न्यू यॉर्क की कहानी, मेरी ज़ुबानी

न्यू यॉर्क शहर की गहमा-गहमी अन्य शहरो से अलग है. जब मैं नौकरी के लिए पहली बार अमेरिका आया और न्यू यॉर्क के JFK एयरपोर्ट के इमीग्रेशन काउंटर की तरफ सपरिवार बढ़ा, तो एक अधिकारी ने कहा कि अमेरिका में आपका स्वागत है और हमें अमेरिकी समझ के इस देश के नागरिकों वाली लाइन ज्वाइन करने को कहा. इसके पहले हर देश में हमें विदेशी समझा गया था, जो हम हैं.

खैर, कार्यालय ज्वाइन किया. कुछ ही समय में नोटिस किया कि मेरी सभी महिला सहकर्मी बहुत ही फैशनेबल है, कम से कम लाख-दो लाख रुपये के कपड़े पहने हुए, चेहरे पे बेहतरीन मेक-अप, कंधे पे उतना ही महंगा पर्स और साथ में बड़ा सा टॉट (बोरे वाला टॉट नहीं, tote) बैग.

लेकिन ऑफिस में प्रवेश करते समय वे स्पोर्ट्स शूज जैसे कि नाइके या अडीडास पहने रहती थी. कुछ ही देर बाद वे महंगे पम्पस (हाई हील वाली जूतियाँ) या बूट्स में दिखाई देती थी. कुल मिलकर शरीर पे 3 से 5 लाख रुपये के कपड़े, बैग, पर्स, जूते.

यही हाल पुरुषों का है. महंगे सूट, टाई, ओवरकोट, लेकिन जूता स्पोर्ट्स वाला. ऑफिस में आने ले कुछ समय बाद एकदम चमचमाता हुआ टॉप क्लास मैच करता हुआ जूता.

अगर आप किसी न्यू यॉर्कर से सुबह ऑफिस जाते हुए या सांय वापस लौटते हुए सड़क पे मिले तो सोचेंगे कि कैसा खिसका हुआ आदमी या खिसकी हुई औरत है. कपड़े, बैग चका-चक, लेकिन जूते सड़क छाप.

इसका रहस्य यह है कि न्यू यॉर्क की लाइफ किसी अन्य शहर की तुलना में अविश्सनीय रूप से फ़ास्ट है. हर समय लोग भागते रहते है. मैंने नोटिस किया कि लोग फुटपाथ पे चलते हुए डिस्पोजेबल (दफ़्ती या प्लास्टिक के) ग्लास में कॉफ़ी पीते है, एक बड़ी सी सैंडविच या प्रोटीन बार का नाश्ता और लंच करते है. बैठकर खाने के लिए भी समय नहीं है.

यहाँ तक कि मैंने लोगो को ऑफिस में सुबह-सुबह शेव और दांत ब्रश करते हुए देखा है. पॉटी तो लगभग हर व्यक्ति ऑफिस में ही करता है (नहीं, मैं उन्हें पॉटी करते नहीं देखता, लेकिन टॉयलेट के दरवाजे जमीन से दो फ़ीट ऊपर शुरू होते है और आप एड़ियों तक उतरी पैंट देख सकते है).

ट्रैन में रोज सुबह महिलाएं बैठते ही सभी के सामने मेक-अप करना शुरू कर देती है. और मेक-अप भी केवल लिपस्टिक तक सीमित नहीं रहता. आधे घंटे तक फाउंडेशन, ब्लशर, लिपस्टिक, ऑय-लाइनर, मस्कारा, फाल्स आई लैशेस, बालों को संवारने इत्यादि के बाद बिलकुल हॉलीवुड की हीरोइन का अवतार बाहर निकलता है.

लोग इतने व्यस्त हैं कि हर दिन फुटपाथ पर चलते हुए एक-आध लोग पुस्तक पढ़ते हुए मिल जाएंगे. पुस्तक भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, बल्कि हार्ड कवर वाली. सेल फ़ोन पर ईमेल या मेसेज लिखते हुए, पढ़ते हुए, कान में इयरफोन लगा के म्यूजिक सुनते हुए हर व्यक्ति बाहर की दुनिया से विरक्त है, जैसे उसने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो.

इन सब के बावजूद हर व्यक्ति इतना तेज चलता है जैसे कि ओलिंपिक में भाग ले रहा हो. ऐसे में अगर हाई हील के जूते या फॉर्मल जूते पहन लिए, तो गिर जाने की संभावना बढ़ जाती है.

इसके विपरीत, मैं आराम से चलता हूँ, सेल फ़ोन जेब में, आँख-कान सतर्क और खुले हुए. न्यू यॉर्क के फुटपाथ एवं सड़को की ध्वनि और दृश्यों का आनंद लेता हूँ. कई बार किसी ट्रैफिक लाइट पे पर्यटक मुझे रोक कर रास्ता या पता पूछते हैं. पहले तो समझ नहीं आता था कि मुझसे ही क्यों पूछते है. फिर समझ में आया कि मैं ही एक फ्री व्यक्ति हूँ, बाकी सब बिजी है नाश्ता करने में, फ़ोन करने में, म्यूजिक सुनने में, टेक्स्ट करने में.

एक बार मुझे निर्धन से दिखने वाले, उद्वेलित से, व्यक्ति ने रोका, अपनी कलाई पे जहाँ घड़ी बंधी होती है, उस तरफ इशारा किया, दोनों हाथो की तर्जनी से हवा में एक स्क्वायर या वर्ग बनाया. और आँखों से मेरी तरफ कुछ प्रश्न सा किया.
मैं तुरंत समझ गया.
वे मूक-बधिर सज्जन मुझसे टाइम्स स्क्वायर का रास्ता पूछ रहे थे.

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