलोकित करता हुआ एक प्रकाश किरण की तरह हमारे सामने आकर हिन्दुत्व का भाव भरकर, धर्म कार्य में लगे लाखों लोगों का मार्ग प्रशस्त कर जीवन भर कार्य करने की सतत प्रेरणा देता है.

धर्मेन्द्र पंड्या, सेवा भारती, छत्तीसगढ़

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