लिंग और योनि : दोनों ही सृष्टि के मूल रहस्य

शिवलिंग पूजा के विषय में बहुत हंसी ठट्ठे सुनता रहा हूँ तो आश्चर्य हो जाता है. इस विषय में श्री श्री गोपीनाथ जी कविराज जी के एक लेख पर नज़र पड़ी तो लिखने की इच्छा हो गयी.

भारत के इतर इतना गहन दर्शन विवरण आपको कहीं नहीं मिलेगा इस पर थोड़ा मेरा सर ऊंचा हो जाता है. आप इसके साथ रह सकते हैं और विचार करने को जीवन काफी बाकी है. आशा है इससे नए अनभिज्ञ आयाम प्राप्त होंगे और नवीन दृष्टि प्राप्त होगी.

गोपीनाथ जी केवल लेखक नहीं सिद्ध समर्थ साधनायुक्त लेखक हैं. उनका समन्वय गारंटी के साथ है. स्वयं की अध्यात्म विषय में रूचि होने और गुरुमुख से साधनप्राप्त होने से गंभीर रूप से कह सकता हूँ कि इससे बेहतर मैंने कहीं दर्शन की व्याख्या नहीं सुनी है. तो प्रस्तुत है.

लिंग रहस्य

1. पाश्चात्य पंडित तथा पाश्चात्य विचारों से प्रभावित आजकल के कोई कोई नव शिक्षित भारत-संतान भारतवर्षीय उपासना की बात चलने पर कहने लगते हैं कि यद्यपि दर्शन और धर्मतत्व के सम्बन्ध में भारतवर्ष में ऐसे गंभीर तत्वों का आविष्कार हुआ था, जो समस्त जगत के लिए विस्मयजनक थे, परंतु उपासना के समय वैसी प्रशंसा नहीं की जा सकती.

वे कहते हैं कि लिंग उपासना भारतवर्ष का एक कलंक है. उनके विचार से वर्तमान सभ्य युग में इस प्रकार की असभ्य और असभ्यकालोचित आदिम-उपासना का प्रचलित रहना उचित नहीं है.

उनकी इस आलोचना पर धीरतापूर्वक विचार करने से लिंगोपासना के सम्बन्ध में स्वभावतः कुछ-कुछ संशय उत्पन्न होता है.

हम बाल्यकाल से ही लिंगरूप शिव की उपासना देख रहे हैं, इसी संस्कार की दृढ़ता से इसकी अश्लीलता हमारे मन को वैसी अश्लील नहीं लगती है. परंतु पूर्वसंस्कारों को त्यागकर विचार करने से ज्ञात होता है कि विदेशी समालोचक स्वाभाविक प्रेरणावश ही इस प्रकार की निंदा करते हैं.

प्राचीन इतिहास की आलोचना से ज्ञात होता है कि पृथ्वी की अधिकाँश अति प्राचीन सभ्य जातियों में लिंग उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित थी. भारतवर्ष में भी प्रागऐतिहासिक युग से लिंग उपासना प्रचलित है.

“मोहन जो-दड़ो” में प्राप्त प्राचीन निर्देशनो का अवलोकन करने से ही स्पष्टरूप से ज्ञात होता है कि उस समय भी लोग ठीक आजकल के समान ही, विशेष आकार के शिव-लिंग की पूजा करते थे.

जो उपासना या साधना एक समय जगद्व्याप्यक थी तथा परवर्ती युग में भी भारतवर्ष में जो भगवत्कल्प श्रीशंकराचार्य प्रभृति असंख्य ज्ञानी और योगैश्वर्य संपन्न मनीषियों के द्वारा अनुष्ठित होती आ रही है, वह अज्ञ-जनोचित उपहासवचनों का विषय होने योग्य कदापि नहीं है, बिना तीव्र साधना के किसी भी तत्व का सम्यक रूप से ज्ञान होना संभव नहीं है.

2. श्लील और अश्लील का विचार नव्य-रूचि से संपन्न युवकों की दृष्टि के निर्णय के अनुसार नहीं हो सकता. व्यक्तिगत संस्कार तथा सामाजिक मनोभावों से संवेष्टित प्रकृति के अनुसार आपेक्षिक रूप से श्लील-अश्लील का निर्धारण हो सकता है.

नग्न-काय पवित्र-चित्त छोटे शिशु की दृष्टि में संसार में कहीं कुछ अश्लील नहीं देखा जाता. यही बात ज्ञान संपन्न परमहंस की दृष्टि से भी समझनी चाहिए, अन्यत्र जिसका जिस प्रकार संस्कार होता है, वस्तु सत्ता उसके निकट उसी प्रकार प्रतिभास हुआ करती है.

भगवान की सृष्टि में अपवित्र कहलाने वाली कोई वस्तु नहीं है, परंतु कलुषित-हृदय-दृष्टा अपने अंदर की कालिमा का आरोपण कर वस्तु-विशेष को अपवित्र समझ लेता है. शुद्ध चित्त से जिस ओर देखें, उस ओर सत्य की उज्ज्वल मूर्ति को देख कर आनंद प्राप्त कर सकते हैं. फिर किसी भी स्थान में संकोच का कारण नहीं प्रतीत होगा.

लिंग और योनि – ये दोनों ही सृष्टि के मूल रहस्य हैं. पुरुष और स्त्री के पारस्परिक सहयोग के बिना सृष्टि प्रभृति कार्य संपन्न नहीं कर सकते. शिव और शक्ति, ईश्वर और माया, पुरुष और प्रकृति, प्रस्थान भेद से चाहे जिस नाम से लिया जाय, सर्वत्र ही दो मूल शक्तियों के पारस्परिक संघर्ष से सृष्टि कार्य संपन्न होते हैं.

3. अब विचारणीय है कि क्या ये ही वास्तव में मूल शक्तियां हैं, अथवा इनके पीछे कोई और अद्वितीय शक्ति है?

उत्तर स्पष्ट है – जब तक द्वैत जगत का अतिक्रमण नहीं किया जाता, तब तक इन दो शक्तियों को ही मूल शक्ति मानना पड़ता है. कार्यक्षेत्र में मूलतः यही प्रतीत होता है और युक्ति से भी यही बात सिद्ध होती है.

ईरानी, यहूदी, तथा अन्य किसी भी प्राचीन धर्म में यही मौलिक द्वैत स्वीकृत हुआ है. परंतु याद रखना चाहिए कि वस्तुतः इस द्वैत के मूल में नित्य अनुस्यूत भाव से अद्वैत सत्ता ही है.

सृष्टि के प्रारम्भ में यद्यपि प्रकृति और पुरुष दोनों पृथक रूप में उपलब्ध होते हैं, तथापि ये जान लेना चाहिए कि सृष्टि की आदिभूत बीजावस्था में, ये दोनों शक्तियां ही अभिन्न रूप में ही विराजमान रहती हैं. इसे चाहे ईश्वर कहो, या महाशक्ति; उसमें कुछ अंतर नहीं पड़ता.

उस अवस्था में एक ओर जैसे प्रकृति और पुरुष परस्पर भेदरहित और एकाकार है, वैसे ही दूसरी ओर वह अद्वैत ईश्वर-सत्ता भी निरंजन एवं निष्कल-सत्ता के साथ एकीभूत है. यह अव्यक्त अवस्था है, इसको एक ओर सृष्टि का बीज कहे जाने पर भी, दूसरी ओर यह नित्य-सृष्टि से अतीत, प्रपंचहीन, शांत और निःस्पन्द शिव-भावमात्र है.

इसी की स्वतंत्रता के उन्मेषवश इस अक्षोभ्य चित-सत्ता के ऊपर वाक् और अर्थ के समान नित्य-संपृक्त, परंतु भेदयुक्त; पुरुष और प्रकृति-रूप तत्व-द्वय का आविर्भाव होता है. ये पुरुष और प्रकृति एक होते हुए भी, भिन्न हैं; भिन्न होते हुए भी, एक हैं.

इनमें से एक को छोड़कर दूसरा अपनी सत्ता का संरक्षण नहीं कर सकता. पारमार्थिक दृष्टि से वह अव्यक्त अवस्था न होने पर भी, सांसारिक-दृष्टि से सृष्टि की अभिव्यक्ति न होने के कारण, इसको एक प्रकार से अव्यक्त कहा जा सकता है. शास्त्र के मत से यह अलिंग अवस्था है, किन्तु पारमार्थिक दृष्टि से निष्कल-अवस्था अलिंग है; अतः इसको महालिंग अवस्था कहा जा सकता है.

लिंग और अलिंग इन दो शब्दों का तात्पर्य आपेक्षिक भाव से समझना पड़ेगा. परिचायक चिन्ह को “लिंग” कहते हैं. जिसकी अभिव्यक्ति नहीं है, उसका निदर्शन नहीं दिखलाया जा सकता है. किन्तु इस अव्यक्त-सत्ता से जो तेजोमय और ज्योतिर्मय तत्व आविर्भूत होता है, वह स्वयं आविर्भूत होता है; इसलिए उसे स्वयंभू कहा जाता है. यही अव्यक्त अवस्था का परिचायक है. इसलिए यह लिंग-पद का वाच्य है.

योनि-तत्व की कुछ धारणा न होने से लिंग-रहस्य सम्यक प्रकार से नहीं जाना जा सकता है. अतः प्रसंगतः संक्षेप में योनिरहस्य के सम्बन्ध में भी दो चार बातें जानना आवश्यक है, जिससे प्रस्तावित विषय को अच्छी तरह से समझा जा सके.

यद्यपि यह विषय अत्यंत जटिल है, एवं सिवा अंतःप्रविष्ट साधक के दूसरे के लिए नितांत दुर्बोध्य है, तथापि आलोचना का विषय होने के कारण संक्षेप में दो चार बातें कह देना आवश्यक समझता हूँ.

4. जिस प्रकार आधार और आधेय परस्पर सम्बन्ध-विशिष्ट हैं, उसी प्रकार एक प्रकार से लिंग एवं योनि को भी समझना चाहिए. परंतु ध्यान रहे यह सादृश्य सर्वांगीण नहीं है. जब आद्या-शक्ति या श्रीभगवान् परम-साम्यावस्था में रहते हैं, उस समय उनमें लिंग या योनि, किसी प्रकार के भी द्वैत-भाव की कल्पना संभव नहीं है. परंतु जहाँ अनादि द्वैतभाव प्रकाशित है, वहां एक के बिना दूसरे की उपलब्धि नहीं की जा सकती.

तंत्रशास्त्र में योनि को त्रिकोण रूप से एवं लिंग को उसके केंद्रस्वरूप या मध्य-बिंदु-रूप बतलाया गया है. सृष्टि की अतीत अवस्था में सर्वशक्ति नित्य-प्रकाशमान अथवा नित्य-अवगुंठित है, वहां बिंदु मंडल और बिंदु के मंडल-पर्यन्त निःसृत किरणधारा, ये तीनों ही अभिन्न रूप से प्रकाशित होती हैं.

इस अभेदात्मक सत्ता में मंडल को योनि के एक बिंदु को लिंग के पूर्वरूप होने की कल्पना की जा सकती है. परंतु सृष्टि की आदिम-अवस्था के समय यद्यपि यह आदिम अवस्था भी अनादि काल से ही वर्तमान है; बिंदु एवं उसके आवरण – इन दोनों में एक भेदाभास जाग उठता है. इसके फलस्वरूप जो आवरणरूप मंडल बिंदु के साथ अभिन्न रूप से वर्तमान था, वह भेद सृष्टि से पहले त्रि-रेखांकित त्रिकोण-समन्वित क्षेत्र-रूप से प्रकट होता है.

यद्यपि बिंदु से अनंत किरणमालायें विकीर्ण होती हैं तथापि संकुचित अवस्था के समय सृष्टि के आरम्भकाल में तीन किरणें ही प्रधानतः धारण करने योग्य हैं. ये तीनो रश्मियाँ सरल रेखाओं के रूप में परस्पर समान दूरी पर रहकर, तीन ओर बढ़ती हैं.

महाशून्य के वक्ष स्थल पर यह विकिरण लीला संपन्न होती है इसलिए ये सर्वत्र समानभाव से ही होती है. उस समय आकर्षण या विकर्षण करने की कोई भी शक्ति वर्तमान नहीं होती. इसलिए ये तीनो रेखाएं परस्पर सम-भावापन्न ही होती हैं.

एक ही मूल स्थान से निर्गत होने के कारण, जब ये तीनो रेखाएं प्राथमिक गति के निरोध के समय स्थिरता प्राप्त करती हैं, तब इनके अग्रभाग परस्पर मिलने के लिए पुनः गतिविशिष्ट हो जाते हैं. फलतः तीन बाह्य रेखाओं का विकास होता है, एवं एक समबाहु और समकोण त्रिभुज का आविर्भाव होता है. उस समय ये तीन बाह्य रेखाएं ही केंद्र स्वरुप बिंदु का आवरण मानी जाती हैं.

कहना नहीं होगा कि यही प्रथम आवरण है. कम से कम तीन सरल रेखाओं के किसी भी वस्तु का वेष्टन नहीं किया जा सकता.

तंत्र-शास्त्र में इसी त्रिकोण या त्रिभुज को ‘मूल-त्रिकोण’ कहा गया है. बिंदु के स्पंदन के तारतम्य के कारण इस त्रिकोण के रूप भी भिन्न भिन्न प्रकार के हो सकते हैं, क्योंकि बाहु या कोण का परस्पर असंख्य प्रकार का वैषम्य संघटित हो सकता है. किन्तु मूल त्रिकोण साम्यभावापन्न होने से सर्वदा एक ही प्रकार का रहता है. यह मूल त्रिकोण ही विश्व की उत्पत्ति का कारण “महायोनि स्वरुप” है.

अब इसका मध्यवर्ती बिंदु विक्षुब्ध होकर उर्ध्वगतिशील ज्योतिर्मय रेखा के रूप में परिणत होता है, तब उसको उज्जवल प्रकाशपुंज के स्तम्भ रूप में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है. कहना नहीं होगा कि यही वह पूर्ववर्णित स्वयंभू नामक ज्योतिर्लिंग है.

अंतर्दृष्टि खुल जाने पर भीतर और बाहर सभी जगह यह लीला स्पष्ट दिखलाई पड़ती है. बाइबल और अन्यान्य धर्म ग्रंथों में जिस अग्नि स्तम्भ (pillar of fire) का वर्णन मिलता है, वह भी इस लिंग-ज्योति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है.

5. अब तक जिस प्रकार वर्णन किया गया, उससे तो आपाततः यही समझ में आता है कि योनि से ही लिंग का विकास होता है.

यद्यपि यह धारणा निर्मूल नहीं है, परंतु अभी तक लिंग और योनि के पारस्परिक सम्बन्ध को हृदयंगम नहीं किया जा सकता. सरलतापूर्वक समझने के लिए इस विषय पर और भी कुछ स्पष्ट कहने की चेष्टा करता हूँ.

जिस योनि के सम्बन्ध में कहा गया है, उसके मूलतः एक होने पर भी, द्वैत जगत में उसे द्विविध जानना चाहिए. एक ब्रह्म-योनि और दूसरी मातृ-योनि. इसलिए त्रिकोण भी ऊर्ध्वमुख और अधोमुख भेद से दो प्रकार का है.

दोनों के ही केंद्रस्थल में बिंदु वर्तमान है. बिंदु विक्षुब्ध होकर जब रेखारूप में गतिशील होता है, तब वह भी ऊर्ध्वमुख और अधो-भेद से दो प्रकार का हो जाता है. इनमें से एक का नाम उर्ध्वलिंग और दूसरे का नाम अधोलिंग है. साधारण अवस्था में जगत के यावत् जीवजन्तु अधोलिंगविशिष्ट ही हैं, परंतु साधना के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति के प्रबुद्ध होने पर, ये उर्ध्व लिंग के रूप में आ सकते हैं.

6. बिंदु जब विसर्ग के रूप में परिणित होता है, अर्थात जब द्वैतजगत का मूलभूत द्वन्द आविर्भूत होता है, तब एक बिंदु ऊपर व दूसरा नीचे गिर जाता है. इन दोनों बिंदुओं की संयोजक रेखा ही अक्षरेखा या ब्रह्मसूत्र है. ऊपर का बिंदु एक त्रिकोण का मध्यबिंदु है, इसी प्रकार नीचे का बिंदु भी एक दूसरे त्रिकोण का मध्यबिंदु है.

जब उर्ध्वत्रिकोण एवं तन्मध्यस्थ-बिंदु विक्षुब्ध होता है, तब उस बिंदु से अधोमुखी (नीचे की ओर) शक्ति धारा निकलती है. यही सृष्टि अवस्था की सूचना है. इसी प्रकार जब अधःस्थित बिंदु और त्रिकोण विक्षुब्ध होते हैं, तब उस बिंदु से उर्ध्वमुखी शक्ति धारा निःसृत होती है. यह संहार की अवस्था है.

7. जो शक्ति-धारा सृष्टि के समय उर्ध्वबिंदु से नीचे की ओर उतर जाती है, यह त्रिकोण क्षेत्ररूप से उसे अपने वक्षस्थल पर धारण कर लेता है. इसी के फलस्वरूप प्राकृतिक देह निर्मित होते हैं, एवं अज्ञानमय प्रपंच का आविर्भाव होता है.

दूसरी ओर, जब अधोलिंग उर्ध्वलिंग अवस्था को प्राप्त होकर उर्ध्वमुखी शक्ति का संचार करता है, तब दूसरा त्रिकोण क्षेत्रस्वरुप होकर, उसको बीजरूप में धारण कर लेता है.

इसी के फलस्वरूप अप्राकृतिक या दिव्य-प्रपंच का आविर्भाव होता है. देवता का देह-निर्माण या साधक को दिव्यभाव की प्राप्ति इसी से हुआ करती है. दिव्य सृष्टि के मूल में प्राकृत-संहार की आवश्यकता रहती है, एवं प्राकृत-सृष्टि के मूल में दिव्य-सृष्टि का तिरोभाव आवश्यक है. अतएव सृष्टि और संहार – ये दोनों ही क्रियाएँ परस्पर अनुस्यूत हो रही हैं, दोनों के मूल में लिंग एवं योनि का परस्पर संयोग विद्यमान है.

8. तंत्रशास्त्र में जिस मध्यबिंदु से विशिष्ट षट्कोण का वर्णन मिलता है, उसे इस ऊर्ध्वमुख और अधोमुख त्रिकोण के परस्पर संयोग से ही उत्पन्न समझना चाहिए. मध्यबिंदु दोनों त्रिकोणों के लिए ही समान है. यह षट्कोण ही शिवशक्ति का मिलित रूप है. हिन्दू बौद्ध जैन – सभी सम्प्रदायों के उपासक इसे किसी न किसी रूप में स्वीकार कर चुके हैं.

मैंने यहाँ जिस योनि और लिंग की बात कही है, वैदिक साधना में इसी ने यज्ञकुण्ड और यज्ञाग्नि का स्थान प्राप्त किया है. आचार्यों ने अनेकों जगह स्पष्ट लिखा है कि कुण्ड ही प्रकृति या योनि है, एवं अग्नि ही रूद्र या शिवज्योति है. देहतत्व-विद योगियों द्वारा वर्णित आधार चक्र भी यह कुण्ड या योनिस्वरुप है. तन्मध्यस्थ ज्योति जब प्रकाशित होकर ब्रह्म-मार्ग पर संचार करती है, तब उसी को ‘लिंग’ कहते हैं.

9. लिंग कितने प्रकार के हैं और योनि कितने प्रकार की है? एवं उनके मौलिक भेद क्या हैं? इन विषयों पर यहाँ विचार कर लेना चाहिए.

लिंग एक होते हुए भी, योनि या अधारभेद से असंख्यरूपों में अविष्कृत होता है. स्वयंभूलिंग, बाणलिंग, इतरलिंग-प्रभृति सारे भेद केवल एक ही लिंग के विभिन्न विकास हैं. उसी प्रकार यह भी सत्य है कि मूल-योनि भी एक ही है, पर लिंग की विचित्रता के कारण वह भी खंड खंड योनियों के रूप में आविर्भूत होती है.

शास्त्रो में जो चौरासी लाख योनियों का वर्णन है, उसका भी यही एकमात्र कारण है. अतएव एक दृष्टि से लिंग भी एक है और योनि भी एक ही है परंतु दूसरी दृष्टि से देखने पर दोनों का ही वैचित्र्य अनंत प्रकार का है.

जीव देह में जिन मूलाधारादि षट्संख्यक आधार-कमलों का वर्णन आता है, वह भी वस्तुतः योनि का ही प्रकार-भेदमात्र है. सर्वत्र ही बिन्दुरूप में लिंग अनुस्यूत है. इसकी अतीत अवस्था में बिंदु निराधार होकर अव्यक्त हो जाता है, लिंग का अलिंग में पर्यसान हो जाता है, एवं द्वैतभाव शांत होकर अद्वैत-भाव में आविर्भूत हो जाता है.

उस समय लिंग और योनि में किसी भी प्रकार के पार्थक्य का अनुभव नहीं किया जा सकता. यही निरालंब या निर्विकार अवस्था है.

वेदांत सूत्रकार ने कहा है – “योनेः शरीरम्”. यह बिलकुल सच है क्योंकि लिंग-ज्योति योनि में प्रविष्ट होकर यदि पुनः उत्थित न हो, तो किसी प्रकार देह निर्माण कार्य संपन्न नहीं हो सकता.

हम जो भिन्न भिन्न इन्द्रियों के सहयोग से दर्शन श्रवण आदि भिन्न भिन्न कार्य सम्पादन करते हैं, यह भी सृष्टि कार्य का एक अंग है. अतः इसके मूल में भी लिंग-योनि का सम्बन्ध वर्तमान है, इसमें कुछ संदेह नहीं है. इसलिए जगत के स्वरुप का भलीभाँति विश्लेषण करने पर यह लिंग और योनि-तत्व क्षुद्रतम् परमाणु के गठन से लेकर बृहत्तम ब्रह्माण्ड के संस्थान तक, सर्वत्र दिखलाई पड़ेगा.

पश्यन्ति मध्यमा वैखरी – ये तीन प्रकार के शब्द ही त्रिकोण की तीन रेखाओं के रूप में कल्पित हैं. इन्ही का दूसरा नाम इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति है. अथवा निम्न स्तर पर सत् रज तम हैं.

9. मध्यस्थ बिंदु परा-वाक् या शब्द की तुरीय अवस्था का निर्देशन है. अतः बिन्दुयुक्त त्रिकोण माया सहित ईश्वर अथवा शिव-शक्ति का ही नामान्तर है. यही सम्मिलित रूप से चतुर्विध वाक्-तत्व की समष्टि है, अर्थात शब्द-ब्रह्म-स्वरुप है.

इस पर यथार्थ अधिकार होने से शब्दातीत, वेद के अगोचर, अप्रमेय, निष्कल और निरंजन, तत्त्वातीत सत्ता का साक्षात्कार होता है. जिसको ॐकार या प्रणव कहा जाता है, वह अर्धमात्रायुक्त इस त्रिकोण का ही नामान्तर है.

यही योगशास्त्र की कुण्डलिनी या शब्द मातृका है. इस त्रिकोणात्मक योनि की तीनों रेखाएं जब एक सरल एवं सम-रेखा में परिणत होंगी, जब वह रेखा अर्धमात्रा में पर्यवसित हो जायेगी और जब अर्धमात्रा बिंदु में विलीन होकर अव्यक्त हो जायेगी, तब मध्यस्थ बिंदु आवरण मुक्त होकर बिंदु भाव से अतीत, सर्वविकल्प-रहित अद्वैत-सत्ता में विलीन हो जायेगा.

लिंग रहस्य के सम्बन्ध में मैंने अभी संक्षेप में यहाँ दो चार बातें बतलायी हैं. इस समय इसकी विस्तृत आलोचना संभव नहीं है, परंतु यह निश्चित रूप से जान लेना चाहिए कि गौरापीठ पर शिवलिंग-उपासना में अश्लीलता रत्ती मात्र भी नहीं है.

इसके असली तत्व से अनभिज्ञ लोग ही इस प्रकार की अश्लीलता की कल्पना कर दिल्लगी उड़ाया करते हैं. मैंने जो कुछ कहा है, उसमें लिंग के तत्व का बहुत थोड़ा सा विवेचन हुया है. यह लिंगोपासना स्थूल जगत में किस प्रकार एवं किन-किन प्राकृतिक नियमों से चली, इस विषय की आलोचना यहाँ नहीं की गयी है.

लिंगोपासना में मृत्तिका, सुवर्ण एवं रजतादि धातु प्रभृति उपादानों के भेद में क्या रहस्य है और इसकी अन्यान्य आनुषांगिक क्रियायों का क्या रहस्य है, एवं द्वैत जगत में विष्णु प्रभृति देवताओ की अपेक्षा शिव-तत्व से इसका अधिकतर घनिष्ठ सम्बन्ध क्यों है, ये बाते इस लेख में नहीं उठायी गयी हैं. लिंग-रहस्य यथार्थरूप से बुद्धिगोचर होने पर ये सब स्थूल-विषय और भी सहज ही समझ आ सकेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं.

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