भविष्य में हमारा साथ देंगे यही ‘इंडियन’

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है, पर जब आप खुद बोलोगे तब?

आदिवासियों और तथाकथित दलितों को भेदभाव दिखा कर, समझा समझा कर अपना बनाने वालों ने अब खुद ही मान लिया है कि उनके घर में भी छूतछात और भेदभाव हो रहा है.

भगवान बदलवा दोगे, पूजा पद्धति भी बदलवा दोगे पर पीढ़ियों से चली आ रही मानसिकता बदलवाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है…

… और उसमें भी हिंदुस्तानियों का तो भूल ही जाओ.

हजार सालों में भी हमनें अपने धर्म को ख़त्म नहीं होने दिया और बाहर वालों को ही अल्पसंख्यक बना कर रखा.

हाँ तो बात ये है कि भारत के कैथोलिक चर्च ने पहली बार आधिकारिक तौर पर माना है, दलित ईसाइयों को छुआछूत और भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ़ इण्डिया (सी बी सी आई) जो ईसाई समुदाय से जुड़े निर्णय लेने वाली सर्वोच्च समिति है, ने एक दस्तावेज तैयार करके जारी किया है.

उसमें उपरोक्त बातें कही गयी हैं और देश के 171 कैथोलिक चर्चों से कहा गया कि वे भेदभाव और छुआछूत को ख़त्म करने के लिए योजनाएं बनाएँ.

हम हिन्दू अनाथ बच्चों की तरह हैं जिनको अपने अस्तित्व के लिए अपने बल पर ही संघर्ष करना पड़ता है.

हमारे यहाँ क्या हो रहा है, कौन सी बात धर्म को नुकसान पहुँचा रही है… इन सबसे हम व्यक्तिगत स्तर पर ही निपटते हैं.

ऐसी कोई संस्था हमारे पास नहीं है जो इन बातों का ध्यान रखे. इसके बाद भी हम अभी तक बचे हुए हैं यह चमत्कार से कम नहीं है.

वो भी तब जब लगातार हमारी जड़ों पर प्रहार होता आ रहा है और आगे भी होता रहेगा.

हमारा भविष्य यजीदी जैसा नहीं भी हुआ तो तुर्कियों जैसा तो होना ही है.

कमाल पाशा ने तुर्की को बदलने में पश्चिमी संस्कृति के रँग में रँग दिया फलस्वरूप उसकी अपनी संस्कृति समाप्त हो गयी.

जिस रास्ते पर हमारी नई पीढ़ी चल रही है उसको देख कर इस सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है.

हमने तो अपनी दादी-नानी से ऐतिहासिक, पौराणिक और लोककथाएं भी सुनी हैं, पर अब बच्चे या तो मोबाइल गेम खेलते हुए सोते हैं या फेयरी टेल पढ़ कर. पन्ना धाय या संदीपनी ऋषि की कहानी सुनने या पढ़ने वाले बच्चे विरले ही हैं.

मिशनरी स्कूल में ज्यादा फीस दे कर, बच्चों को पढ़ा कर, रट्टू तोता बना कर अपनी जड़ से दूर कर देना आवश्यक है क्या?

घर घर में बच्चे कैरल गाते हुए घूम रहे हैं पर एक श्लोक, दोहा, चौपाई याद नहीं होगा… और जिस बच्चे को याद होगा वो मॉर्डन नहीं गँवार कहलाएगा.

फेसबुक पर कट्टर हिन्दू बनने से अच्छा है पहले घर-परिवार को हिंदुत्व और सनातन संस्कृति से जोड़ने का प्रयास करें.

नहीं तो यजीदी तो बनना ही है क्योंकि टी वी मैकॉले अपने उद्देश्य में सफल हो चुका है.

1840 में इंडियन एजुकेशन एक्ट लागू करते समय कहा था… हम इंडियन को शिक्षित करें न करें पर संस्कार दे कर ईसाई अवश्य बनाएंगे… यही इंडियन भविष्य में हमारा साथ देंगे.

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